राजस्थान हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अनुसूचित क्षेत्र कोई “कानूनी द्वीप” नहीं हैं, जो सभी सामान्य कानूनों से स्वतः बाहर हो जाएं।
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने अनुसूचित (Scheduled) क्षेत्रों से जुड़े एक महत्वपूर्ण संवैधानिक विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि केवल किसी क्षेत्र के अनुसूचित घोषित होने मात्र से उस पर राज्य के सामान्य कानूनों का स्वतः निषेध नहीं हो जाता।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक संविधान की पाँचवीं अनुसूची के पैरा 5(1) के तहत राज्यपाल द्वारा कोई विशेष अधिसूचना जारी कर किसी कानून को अपवर्जित या संशोधित नहीं किया जाता, तब तक वह कानून अनुसूचित क्षेत्रों में भी लागू रहेगा।
यह ऐतिहासिक फैसला जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने ग्राम पंचायत बलीचा व अन्य ग्राम पंचायतों के ग्रामीणों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया।
इन याचिकाओं में राजस्थान के विभिन्न अनुसूचित क्षेत्रों को नगर निगम—नगर पालिका सीमा में शामिल करने को चुनौती दी गई थी।
याचिका में दलीलें
याचिकाकर्ताओं ने राज्य सरकार द्वारा जारी उन अधिसूचनाओं को चुनौती दी थी, जिनके माध्यम से अनुसूचित क्षेत्रों में स्थित ग्राम पंचायतों और गांवों को नगर निगम/नगर पालिका क्षेत्रों में शामिल किया गया।
याचिकाओं में दलीलें पेश की गईं कि संविधान के अनुच्छेद 244(1) तथा पाँचवीं अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्रों को विशेष संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है और ऐसे क्षेत्रों में नगर पालिका कानून (राजस्थान म्युनिसिपैलिटीज एक्ट, 2009) लागू नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि अनुच्छेद 243-ZC के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में भाग IX-A (नगर पालिकाओं से संबंधित प्रावधान) लागू नहीं होता, इसलिए राज्य सरकार को इन क्षेत्रों को शहरी सीमा में शामिल करने का अधिकार नहीं है।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि पाँचवीं अनुसूची का पैरा 5(1) राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि वे किसी कानून को अनुसूचित क्षेत्र में लागू न होने या संशोधन के साथ लागू होने का निर्देश दें।
सरकार ने कहा कि लेकिन जब तक ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया जाता, तब तक राज्य या केंद्र का सामान्य कानून अनुसूचित क्षेत्रों में भी लागू रहता है।
सरकार ने यह भी कहा कि राजस्थान म्युनिसिपैलिटीज एक्ट, 2009 के तहत नगर पालिका सीमाओं का विस्तार या पुनर्गठन एक नीतिगत और विधायी निर्णय है, जिसमें न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश सीमित है।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि अनुसूचित क्षेत्र कोई “कानूनी द्वीप” नहीं हैं, जो सभी सामान्य कानूनों से स्वतः बाहर हो जाएं।
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान की पाँचवीं अनुसूची एक नियंत्रित तंत्र प्रदान करती है, जिसके तहत सामान्य कानून लागू रहते हैं, जब तक कि राज्यपाल विशेष रूप से उन्हें अपवर्जित या संशोधित न कर दें।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के South Eastern Coalfields Ltd. बनाम मध्य प्रदेश राज्य और Adivasis for Social & Human Rights Action बनाम भारत संघ जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि पैरा 5(1) कोई “पूर्व शर्त” नहीं है, बल्कि एक अपवर्जनात्मक शक्ति है।
यानी कानून तब तक लागू रहेगा, जब तक राज्यपाल उसे हटाने का निर्णय न लें।
अनुसूचित क्षेत्र का दर्जा बरकरार
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी अनुसूचित क्षेत्र को नगर निगम या नगर पालिका सीमा में शामिल किए जाने से उसका अनुसूचित दर्जा समाप्त नहीं होता। पाँचवीं अनुसूची के तहत मिलने वाला संवैधानिक संरक्षण, आदिवासी अधिकार, भूमि सुरक्षा और अन्य विशेष प्रावधान यथावत बने रहते हैं।
हाईकोर्ट के अनुसार, शहरी सीमा में शामिल होने का अर्थ यह नहीं है कि आदिवासी हितों की अनदेखी होगी, बल्कि प्रशासनिक और नागरिक सुविधाओं के बेहतर प्रबंधन के लिए यह कदम उठाया जा सकता है।
याचिकाएं खारिज
इन सभी तथ्यों और कानूनी व्याख्याओं के आधार पर हाईकोर्ट ने ग्राम पंचायत बलीचा सहित अन्य मामलों में दायर याचिकाओं को खारिज कर दिया और राज्य सरकार की अधिसूचनाओं को वैध ठहराया।