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राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला- राज्य मानवाधिकार आयोग पूर्व चैयरमेन जस्टिस टाटिया की दोहरी पेंशन की मांग खारिज

जोधपुर, 20 सितंबर

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश देते हुए राज्य मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश टाटिया द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें पूर्व संवैधानिक सेवा से मिल रही पेंशन के अतिरिक्त आयोगाध्यक्ष के कार्यकाल की भी अलग पेंशन देने की मांग की गई थी।

जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस अनुरूप सिंघी की खंडपीठ ने 24 जुलाई 2025 को सभी पक्षों की बहस के बाद फैसला सुरक्षित रखा था.

आज खंडपीठ ने इस मामले में अपना रिपोर्टेबल फैसला सुनाया.

कार्यकाल से पूर्व इस्तिफा

झारखंड हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस प्रकाश टाटिया राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष रहे हैं।

जस्टिस प्रकाश टाटिया 11 मार्च 2015 से 25 नवंबर 2019 तक करीब 3 वर्ष 8 माह तक राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष रहे थे।

बाद में उन्होंने निजी कारणों से कार्यकाल पूर्ण होने से पूर्व ही इस्तीफा दे दिया था।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि सेवा के दोनों पद अलग-अलग प्रकृति के हैं, इसलिए उन्हें अलग-अलग पेंशन का अधिकार मिलना चाहिए।

हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि न तो नियमों में दोहरी पेंशन का कोई प्रावधान है और न ही समानता (Parity) के सिद्धांत के आधार पर इसका दावा किया जा सकता है।

अदालत ने स्पष्ट कहा कि एक बार जब याचिकाकर्ता को पूर्व संवैधानिक सेवा से पेंशन मिल रही है, तो आयोग अध्यक्ष पद पर कार्यकाल के लिए अलग से पेंशन की कोई वैधानिक गारंटी नहीं है।

हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका को खारिज कर दिया कि कानून की दृष्टि से यह निराधार और विचारणीय नहीं है।

अनुच्छेद 226 में याचिका

जस्टिस प्रकाश टाटिया की ओर से दायर याचिका में कहा गया कि राज्य सरकार ने उनके मानवाधिकार आयोग में अध्यक्ष रहते हुए किए गए कार्यकाल की पेंशन देने से इंकार किया है, जो कि अवैध और मनमाना फैसला है।

जस्टिस टाटिया ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत यह रिट याचिका दाखिल की थी।

याचिका में कहा गया कि राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग (अध्यक्ष एवं सदस्यों के वेतन, भत्ते और अन्य सेवा शर्ते) नियम, 2002 (28 मई 2012 के संशोधन सहित) के तहत अध्यक्ष को पेंशन का अधिकार है। इसके बावजूद, उन्हें यह लाभ नहीं दिया गया।

जस्टिस टाटिया को सरकार से मिले 18 फरवरी 2020, 26 फरवरी 2024 और 15 मार्च 2024 के पत्रों के माध्यम से यह कहकर मना कर दिया गया कि वे पहले से ही मुख्य न्यायाधीश पद से पेंशन प्राप्त कर रहे हैं और इसलिए आयोग अध्यक्ष पद पर अलग से पेंशन के हकदार नहीं हैं।

सरकार और राजभवन का रुख

जस्टिस प्रकाश टाटिया ने पेंशन के आवेदन के लिए जून 2023 में राज्यपाल को प्रार्थना पत्र भेजा। बाद में यह फाइल गृह विभाग और विधि विभाग के बीच घूमती रही।

अंततः मार्च 2024 में राज्यपाल सचिवालय ने स्पष्ट किया कि उनका दावा स्वीकार्य नहीं है, इसलिए उन्हें दोहरी पेंशन नहीं दी जा सकती।

विभागीय नोटिंग में यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए जस्टिस महेंद्र भूषण शर्मा बनाम राज्य सरकार (2001) के फैसले का हवाला इस मामले में लागू नहीं होता, क्योंकि वह मामला लोकायुक्त से संबंधित था, न कि मानवाधिकार आयोग से।

क्या था कानूनी आधार

मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 26 के तहत सरकार वेतन और पेंशन से जुड़े नियम बना सकती है।

2012 में संशोधन के बाद अध्यक्ष व सदस्यों का वेतन और पेंशन हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और न्यायाधीशों के समान निर्धारित किया गया।

लेकिन सरकार का कहना है कि चूँकि याचिकाकर्ता पहले से मुख्य न्यायाधीश की पेंशन पा रहे हैं, इसलिए दूसरी पेंशन नहीं दी जा सकती।

जस्टिस प्रकाश टाटिया का सफर

जनवरी 2001: राजस्थान हाईकोर्ट के स्थायी न्यायाधीश बने।

वर्ष 2011: झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने और अगस्त 2013 में सेवानिवृत्त हुए।

इसके बाद: आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल, नई दिल्ली के अध्यक्ष बने।

11 मार्च 2015: राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष नियुक्त हुए।

25 नवंबर 2019: करीब 3 वर्ष 8 माह की सेवा के बाद निजी कारणों से इस्तीफा दिया।

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