रिश्वत मांगने के मामलों में धारा 17-A की आड़ नहीं ले सकते अधिकारी, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की विशेष अनुमति याचिकाएं खारिज
नई दिल्ली। भ्रष्टाचार के मामलों में जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र को लेकर लंबे समय से चली आ रही बहस पर Supreme Court of India ने एक बार फिर स्थिति स्पष्ट करते हुए महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य के अंदर होने वाले भ्रष्टाचार के मामलों में राज्य की एसीबी को कार्रवाई का पूर्ण अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने रिपोर्टेबल फैसले में कहा है कि यदि कोई केंद्रीय सरकारी कर्मचारी राज्य की सीमा में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध करता है, तो उस राज्य की एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) को प्राथमिकी दर्ज करने, जांच करने और चार्जशीट दाखिल करने का पूरा अधिकार है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसके लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की पूर्व अनुमति या सहमति आवश्यक नहीं है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट, जयपुर पीठ के 3 अक्टूबर 2025 के फैसले पर मुहर लगाते हुए यह फैसला दिया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक गौड़ उपस्थित हुए, जबकि राजस्थान की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता (Additional Advocate General) शिव मंगल शर्मा, ने पक्ष रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि हाईकोर्ट ने कानून की सही व्याख्या की है और उसमें हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
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राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला
यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ राज्य एसीबी द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार के मामलों की वैधता को चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि चूंकि वे केंद्र सरकार के कर्मचारी हैं, इसलिए उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच केवल CBI ही कर सकती है।
राज्य की एसीबी को न तो मामला दर्ज करने का अधिकार है और न ही जांच कर चार्जशीट दाखिल करने का।
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा था कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत यदि अपराध राज्य की सीमा में हुआ है, तो राज्य की एसीबी को कार्रवाई करने से रोका नहीं जा सकता। इसी आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दो कानूनी सवाल
राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अनिल दायमा व अन्य ने अपील दायर करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को गलत बताया।
अपील में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दो मुख्य कानूनी बिंदु रखे गए, जिसमें —
- क्या राज्य की एसीबी को यह अधिकार है कि वह केंद्र सरकार के कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर जांच कर सके, यदि अपराध राज्य की सीमा में हुआ हो?
- यदि एसीबी द्वारा बिना CBI की अनुमति के चार्जशीट दाखिल की जाती है, तो क्या वह कानूनन वैध मानी जाएगी?
हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों प्रश्नों का उत्तर स्पष्ट करते हुए कहा कि किसी राज्य की सीमा में होने वाले भ्रष्टाचार के मामले की जांच के लिए एसीबी को पूरा अधिकार क्षेत्र प्राप्त है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कहना गलत है कि केवल CBI ही ऐसे मामलों में अभियोजन शुरू कर सकती है। यदि अपराध राज्य की सीमा में घटित हुआ है, तो राज्य की जांच एजेंसी को कानूनन अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने माना कि राजस्थान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों और संबंधित कानूनों का गहन अध्ययन कर सही निष्कर्ष निकाला है।
धारा 17-A को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से यह दलील भी दी गई कि उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17-A का संरक्षण दिया जाना चाहिए।
इस धारा के अनुसार, किसी लोक सेवक द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान लिए गए निर्णयों या सिफारिशों से जुड़े मामलों में जांच से पहले सक्षम प्राधिकारी की अनुमति आवश्यक होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की दलील
अपील में दिए गए इस तर्क को सुप्रीम कोर्ट ने सिरे से खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि —
“धारा 17-A का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को नीतिगत निर्णयों के कारण परेशान किए जाने से बचाना है, न कि रिश्वत मांगने या अवैध धन लेने जैसे मामलों को संरक्षण देना।”
पीठ ने कहा कि यह मामला अवैध रिश्वत की मांग से जुड़ा है, जो किसी भी तरह से “आधिकारिक निर्णय” या “नीतिगत सिफारिश” की श्रेणी में नहीं आता। इसलिए धारा 17-A का लाभ ऐसे मामलों में नहीं दिया जा सकता।
‘रिश्वत की मांग’ पर कोई ढाल नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि धारा 17-A की व्याख्या इतनी व्यापक नहीं की जा सकती कि वह रिश्वतखोरी जैसे गंभीर अपराधों को ढाल प्रदान करे।
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि ऐसा किया गया, तो यह भ्रष्टाचार से लड़ने की पूरी व्यवस्था को कमजोर कर देगा।
अदालत ने कहा कि “डिमांड ऑफ इल्लीगल ग्रैटिफिकेशन” यानी अवैध लाभ की मांग अपने आप में एक स्वतंत्र और गंभीर अपराध है, जिस पर किसी तरह की पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती।
सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) को खारिज करने का आदेश दिया है।