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नगरपालिकाओं के चुनाव में देरी पर हाईकोर्ट की सख्ती, कहा- लोकतंत्र की जड़ें नहीं होनी चाहिए कमजोर

जयपुर, 20 सितंबर

राजस्थान हाईकोर्ट ने नगरपालिकाओं के चुनावों में हो रही देरी पर कड़ी नाराजगी जताई है और स्पष्ट कहा है कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की जड़ें जमीनी स्तर पर मजबूत रहनी चाहिए.

संविधान के अनुच्छेद 243U और राजस्थान नगर पालिका अधिनियम, 2009 की धारा 7 व 322(4) के अनुसार किसी भी नगरपालिका का कार्यकाल पांच वर्ष से अधिक नहीं हो सकता और अधिकतम छह माह का ही विस्तार दिया जा सकता है।

अदालत ने कहा कि अधिकांश नगरपालिकाओं का कार्यकाल पहले ही पूरा हो चुका है और छह माह की सीमा भी जुलाई 2025 में समाप्त हो गई है,

इसके बावजूद उपखंड अधिकारियों (SDO) को प्रशासक बनाकर पद पर बनाए रखा गया है। यह संविधान और लोकतंत्र दोनों की आत्मा के खिलाफ है।

याचिकाए खारिज

राजस्थान हाईकोर्ट ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया है, जिनमें पूर्व अध्यक्ष ने नगरपालिकाओं में अध्यक्ष (चेयरमैन) बने रहने का अधिकार मांगा था।

अदालत ने स्पष्ट किया कि पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा हो जाने के बाद उनका इस पद पर बने रहने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।

मणिपुर हाईकोर्ट के फैसले का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में मणिपुर हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला दिया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया था कि पंचायतों और नगर निकायों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद चुनाव कराना राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग का संवैधानिक दायित्व है.

मणिपुर में पंचायत अधिनियम में संशोधन कर ‘सीज़’ शब्द की जगह ‘कंटीन्यू’ किया गया था, जिसे अदालत ने असंवैधानिक करार दिया था क्योंकि इससे जनप्रतिनिधियों का कार्यकाल अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ा दिया गया था।

राजस्थान सरकार और निर्वाचन आयोग पर सवाल

अदालत ने राजस्थान सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी कर चुनावों को टालना न केवल स्थानीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक है, बल्कि शासन व्यवस्था को भी अव्यवस्थित कर देता है.

अदालत ने चेतावनी दी कि चुनाव कराने में लगातार विफलता और अनुचित देरी की स्थिति में निर्वाचन आयोग को हस्तक्षेप कर आवश्यक कदम उठाने होंगे।

सेवाओं और विकास पर असर

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि नगरपालिकाओं के चुनावों में लगातार टालमटोल से शहरी क्षेत्रों में विकास कार्य और बुनियादी सेवाएं गंभीर रूप से प्रभावित होंगी। इससे शासन का शून्य पैदा होगा और लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर पड़ेगी।

मुख्य सचिव और निर्वाचन आयोग को आदेश

अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आदेश की प्रति मुख्य सचिव, राजस्थान सरकार, भारत निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग को भेजते हुए कहा कि वे तत्काल आवश्यक कदम उठाकर संविधान के अनुच्छेद 243U और अधिनियम की धारा 322(4) के अनुरूप चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करें।

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