दिल्ली, 11 सितंबर
देश में कई बार ऐसा समय आया है जब नेत्रहीन और कम दृष्टि वाले उमीदवारों ने बड़े-बड़े एग्जाम पास किया है. देश में बहुत से डॉक्टर में जो नेत्र से जरूर काम है लेकिन उन्होंने एमबीबीएस जैसे कठिन एग्जाम पास कर समाज और देश में अपना लोहा मनवाया है. इन उम्मीदवारों ने ना केवल अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की है बल्कि इंटर्नशिप भी पूरी की है। उन्होंने यह साबित किया कि दिव्यांगता उनके ज्ञान और सेवाभाव में बाधा नहीं बन सकती। लेकिन जब नौकरी के अवसरों की बारी आती है, तो वही उम्मीदवार दर-दर की टोकरे खानी पड़ती है. ऐसा ही एक मामला दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंचा और अब यह बड़ा मुद्दा बन गया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इसी मुद्दे पर UPSC और केंद्र सरकार के कई विभागों से जवाब मांगा। अदालत ने पूछा है कि संयुक्त चिकित्सा सेवा परीक्षा (CMSE) में नेत्रहीन और कम दृष्टि वाले उम्मीदवारों के लिए एक प्रतिशत आरक्षण क्यों लागू नहीं किया गया।
UPSC समेत कई विभागों को नोटिस
चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव गेडेला की पीठ ने UPSC, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT), केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (DEPwD) को नोटिस जारी किया है। अदालत ने चार हफ्ते में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है अब इस मामले की अगली सुनवाई 3 दिसंबर को होगी।
संगठन ने उठाई आवाज़
यह याचिका मिशन एक्सेसिबिलिटी नामक संगठन की ओर से दाखिल की गई हैं याचिकाकर्ता का कहना है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की धारा 34(1)(a) में स्पष्ट है कि हर भर्ती चक्र में नेत्रहीन और कम दृष्टि वाले उम्मीदवारों के लिए कम से कम 1 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य है। संगठन ने अदालत को बताया कि उसके एक सदस्य ने CMSE-2024 में बतौर नेत्रहीन उम्मीदवार परीक्षा दी थी। उन्होंने PwBD श्रेणी के लिए निर्धारित न्यूनतम अंक भी प्राप्त किए, लेकिन इस श्रेणी के लिए रिक्तियों की अनुपस्थिति के कारण उन्हें साक्षात्कार के लिए नहीं बुलाया गया।
2025 की अधिसूचना में भी निराशा
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इस साल भी वही स्थिति है। CMSE-2025 की अधिसूचना में कुल 705 पद विज्ञापित किए गए, लेकिन नेत्रहीन या कम दृष्टि वाले उम्मीदवारों के लिए एक भी पद आरक्षित नहीं किया गया। इससे फिर आशंका है कि 2024 जैसी स्थिति इस बार भी दोहराई जाएगी।
क्यों अहम है यह मामला
जब देश में डॉक्टरों की भारी कमी है, ऐसे समय में एक योग्य और प्रशिक्षित नेत्रहीन डॉक्टरों को सेवा के अवसरों से वंचित करना न केवल अव्यावहारिक है बल्कि अन्यायपूर्ण भी। यह वे लोग हैं जिन्होंने अपनी अपनी कड़ी मेहनत और संघर्ष के बाद डिग्री और इंटर्नशिप पूरी कर ली है और अब समाज की सेवा करने के लिए तैयार हैं। लेकिन जब सरकारी नौकरी की बारी आई, तो यह कहकर किनारे कर दिया गया कि इस श्रेणी के लिए कोई पद ही नहीं है। यही संघर्ष अब अदालत तक पहुंचा है और अब यह बड़ा मुद्दा बन गया है।