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Rajasthan Highcourt : JDA ट्रिब्यूनल से जुड़े विवादों की सुनवाई आर्टिकल 227 के तहत

Rajasthan High Court Questions Maintainability of JDA Case Under Article 226 or 227

कृषि भूमि पर बिना रूपांतरण (conversion) के मैरिज गार्डन या अन्य कॉमर्शियल गतिविधियां गैरकानूनी

जयपुर, 4 नवंबर

राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) और JDA ट्रिब्यूनल से जुड़े विवादों की सुनवाई से जुड़े एक मामले में रिपोर्टेबल जजमेंट देते हुए एक ओर जहां सुनवाई को लेकर स्थिती स्पष्ट की हैं.

वही JDA क्षेत्राधिकार में चल रहे मैरिज गार्डन को लेकर हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया हैं कि कृषि भूमि पर बिना रूपांतरण (conversion) के मैरिज गार्डन या अन्य व्यावसायिक गतिविधियां चलाना गैरकानूनी है.

जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने कहा कि यदि किसी अन्य व्यक्ति ने भी बिना अनुमति ऐसे गार्डन संचालित कर रखे हैं, तो यह “नकारात्मक समानता (Negative Equality)” नहीं बनाता — यानी एक की गलती को दूसरे की अनुमति नहीं कहा जा सकता.

कार्रवाई के आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने JDA को आदेश दिया कि वह यह जांच करे कि क्या राजधानी जयपुर में अन्य मैरिज गार्डन भी मास्टर प्लान या अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन कर संचालित हो रहे हैं.

हाईकोर्ट ने आदेश दिया हैं​ कि मास्टर प्लान के अनुसार संचालित नही होने पर मैरिज गार्डन के खिलाफ समान कार्रवाई की जाए.

अधिकारियों को चेतावनी

राजस्थान हाईकोर्ट ने उन अधिकारियों को भी चेतावनी दी हैं जो कार्रवाई के लिए “पिक एंड चूज़” नीति अपनाते हैं.

हईकोर्ट ने कहा कि ज़ोनल अधिकारी और आयुक्त JDA पर भी कार्रवाई की जाएगी यदि उन्होंने “पिक एंड चूज़” नीति अपनाई है.

JDA ट्रिब्यूनल की सुनवाई का अधिकार

राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) और JDA ट्रिब्यूनल से जुड़े विवादों की सुनवाई को लेकर अपना फैसला सुनाया हैं.

हाईकोर्ट ने स्पष्ट्र किया कि JDA ट्रिब्यूनल से जुड़े विवादों की सुनवाई आर्टिकल 227 के तहत ही की जाएगी, न कि आर्टिकल 226 के तहत.

जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि JDA ट्रिब्यूनल, भले ही सिविल कोर्ट के रूप में नामित न हो, लेकिन यह न्यायिक कार्य करती है और सिविल कोर्ट जैसी शक्तियों से संपन्न है.

हाईकोर्ट ने कहा कि इसलिए, ऐसे मामलों में हाईकोर्ट की सुपरवाइजरी जुरिस्डिक्शन (Article 227) लागू होगी.

हाईकोर्ट ने कहा कि JDA ट्रिब्यूनल को 1982 के जयपुर विकास प्राधिकरण अधिनियम की धारा 83 के तहत गठित किया गया है, जो सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां देता है।

ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेशों को चुनौती रिट याचिका (Article 226) के माध्यम से नहीं दी जा सकती.

अदालत ने कहा कि रजिस्ट्री (Registry) केवल औपचारिक त्रुटियों की ओर ध्यान दिला सकती है, लेकिन याचिका की स्वीकार्यता (maintainability) का निर्णय केवल न्यायालय का अधिकार क्षेत्र है।

अदालत ने साफ कहा कि 1982 का अधिनियम अन्य सभी स्थानीय या उप-विधियों (bye-laws) पर प्रभावी (overriding effect) रखता है.

मैरिज गार्डन सीज करने का विवाद

जेडीए की मैरिज गार्डन के खिलाफ कार्रवाई के मामले में कानूनी बिंदू उभरने पर मामला हाईकोर्ट के समक्ष आया.

जिसमें याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर JDA और संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई को चुनौती दी है।

याचिका में जेडीए द्वारा जारी किए गए नोटिस को JDA के अधिकार क्षेत्र से बाहर (without jurisdiction) बताया.

जेडीए ने 12 मार्च 2025 को संपत्ति सील करने की कार्रवाई, जिसे याचिकाकर्ता ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन और मनमानी बताया.

न्यायिक क्षेत्राधिकार का कानूनी बिंदू

याचिकाकर्ता ने JDA Tribunal के 15 जुलाई 2025 के आदेश को भी चुनौती जिसमें जयपुर विकास अपीलीय ट्रिब्यूनल ने संपत्ति की सीलिंग को बरकरार रखते हुए याचिकाकर्ता को भूमि रूपांतरण (land conversion) कराने का आदेश दिया था.

इस मामले में दायर यचिका के न्यायिक क्षेत्राधिकार के कानूनी बिंदू पर सवाल ​खड़ा किया गया.

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में सबसे पहले यह तय करना आवश्यक है कि —क्या यह याचिका आर्टिकल 226 (Writ Jurisdiction) के तहत सही तरीके से दायर की गई है,
या फिर मामला आर्टिकल 227 (Supervisory Jurisdiction) के अंतर्गत सुनवाई योग्य है, क्योंकि विवादित ट्रिब्यूनल का आदेश एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण (Quasi-Judicial Authority) यानी JDA Tribunal से जारी हुआ है.

क्या हैं दोनो में भिन्न

संविधान का अनुच्छेद 226 हाईकोर्ट को किसी भी व्यक्ति या संस्था को आदेश, निर्देश या रिट जारी करने की शक्ति देता है.

जबकि अनुच्छेद 227 हाईकोर्ट को अपने क्षेत्राधिकार के भीतर आने वाले सभी न्यायालयों और ट्रिब्यूनलों की निरीक्षण-सुपरवाइजरी शक्ति प्रदान करता है.

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