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Rajasthan Highcourt का बड़ा फैसला: दहेज हत्या के आरोपियों की आजीवन कारावास की सजा रद्द, पति, सास और जेठ हुए बरी

जयपुर, 8 अक्टूबर

Rajasthan Highcourt ने दहेज हत्या के एक गंभीर मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए फास्ट ट्रैक कोर्ट, जोधपुर द्वारा दिए गए आजीवन कारावास के आदेश को निरस्त कर दिया है।

Rajasthan Highcourt ने आरोपी पति, सास और जेठ को बरी कर दिया, जबकि पति को धारा 498A (क्रूरता) के अपराध में दोषी मानते हुए पहले से भुगती हुई सजा के अनुसार रिहा करने का आदेश दिया।

जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस अनुरूप सिंघी की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन पक्ष दहेज हत्या का मामला साबित करने में विफल रहा है।

अदालत ने कहा कि इसलिए पति, सास और जेठ को आजीवन कारावास की सजा से बरी किया जाता है।

दहेज मामलों को लेकर टिप्पणी

Rajasthan Highcourt ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 498A के दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी चिंता जता चुका है।

अदालत ने कहा कि कई मामलों में यह पाया गया है कि ससुराल के पूरे परिवार को दबाव डालने के लिए आपराधिक मामलों में फंसा दिया जाता है।

Rajasthan Highcourt ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों को बेहद सतर्कता बरतनी चाहिए ताकि निर्दोष लोग झूठे मामलों में न फंसें।

बयानों में विरोधाभास बना आधार

Rajasthan Highcourt ने कहा कि कई गवाहों ने स्वीकार किया कि उन्होंने घटनाओं की जानकारी दूसरों से सुनी थी, न कि स्वयं देखी थी।

Rajasthan Highcourt ने माना कि विवाह की तारीख को लेकर परिजनों के अलग-अलग बयान आए — किसी ने 1994 तो किसी ने 1996 बताया।

दहेज की मांग के बारे में भी गवाहों ने अलग-अलग बातें कहीं — किसी ने ₹20,000 कहा, किसी ने फ्रिज, टी.वी., मोटरसाइकिल, तो किसी ने केवल कपड़े बताए।

बचाव पक्ष की दलील

आरोपियों की ओर से अधिवक्ता हेमंत सारस्वत और रेखा सांखला ने याचिका दायर कर दलील दी कि घटना के समय शिवा और पारस की शादी को सात वर्ष से अधिक हो चुके थे, इसलिए यह मामला धारा 304B के तहत नहीं आता।

अधिवक्ता ने कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास पाए गए और यह सिद्ध नहीं हो सका कि शिवा को मृत्यु से ठीक पहले दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था।

अदालत से कहा गया कि मामले में अब 22 वर्ष हो चुके हैं और अपील की लंबी सुनवाई के दौरान आरोपी ससुर तिलाराम का निधन हो गया।

अधिवक्ता ने लंबे समय से लंबित होने के चलते सजा को निलंबित करने की प्रार्थना की।

सरकार ने किया विरोध

राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष के सबूत आरोपियों के दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं और अपील खारिज की जानी चाहिए।

ये है मामला

21 फरवरी 2003 को पारिवादी नेमाराम ने पुलिस थाना लूणी में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उसकी बहन शिवा की शादी लगभग पांच वर्ष पूर्व सालावास निवासी पारस माली से दहेज देकर की गई थी।

भाई ने रिपोर्ट में आरोप लगाया कि दहेज की मांग को लेकर उसे ससुरालवालों ने जहर देकर मार दिया। एफआईआर में ₹20,000 और दो तोला सोने के लॉकेट की मांग का जिक्र था।

जोधपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट नंबर-1 ने वर्ष 2003 में टीलाराम, उसकी पत्नी तुलसीदेवी, बेटे पारस और बड़े बेटे भंवरलाल उर्फ गणेशराम को धारा 304B और 498A के तहत दोषी ठहराया।

अदालत ने सभी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

हालांकि, अपील के दौरान टीलाराम की मृत्यु हो गई, जिसके बाद हाईकोर्ट ने बाकी तीन आरोपियों के खिलाफ सुनवाई जारी रखी।

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