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संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत “आश्रय का अधिकार” पूर्ण अधिकार नहीं – Rajasthan Highcourt

RAJASTHAN HIGHCOURT JAPUR

SARFAESI एक्ट की धारा 13(2) और 13(4) को चुनौती देने वाली याचिका खारिज

जयपुर, 3 नवंबर

Rajasthan Highcourt ने एक महत्वपूर्ण और रिपोर्टेबल जजमेंट में यह स्पष्ट किया है कि “यदि कोई व्यक्ति यह जानते हुए कि उसके नाम पर केवल एक ही संपत्ति है और इसके बावजूद वह व्यापारिक उद्देश्य या लोन के लिए उसे बंधक रखता है, तो ऋण अदायगी न होने की स्थिति में संपत्ति की नीलामी एक स्वाभाविक परिणाम है।”

Rajasthan Highcourt ने कहा कि ऐसे में इस तरह के मामले को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और आश्रय के अधिकार (Article 21) का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने यह आदेश अलवर के कोटपूतली निवासी शंकरलाल सैनी व उनके 7 अन्य परिजनों की ओर से दायर याचिकाओं पर दिया है

Rajasthan Highcourt ने SARFAESI अधिनियम, 2002 की धारा 13(2) और 13(4) को चुनौती देने वाली इन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।

Rajasthan Highcourt ने कहा कि जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अपनी संपत्ति को ऋण के बदले बंधक रखता है, तो बकाया अदायगी न होने की स्थिति में उस संपत्ति की नीलामी को “जीवन या आश्रय के अधिकार” का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता।

एकमात्र घर है…

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता रविंद्र सैनी और मयंक सिंघल दलील पेश करते हुए अदालत से कहा कि परिवार जिस संपत्ति में रह रहा है, वही उनकी एकमात्र आवासीय संपत्ति है।

अधिवक्ता ने कहा कि एकमात्र आश्रय स्थल को जब्त करना या नीलाम करना संवैधानिक अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत “जीवन और आश्रय के अधिकार” का उल्लंघन है।

अधिवक्ताओं ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 60 के तहत किसी व्यक्ति के आवासीय मकान को जब्त नहीं किया जा सकता, विशेषकर जब वह व्यक्ति उसके रहने का एकमात्र स्थान हो।

अधिवक्ता ने 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले In Re: Directions in the matter of demolition of structures (2024 INSC 866) का हवाला देते हुए कहा कि “घर का अधिकार” मानव गरिमा से जुड़ा है और इसे छीना नहीं जा सकता।

कानून का उद्देश्य पहले से तय…

याचिका के जवाब में केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल भरत व्यास, भारतीय रिजर्व बैंक और लोन देने वाली यूग्रो कैपिटल लिमिटेड की ओर से अधिवक्ता सी.एस. सिन्हा, अविनाश कुम्भाज, पियूष नाग, संकल्प विजय और प्रियम अग्रवाल ने पैरवी की।

केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल भरत व्यास ने कहा कि सरकार के अनुसार, अधिनियम का उद्देश्य बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा दिए गए ऋणों की शीघ्र वसूली सुनिश्चित करना है, ताकि देश की वित्तीय प्रणाली स्वस्थ रह सके।

उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं ने स्वयं यह संपत्ति व्यावसायिक प्रयोजन से गिरवी रखी थी, यह जानते हुए कि यही उनका एकमात्र घर है।
ऐसे में अब वे “आश्रय के अधिकार” का हवाला देकर ऋण वापसी से बच नहीं सकते।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया व अन्य की ओर से हाईकोर्ट को बताया गया कि यह अधिनियम पहले ही सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले मार्डिया केमिकल्स लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2004) 4 SCC 311 में संवैधानिक रूप से वैध ठहराया जा चुका है।

हाईकोर्ट का फैसला

सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि SARFAESI अधिनियम का उद्देश्य बैंकों को त्वरित वसूली का अधिकार देना है और यह संविधान के अनुरूप है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति व्यावसायिक लाभ के लिए अपनी संपत्ति गिरवी रखता है, तो उसे परिणामों की जिम्मेदारी भी लेनी होगी।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्ति के “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता” की रक्षा करता है, लेकिन यह अधिकार “कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया” से परे नहीं है।

हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 60(1) में कुछ संपत्तियों को मिली जब्ती से छूट को लेकर कहा कि इसमें केवल कृषि भूमि, कारीगरों के उपकरण और घरेलू सेवकों तक सीमित हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह सुरक्षा केवल “ऋणग्रस्त कृषकों या मजदूरों” जैसी श्रेणियों के लिए है, और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए लिए गए ऋण पर लागू नहीं होती।

पूर्ण अधिकार नहीं

हाईकोर्ट ने आश्रय के अधिकार को लेकर भी स्पष्ट किया कि “आश्रय का अधिकार” मानव गरिमा का एक अंग है, लेकिन यह “पूर्ण अधिकार” नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि यदि किसी संपत्ति को कानूनी प्रक्रिया के तहत अधिग्रहित किया जा रहा है, तो इसे मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा जा सकता।

“घर का होना व्यक्ति को सम्मान और सुरक्षा की भावना देता है। लेकिन जब कोई व्यक्ति कानूनन अपनी संपत्ति को गिरवी रखता है और उस ऋण की अदायगी नहीं करता, तो कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई को अनुचित नहीं कहा जा सकता।”

ये है मामला

याचिकाकर्ता: कोटपूतली निवासी शंकरलाल सैनी, उनकी पत्नी सरोज देवी, पुत्र गणेश सैनी सहित परिवार ने वर्ष 2023 में यूग्रो कैपिटल लिमिटेड से लगभग ₹1.94 करोड़ का व्यावसायिक ऋण लिया था।

इसके बदले में याचिकाकर्ता ने अपनी 480 वर्ग गज के प्लॉट नंबर 56 व 57 को गिरवी रखा

मामले में ऋण न चुकाने पर संस्था ने खाता एनपीए (NPA) घोषित कर सरफेसी अधिनियम की धारा 13(2) के तहत नोटिस13(4) के तहत कब्ज़ा लेने की प्रक्रिया शुरू की।

मामले में याचिकाकर्ता परिवार की याचिका पहले ऋण वसूली अधिकरण (DRT) में खारिज हुई, जिसके बाद उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट में अधिनियम की संवैधानिकता को चुनौती दी।

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