Highcourt ने कहा : न्याय पाने का अधिकार हर व्यक्ति का मूल अधिकार, न्यायालय न्याय के मंदिर, और ये मंदिर सभी के लिए सदैव खुले रहने चाहिए.
जयपुर, 7 नवंबर
Rajasthan Highcourt ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दहेज उत्पीड़न और भरण-पोषण से जुड़े मुकदमों में पति को बड़ी राहत देते हुए पति की याचिका को मंजूर कर लिया है।
Rajasthan Highcourt ने इसके साथ ही पति के खिलाफ सवाई माधोपुर में दर्ज दहेज और भरण-पोषण के अलग-अलग दो मुकदमों को सुनवाई के लिए जयपुर ट्रांसफर करने के आदेश दिए हैं।
अमूमन ऐसे मामलों में अदालतें पत्नी के पक्ष में फैसला देते हुए मुकदमों को पत्नी के मूल स्थान या इच्छित स्थान पर ट्रांसफर करती हैं।
लेकिन इस मामले में पति ने सवाई माधोपुर में रह रही अधिवक्ता पत्नी पर आरोप लगाया कि उसके मुकदमे में पैरवी कर रहे अधिवक्ताओं को बार एसोसिएशन के साथ मिलकर पत्नी द्वारा परेशान किया जा रहा है।
Rajasthan Highcourt ने पति के पक्ष में फैसला देते हुए कहा कि न्यायालय न्याय का मंदिर है और हर व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
न्याय का मंदिर
जस्टिस अनुप कुमार ढंड की एकलपीठ ने रिपोर्टेबल जजमेंट देते हुए कहा कि न्यायालय न्याय का मंदिर है और हर व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।
Rajasthan Highcourt ने कहा कि किसी भी आरोपी या पक्षकार को उसके पसंद के अधिवक्ता से विधिक सहायता पाने से वंचित नहीं किया जा सकता।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पति की मांग को स्वीकार करते हुए सवाई माधोपुर में दर्ज मुकदमों की सुनवाई जयपुर में ट्रांसफर करने के आदेश दिए हैं।
यह है मामला
याचिकाकर्ता मनोज मीना और उनकी पत्नी —- का विवाह वर्ष 2010 में हुआ था, लेकिन बाद में दोनों के बीच वैवाहिक विवाद उत्पन्न हो गया।
पत्नी — ने सवाई माधोपुर के महिला थाने में दहेज उत्पीड़न के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया।
इसके साथ ही पत्नी की ओर से फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण के लिए धारा 125 सीआरपीसी के तहत याचिका दायर की गई।
पत्नी ने बार एसोसिएशन में शिकायत की
इस मामले का महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि पत्नी स्वयं सवाई माधोपुर में अधिवक्ता हैं।
पति ने याचिका में आरोप लगाया कि अधिवक्ता पत्नी ने स्थानीय बार एसोसिएशन को आवेदन देकर उसकी पैरवी कर रहे वकीलों गोविंद प्रसाद गुप्ता, मुकेश बैरवा और अनीस मोहम्मद के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की।
पत्नी अधिवक्ता की शिकायत पर बार एसोसिएशन ने 19 जून 2025 को इन तीनों वकीलों को नोटिस भी जारी कर दिया।
हालांकि बाद में उसी दिन बार एसोसिएशन ने अपने नोटिस वापस ले लिए, लेकिन नोटिस के चलते याचिकाकर्ता पति के मुकदमे की पैरवी में मुश्किलें आने लगीं।
हाईकोर्ट ने माना गंभीर
जस्टिस अनुप कुमार ढंड ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर माना और कहा कि इससे ऐसा वातावरण बन गया, जिसमें मनोज मीना को सवाई माधोपुर में निष्पक्ष सुनवाई और वकीलों की मदद नहीं मिल पा रही थी।
Rajasthan Highcourt ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष सुनवाई और विधिक सहायता पाने का मौलिक अधिकार है।
Highcourt ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी स्थानीय प्रभाव या भयवश उचित वकील की सेवा नहीं ले पा रहा है, तो यह निष्पक्ष न्याय की भावना के विपरीत है।
Highcourt ने मामले में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ‘फेयर ट्रायल’ यानी निष्पक्ष सुनवाई भारतीय न्याय प्रणाली का अभिन्न हिस्सा है।
हाईकोर्ट ने मनेका गांधी बनाम रानी जेतमलानी (1979) और जहीरा हबीबुल्ला शेख बनाम गुजरात राज्य (2004) जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा —
“यदि किसी आरोपी को स्थानीय कारणों से वकील नहीं मिल पा रहा या बार एसोसिएशन उसके खिलाफ खड़ा है, तो यह ट्रायल को निष्पक्ष नहीं रहने देता, और यह ट्रांसफर का उचित आधार बनता है।”
महत्वपूर्ण आदेश
हाईकोर्ट ने मामले में दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद पाया कि पति को सवाई माधोपुर में निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिल पा रही है, इसलिए न्याय के हित में दोनों मामलों को जयपुर ट्रांसफर करने का आदेश दिया गया है।
हाईकोर्ट ने सवाई माधोपुर अदालत में चल रहे केस संख्या 2093/2023 राज्य बनाम मनोज कुमार मीना को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, जयपुर मेट्रोपॉलिटन–I को ट्रांसफर किया है।
वहीं सवाई माधोपुर फैमिली कोर्ट के केस संख्या 185/2024 —- बनाम मनोज मीना को फैमिली कोर्ट संख्या 1, जयपुर महानगर में ट्रांसफर किया गया है।
भरण-पोषण देना होगा
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि मुकदमों का ट्रांसफर करने से पति को भरण-पोषण से कोई राहत नहीं मिलेगी।
फैमिली कोर्ट के 30 जून 2025 के आदेश के अनुसार, पति को प्रति माह ₹15,000 भरण-पोषण के रूप में देना होगा।