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अधिकारी चाहे वह प्रशासनिक हो या अर्द्ध-न्यायिक, कोई भी कानून से ऊपर नहीं है, अर्द्ध-न्यायिक अधिकारी का यह दायित्व है कि वह अदालत के आदेशों का अक्षरशः पालन करे।

Rajasthan High Court Takes Strong View on Delay in Senior Citizen Justice, Summons Sanganer SDM-II

हाईकोर्ट के 3 आदेशों के बाद भी 86 वर्षीय वृद्धा को नहीं मिला न्याय, हाईकोर्ट ने सांगानेर एसडीएम द्वितीय को कोर्ट में पेश होने के दिए आदेश

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों, न्याय में देरी और न्यायिक आदेशों की अवहेलना से जुड़े एक अत्यंत गंभीर मामले में प्रशासनिक एवं अर्द्ध-न्यायिक अधिकारियों को सख्त आदेश देते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा है कि कोई भी अधिकारी—चाहे वह प्रशासनिक हो या अर्द्ध-न्यायिक—कानून से ऊपर नहीं है। अदालत के आदेशों का पालन न करना Rule of Law की जड़ों पर प्रहार है और इसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत के आदेशों की अनदेखी न केवल अनुशासनहीनता है, बल्कि यह गंभीर कदाचार (Gross Misconduct) की श्रेणी में आती है, जिस पर संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।

हाईकोर्ट के बार-बार दिए गए आदेशों के बावजूद उनकी पालना नहीं करने पर उपखंड अधिकारी-II (SDO-II), सांगानेर, जयपुर को 12 फरवरी को कोर्ट में पेश होने के आदेश दिए हैं।

इसके साथ ही याचिकाकर्ता वृद्धा के मामले को उपखंड अधिकारी-II से हटाकर एक सप्ताह में उपखंड अधिकारी प्रथम को ट्रांसफर करने के आदेश दिए हैं।

68 वर्षीय बुज़ुर्ग महिला की न्याय की लड़ाई

यह मामला जयपुर के सांगानेर निवासी 68 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक महिला केसर देवी, निवासी तिरुपति बालाजी नगर, सांगानेर, जयपुर से जुड़ा है।

केसर देवी एक विधवा हैं और उन्होंने अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 के तहत अपने भरण-पोषण एवं संपत्ति से जुड़े अधिकारों की रक्षा के लिए कानून का सहारा लिया।

केसर देवी ने 19 मार्च 2024 को उपखंड अधिकारी-II (SDO-II), सांगानेर, जयपुर के समक्ष धारा 23 के तहत आवेदन पेश किया था। इस आवेदन में उन्होंने अपने परिजनों से भरण-पोषण और अन्य वैधानिक राहत की मांग की थी।

कानून का स्पष्ट उद्देश्य है कि वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े मामलों का शीघ्र निस्तारण किया जाए, ताकि वृद्धावस्था में उन्हें आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा मिल सके। इसके बावजूद, इस मामले में न्याय की प्रक्रिया बार-बार बाधित होती रही।

नोटिस की तामील के बावजूद नहीं हुई सुनवाई

याचिका के अनुसार, इस मामले में वृद्धा के आवेदन पर प्रतिवादियों को वर्ष 2024 में ही नोटिस तामील हो चुका था।

कई बार अंतिम बहस के लिए तारीखें तय की गईं, लेकिन 14 मई 2024 से 15 अक्टूबर 2024 तक अंतिम बहस नहीं सुनी गई।

लगातार देरी से परेशान होकर केसर देवी ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

हाईकोर्ट के आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने 11 नवंबर 2024 को इस रिट याचिका का निस्तारण करते हुए संबंधित SDO-II, सांगानेर को आदेश दिया कि वह वरिष्ठ नागरिक के आवेदन का निर्णय अधिकतम एक माह के भीतर करे।

पहले आदेश की पालना नहीं होने पर केसर देवी ने दोबारा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 15 मई 2025 को एक बार फिर आदेश दिया कि संबंधित अधिकारी इस मामले का एक माह में निर्णय करें।

हाईकोर्ट के दो बार आदेश देने के बावजूद सांगानेर SDO-II ने मामले में कोई फैसला नहीं दिया।

हाईकोर्ट के दो आदेशों के बावजूद भी वृद्धा के मामले में फैसला नहीं करने पर फिर से हाईकोर्ट के समक्ष अनुरोध किया गया।

हाईकोर्ट का तीसरा आदेश

हाईकोर्ट ने 31 अक्टूबर 2025 को तीसरा आदेश पारित कर SDO-II, सांगानेर से स्पष्टीकरण मांगा कि पूर्व में दिए गए आदेशों की पालना क्यों नहीं की गई।

हाईकोर्ट ने 11.11.2024 और 15.05.2025 के आदेशों का पालन नहीं करने के मामले में स्पष्टीकरण मांगा।

14 नवंबर 2025 को कोर्ट में पेश किए गए SDO के स्पष्टीकरण में भी केवल यह कहा गया कि अगली तारीख 17 नवंबर 2025 को अंतिम बहस सुनी जाएगी।

और फिर तारीख दर तारीख

14 नवंबर को राजस्थान हाईकोर्ट में दिए स्पष्टीकरण में SDO ने 17 नवंबर को अंतिम बहस सुनने और फैसले के बारे में कोर्ट को बताने की बात कही थी।

इसके बाद SDO ने लगातार इस मामले में तारीखें दे दीं। याचिका में हाईकोर्ट को बताया गया कि 17 नवंबर 2025 के बाद—

18.11.2025
24.11.2025
25.11.2025
01.12.2025
02.12.2025
12.01.2026

जैसी कई तारीखें दी गईं, लेकिन मामले का निर्णय नहीं किया गया। अदालत ने इसे आदेशों की जानबूझकर और निरंतर अवहेलना माना।

SDO को फटकार, कोर्ट में पेश होने के आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट के बार-बार आदेशों के बावजूद उनकी पालना नहीं करने को बेहद गंभीरता से लेते हुए जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने इसे असंतोषजनक और गैर-जिम्मेदाराना माना।

एकलपीठ ने आदेश में कहा—

अर्द्ध-न्यायिक अधिकारी का यह दायित्व है कि वह अदालत के आदेशों का अक्षरशः पालन करे। आदेशों की अवहेलना लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था की नींव को कमजोर करती है। कोई भी अधिकारी अदालत के आदेशों को “casual manner” में नहीं ले सकता।

हाईकोर्ट ने कहा—

“वरिष्ठ नागरिक महिला को न्याय के लिए बार-बार अदालत के चक्कर लगाने पर मजबूर करना अमानवीय और कानून के उद्देश्य के विपरीत है।”

हाईकोर्ट ने SDO के आचरण को गंभीर कदाचार की श्रेणी मानते हुए संबंधित अधिकारी को कारण बताओ नोटिस जारी करने का आदेश दिया है।

साथ ही याचिकाकर्ता केसर देवी के मामले को SDO-II, सांगानेर से SDO-I, सांगानेर के कार्यालय में ट्रांसफर कर अगले चार सप्ताह में निर्णय करने का आदेश दिया है।

इसके साथ ही संबंधित SDO-II, सांगानेर को 12 फरवरी 2026 को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होकर स्पष्टीकरण देने के आदेश दिए हैं।

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