नई दिल्ली। चुनावी वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दायर हुई है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार समेत कुछ चुनाव अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की गई है।
याचिका में SIR के दौरान वोटर लिस्ट में हुए कथित बदलावों और करीब 13 करोड़ नाम हटाए जाने के दावे की स्वतंत्र जांच कराने की मांग भी की गई है।
अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत यह याचिका दायर की है। इसमें जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत शिकायत दर्ज कर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
याचिका में केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, कैबिनेट सचिव, वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग और चुनाव आयोग की आईटी प्रमुख सीमा खन्ना समेत अन्य को पक्षकार बनाया गया है।
SIR में कई बदलावों पर उठाए सवाल
याचिका में आरोप लगाया गया है कि SIR से जुड़े कुछ फैसले, दिशा-निर्देश और सॉफ्टवेयर में बदलाव बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना किए गए। याचिकाकर्ता ने ऐसे फैसलों को गैरकानूनी और अमान्य घोषित करने की मांग की है।
इस मामले में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से SIR से जुड़े कुछ फैसलों पर आपत्ति दर्ज किए जाने का भी जिक्र है।
याचिका में दावा किया गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई मौकों पर वोटर के नाम जोड़ने, हटाने, बहाल करने और वोटर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में बदलाव से जुड़े फैसलों पर आपत्ति जताई थी।
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 का भी हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि अगर मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे चुनाव आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद हो, तो फैसला बहुमत की राय के आधार पर होना चाहिए।
Form 6 में बदलाव पर भी आपत्ति जताई
याचिका में वोटर का नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में किए गए बदलाव को भी चुनौती दी गई है। आरोप है कि फॉर्म में आवेदक या उसके रिश्तेदारों के पुराने SIR वोटर लिस्ट में शामिल होने से जुड़ी जानकारी मांगी गई।
याचिकाकर्ता का कहना है कि इस बदलाव पर चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने आपत्ति जताई थी। आपत्ति यह थी कि कानून में तय वैधानिक Form 6 को बदलने के लिए Registration of Electors Rules, 1960 में भी बदलाव करना जरूरी है।
इसके बावजूद ऑनलाइन फॉर्म में बदलाव किए जाने का आरोप लगाया गया है। याचिका में मांग की गई है कि Form 6 का पुराना वैधानिक प्रारूप फिर से लागू किया जाए और वोटर का नाम जोड़ने के लिए वही जानकारी मांगी जाए, जो कानून में तय है।
13 करोड़ नाम हटाने के दावे की जांच की मांग
याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि SIR के दौरान 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 13 करोड़ नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए। इन्हीं दावों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट से स्वतंत्र जांच की मांग की गई है।
याचिकाकर्ता ने एक ऐसी जांच समिति या विशेष जांच दल गठित करने की मांग की है, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज करें। इसमें साइबर सुरक्षा और सूचना प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञों को भी शामिल करने का प्रस्ताव है।
ECINet और ERONet की फॉरेंसिक जांच की मांग
याचिका में ECINet और ERONet सिस्टम की फॉरेंसिक जांच कराने की मांग भी की गई है।
इसके साथ ही 1 अक्टूबर 2025 से जुड़े सर्वर लॉग, डाटाबेस, आधिकारिक बातचीत और मेटाडाटा को सुरक्षित रखने का निर्देश मांगा गया है, ताकि जांच के दौरान रिकॉर्ड उपलब्ध रहे।
याचिकाकर्ता का कहना है कि डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि SIR के दौरान हुए बदलावों और लिए गए फैसलों की जांच की जा सके। जांच के जरिए यह पता लगाने की मांग की गई है कि वोटर लिस्ट में बदलाव कैसे हुए और इसके लिए कौन जिम्मेदार था।
वोटर डेटाबेस के केंद्रीकरण पर भी सवाल उठाया
याचिका में वोटर लिस्ट के डिजिटल डेटाबेस को केंद्रीकृत किए जाने का भी मुद्दा उठाया गया है। आरोप है कि इससे वोटर लिस्ट तैयार करने और उसमें बदलाव करने की जिम्मेदारी रखने वाले स्थानीय अधिकारियों की डिजिटल पहुंच और भूमिका प्रभावित हुई।
याचिका में आरोप है कि वोटर लिस्ट से हटे कुछ पात्र लोगों के नाम ECINet सिस्टम के जरिए दोबारा नहीं जोड़े जा सके। इसमें गोवा के 97 मतदाताओं का भी जिक्र है, जिनके नाम फिर से वोटर लिस्ट में शामिल करने का मामला था।
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि वोटर लिस्ट से जुड़े डिजिटल सिस्टम में स्थानीय Electoral Registration Officers यानी EROs की जरूरी डिजिटल पहुंच और भूमिका फिर से बहाल की जाए।
पश्चिम बंगाल की 16.10 लाख अपीलों पर सवाल
याचिका में पश्चिम बंगाल में मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट में शामिल किए जाने के खिलाफ दाखिल बताई गई करीब 16.10 लाख अपीलों का भी मुद्दा उठाया गया है।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि ये अपीलें चुनाव आयोग के नाम पर उन मतदाताओं के खिलाफ दाखिल की गईं, जिनके नाम न्यायिक अधिकारियों के आदेश के बाद वोटर लिस्ट में शामिल किए गए थे।
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि इन अपीलों को दाखिल करने की मंजूरी किसने दी और इसके लिए किस अधिकारी को अधिकृत किया गया था।
याचिका में इन 16.10 लाख अपीलों को रद्द करने के साथ ही इन्हें दाखिल करने की प्रक्रिया की जांच कराने और जिम्मेदारी तय करने की मांग की गई है।
आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला होना बाकी
फिलहाल यह याचिका में लगाए गए आरोप और मांगी गई राहतें हैं। इन पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला अभी नहीं आया है। सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों को सही ठहराने वाला कोई न्यायिक निष्कर्ष अभी नहीं दिया है।
दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने कहा है कि SIR समेत आयोग के फैसले सभी तीन चुनाव आयुक्तों की मंजूरी और सहमति से लिए गए थे। इसलिए याचिका में लगाए गए आरोपों को फिलहाल याचिकाकर्ता का पक्ष मानकर ही देखा जाना चाहिए।