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SARFAESI कानून पर Rajasthan Highcourt हाईकोर्ट की बड़ी व्याख्या: नीलामी का विज्ञापन/नोटिस के बाद कर्जदार का संपत्ति पर कोई अधिकार (‘राइट ऑफ रिडेम्पशन’) नहीं

Right of Redemption Ends After Auction Notice: Rajasthan High Court’s Major Interpretation of SARFAESI Act

जोधपुर, 1 दिसंबर

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने एक अहम आदेश पारित करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि बैंक द्वारा नीलामी की सार्वजनिक सूचना या विज्ञापन (सेल नोटिस) प्रकाशित करने के साथ ही कर्जदार का ‘राइट ऑफ रिडेम्पशन’ पूरी तरह समाप्त हो जाता है।

जस्टिस डॉ. नुपूर भाटी की एकल पीठ ने यह व्यवस्था कैनरा बैंक के पूर्व कर्मचारी लकी गर्ग की रिट याचिका खारिज करते हुए दी है।

हाईकोर्ट ने कहा कि संशोधित सरफेसी (SARFAESI) कानून और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद अब कोर्ट भी इस अधिकार को पुनर्जीवित नहीं कर सकती।

नोटिस के बाद कोई अधिकार नहीं

जस्टिस डॉ. नुपूर भाटी की एकल पीठ ने अपने आदेश में कहा कि सरफेसी एक्ट की संशोधित धारा 13(8) के अनुसार, यदि कर्जदार नीलामी की सार्वजनिक सूचना प्रकाशित होने से पहले संपूर्ण बकाया (चार्ज और खर्च सहित) चुका देता है, तभी संपत्ति का ट्रांसफर रोका जा सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार सेल नोटिस या विज्ञापन प्रकाशित हो जाने के बाद न कर्जदार रिडेम्पशन का दावा कर सकता है, न ही कोई अदालत इस अधिकार को बहाल कर सकती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में बैंक 10 नवंबर को नोटिस जारी कर चुका था, इसलिए नीलामी को रोकने का कोई आधार नहीं है।

नीलामी पर रोक से इनकार

राजस्थान हाईकोर्ट ने इसके साथ ही याचिकाकर्ता की इस मांग को भी खारिज कर दिया कि उसकी संपत्ति की नीलामी रोकी जाए।

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की सेवा-निवृत्ति लाभ—ग्रेच्युटी, लीव इनकैशमेंट और एनपीएस में जमा करीब 19.59 लाख रुपये को लोन समायोजन में उपयोग करने की अनुमति देने की मांग को भी खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने बैंक को इस मामले में कोई भी निर्देश देने से इंकार किया।

ये है मामला

श्रीगंगानगर निवासी लकी गर्ग ने याचिका दायर कर मांग की थी कि उनके पदमपुर स्थित करीब 1249 वर्गफुट के आवासीय मकान की नीलामी पर रोक लगाई जाए।

गर्ग ने वर्ष 2014 में 24 लाख रुपये का होम लोन लिया था और उस समय वे सिंडिकेट बैंक (वर्तमान में कैनरा बैंक) में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर कार्यरत थे।

9 अक्टूबर 2024 को कदाचार के आरोपों में उनकी सेवा समाप्त कर दी गई, जिसके बाद वे किस्तें जमा नहीं कर पाए और खाता एनपीए घोषित किया गया।

इसके बाद बैंक ने 21 दिसंबर 2024 को 17.93 लाख रुपये बकाया का नोटिस भेजा।

गर्ग का कहना था कि वे अपने सेवा-निवृत्ति लाभों के माध्यम से भुगतान करना चाहते थे, लेकिन बैंक ने 16 जनवरी 2025 को पत्र भेजकर लंबित देनदारी के चलते उनके NPS क्लेम को आगे बढ़ाने से इंकार कर दिया।

बकाया नहीं चुकाए जाने पर कैनरा बैंक ने 10 नवंबर 2025 को पदमपुर स्थित मकान की नीलामी के लिए बिक्री अधिसूचना प्रकाशित की।

बैंक ने इसमें 18.45 लाख रुपये की वसूली के लिए 29 नवंबर 2025 को नीलामी की तारीख तय की थी।

नीलामी के इसी नोटिस को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से नीलामी पर रोक की मांग की थी।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले का हवाला

बैंक की ओर से उपस्थित लॉ ऑफिसर ऋतिका अग्रवाल ने तर्क रखा कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एम. राजेंद्रन व अन्य बनाम मेसर्स केपीके ऑयल्स मामले में स्पष्ट किया है कि नीलामी की सार्वजनिक सूचना जारी होते ही कर्जदार का संपत्ति को छुड़ाने का अधिकार (Right of Redemption) समाप्त हो जाता है।

बैंक ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार याचिकाकर्ता का दावा कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।

क्या है ‘राइट ऑफ रिडेम्पशन’?

‘राइट ऑफ रिडेम्पशन’ वह अधिकार है जिसके तहत कर्जदार बकाया राशि चुका कर अपनी गिरवी रखी संपत्ति को वापस पा सकता है।

यह अधिकार ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट में निहित है।

लेकिन सरफेसी एक्ट में संशोधन और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों ने इसकी सीमा निर्धारित कर दी है।

अब यह अधिकार केवल उस समय तक जीवित रहता है जब तक बैंक नीलामी की सार्वजनिक सूचना जारी नहीं कर देता।

नोटिस प्रकाशित होते ही संपत्ति को छुड़ाने की कोई कानूनी गुंजाइश नहीं बचती।

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