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ऋण दूसरे बैंक से टेकओवर कराने पर 2% प्री-पेमेंट चार्ज वैध, अनुबंध की शर्तों से मुकर नहीं सकता उधारकर्ता

Rajasthan High Court Upholds Bank’s Right to Levy Prepayment Charges on MSME Loans

हाईकोर्ट ने कहा जो व्यक्ति या संस्था अपनी मर्जी से किसी समझौते पर हस्ताक्षर करती है, वह बाद में उसी समझौते की शर्तों को गलत नहीं कह सकती।

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि यदि कोई एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) बैंक से ऋण लेते समय किसी शर्त को स्वीकार करता है, तो बाद में उस शर्त को केवल एमएसएमई नियमों का हवाला देकर गलत नहीं ठहराया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि समझौते की शर्तें दोनों पक्षों पर लागू होती हैं और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

जस्टिस डॉ. पुष्पेन्द्र सिंह भाटी और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने जिला अदालत के फैसले पर मुहर लगाते हुए याचिकाकर्ता अमरभाव पावर प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की याचिका को खारिज कर दिया हैं.

मामला क्या था

अमरभाव पावर प्राइवेट लिमिटेड ने अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए पंजाब नेशनल बैंक से कार्यशील पूंजी और टर्म लोन लिया था।

बैंक ने ऋण मंजूर करते समय एक स्वीकृति पत्र और बाद में एक हाइपोथेकशन (बंधक) समझौता कराया।

इस समझौते में साफ लिखा था कि यदि कंपनी तय समय से पहले ऋण बंद करती है और वह भी किसी दूसरे बैंक से पैसा लेकर, तो उसे 2 प्रतिशत प्री-पेमेंट (पूर्व भुगतान) शुल्क देना होगा।

कुछ समय बाद कंपनी ने किसी अन्य बैंक से फाइनेंस लेकर अपना पूरा ऋण समय से पहले चुका दिया।

इसके बाद पंजाब नेशनल बैंक ने समझौते के अनुसार 5.52 लाख रुपये प्री-पेमेंट शुल्क के रूप में वसूल किए।

कंपनी की आपत्ति

कंपनी ने इस शुल्क को गलत बताया।

कंपनी का कहना था कि वह एमएसएमई श्रेणी में आती है और “बैंकों की एमएसएमई प्रतिबद्धता संहिता” के अनुसार एमएसएमई से ऋण के समय से पहले भुगतान पर कोई शुल्क नहीं लिया जाना चाहिए।

कंपनी ने यह भी कहा कि बैंक खुद इस संहिता का पालन करने वाला है, इसलिए समझौते में लिखी प्री-पेमेंट शुल्क की शर्त अमान्य होनी चाहिए।

कंपनी ने बैंक से कई बार शिकायत की, बैंकिंग लोकपाल के पास भी गई, लेकिन जब वहां से राहत नहीं मिली तो उसने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

बैंक का जवाब

पंजाब नेशनल बैंक ने अदालत में कहा कि प्री-पेमेंट शुल्क पूरी तरह समझौते के अनुसार लिया गया है।

बैंक का कहना था कि एमएसएमई संहिता केवल अच्छे व्यवहार के लिए बनाई गई है, यह हर हाल में बाध्यकारी नहीं है।

बैंक ने यह भी दलील दी कि यह मामला साधारण पूर्व भुगतान का नहीं है, बल्कि दूसरे बैंक द्वारा ऋण टेकओवर का है।

ऐसे मामलों में समझौते में लिखी शर्त लागू होती है। बैंक के अनुसार कंपनी ने खुद इन शर्तों को मानकर समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, इसलिए अब वह इससे पीछे नहीं हट सकती।

हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि एमएसएमई संहिता और ऋण समझौते की शर्तें अलग-अलग परिस्थितियों के लिए हैं।

संहिता में बिना शुल्क ऋण चुकाने की बात तब लागू होती है, जब उधारकर्ता अपनी खुद की कमाई से ऋण चुकाता है।

अदालत ने कहा कि जब ऋण किसी दूसरे बैंक से पैसा लेकर बंद किया गया हो, तो उस स्थिति में समझौते की शर्त लागू होगी।

कोर्ट ने साफ कहा कि जो व्यक्ति या संस्था अपनी मर्जी से किसी समझौते पर हस्ताक्षर करती है, वह बाद में उसी समझौते की शर्तों को गलत नहीं कह सकती।

निचली अदालत का निर्णय सही

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि बैंक ने गलत राशि पर प्री-पेमेंट शुल्क लगाया। इसलिए वाणिज्यिक अदालत द्वारा कंपनी का दावा खारिज करना सही था।

अंत में अदालत ने कहा कि अपील में कोई दम नहीं है और निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा जाता है।

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