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अजमेर दरगाह ब्लास्ट मामला : Supreme Court में दरगाह खादिम की अपील मंजूर, राजस्थान सरकार को नोटिस, बरी हुए आरोपियों के खिलाफ होगी सुनवाई

upreme Court steps in on Phalodi accident tragedy; 15 killed, hearing set for November 11.

नई दिल्ली, 8 नवंबर

Supreme Court ने 2007 के बहुचर्चित अजमेर दरगाह ब्लास्ट मामले में एक अहम आदेश सुनाते हुए मामले में दरगाह शरीफ के खादिम सैयद सरवर चिश्ती की अपील को मंजूर कर लिया है।

अजमेर दरगाह ब्लास्ट मामला वर्ष 2007 का है, जिसमें तीन लोगों की मौत और कई घायल हुए थे।

NIA की विशेष अदालत जयपुर ने 10 साल के लंबे ट्रायल के बाद 8 मार्च 2017 को फैसला सुनाया था।

NIA अदालत ने दो आरोपियों को दोषी करार दिया था, जबकि असीमानंद सहित कई अन्य को बरी कर दिया था।

इस फैसले के खिलाफ दरगाह शरीफ के खादिम सैयद सरवर चिश्ती ने फौजदारी अपील दायर की थी।

लेकिन अपील 90 दिनों की वैधानिक सीमा के बाद दाखिल की गई थी, जिसके कारण राजस्थान हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार करने से इंकार करते हुए खारिज कर दिया था।

Supreme Court ने अब राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए खादिम सैयद सरवर चिश्ती की ओर से दायर की गई अपील की 1135 दिनों की देरी को माफ कर दिया है।

Supreme Court ने अपील पर राज्य सरकार को नोटिस भी जारी किया है।

अपील में दलील

अपील में देरी माफ करने को लेकर दलील दी गई कि धारा 21(5) की कठोर व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है, क्योंकि यह न्याय पाने के मौलिक अधिकार को सीमित करती है।

अपील में कहा गया कि अपील का अधिकार न्यायपूर्ण प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है, और केवल तकनीकी आधार पर इसे समाप्त नहीं किया जा सकता।

अधिवक्ताओं ने यह भी कहा कि एनआईए द्वारा जांचे गए मामलों में अपील की समय-सीमा अन्य मामलों से अलग रखना अनुचित वर्गीकरण है और अनुच्छेद 14 के समानता के अधिकार के विपरीत है।

सुनवाई के दौरान मंगूराम बनाम दिल्ली नगर निगम तथा मो. अबाद अली बनाम निदेशालय राजस्व खुफिया जैसे फैसलों का हवाला दिया गया, जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अपील का अधिकार और न्याय तक पहुंच अनुच्छेद 21 के तहत सुनिश्चित न्यायपूर्ण प्रक्रिया का हिस्सा है।

Supreme Court का आदेश

Supreme Court ने सभी दलीलों को सुनने के बाद अपील को मंजूर करते हुए राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया और 1135 दिन की देरी को माफ कर दिया।

Supreme Court ने इसके साथ ही शिकायतकर्ता को अपील के गुण-दोष पर सुनवाई का अवसर प्रदान किया, ताकि बरी किए गए आरोपियों के खिलाफ शिकायत को प्रक्रियात्मक कारणों से नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर परखा जा सके।

संघ प्रचारकों की सजा का एकमात्र केस

एनआईए मामलों की विशेष कोर्ट ने अपने फैसले में दो आरएसएस प्रचारकों — सुनील जोशी व देवेंद्र गुप्ता — सहित संघ कार्यकर्ता भावेश पटेल को आपराधिक षड्यंत्र, धार्मिक भावनाएं भड़काने के अपराध और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत दोषी करार दिया था।

तत्कालीन पीठासीन अधिकारी दिनेश गुप्ता ने एक आरोपी की मृत्यु के बाद भी उसे दोषी घोषित किया था। तीसरे आरोपी सुनील जोशी की 2007 में मृत्यु हो गई थी।

वहीं इस मामले में कोर्ट ने आरोपी असीमानंद, भरतमोहन रतेश्वर, हर्षद सोलंकी, मुकेश वासाणी, लोकेश शर्मा, चंद्रशेखर लेवे और मेहुल को बरी कर दिया था।

इन आरोपियों को बरी करने के फैसले के खिलाफ खादिम सैयद सरवर चिश्ती ने अपील दायर की थी।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपील को देरी से दायर करना बताते हुए खारिज कर दिया था।

4 चार्जशीट

इस मामले में पहली चार्जशीट एटीएस ने 20 अक्टूबर 2010 को (मामला संख्या 92/2010) तीन लोगों — देवेंद्र गुप्ता उर्फ बॉबी उर्फ रमेश, चंद्रशेखर लेवे व लोकेश शर्मा उर्फ कालू उर्फ अजय उर्फ अभय — के खिलाफ पेश की।

दूसरी चार्जशीट NIA ने 92-ए तारीख 27 अप्रैल 2011 को आरोपी बड़ौदा निवासी हर्षद उर्फ मुन्ना उर्फ राज और गोधरा निवासी मुकेश वासाणी के खिलाफ पेश की थी।

तीसरी चार्जशीट (92-बी) 18 जुलाई 2011 को नवकुमार उर्फ स्वामी असीमानंद, भरतमोहन रतेश्वर, संदीप डांगे, रामचंद्र, सुनील जोशी उर्फ मनोज (मास्टरमाइंड), सुरेश नायर, अमित उर्फ प्रिंस उर्फ हकला उर्फ सन्नी के खिलाफ पेश की थी।

वहीं चौथी चार्जशीट (92-सी) 29 अक्टूबर 2013 को मफत उर्फ मेहुल और भावेश अरविंद भाई पटेल के खिलाफ पेश की गई थी।

पक्षद्रोह के बावजूद सजा

देश के न्यायिक इतिहास में ऐसे बहुत कम केस सामने आते हैं जब उसके अधिकांश गवाह पक्षद्रोही घोषित हो जाएं, इसके बावजूद आरोपियों को सजा हो।

इस मामले में अभियोजन की ओर से करीब साढ़े चार सौ दस्तावेज पेश किए गए थे और 149 गवाहों के बयान दर्ज कराए गए थे।

जबकि बचाव पक्ष से 38 दस्तावेज पेश किए गए थे।

कोर्ट में पेश किए गए 149 गवाहों में से 26 गवाह कोर्ट में अपने बयानों से मुकर गए थे।

अभियोजन के गवाहों के बयानों से पलटने के बाद एनआईए ने इन्हें मामले में पक्षद्रोही घोषित करवाया था।

बड़ी संख्या में गवाहों के मुकरने के बावजूद अभियोजन पक्ष कोर्ट में आरोप साबित करने में कामयाब रहा।

3 की मौत, 15 घायल

अजमेर की दरगाह शरीफ में 11 अक्टूबर 2007 को यह घटना अंजाम दी गई। दरगाह में दो टाइमर बम प्लांट किए गए थे, जिनमें से एक में विस्फोट हुआ।

इस ब्लास्ट में 3 लोगों की मौत हो गई और 15 लोग घायल हुए थे।

जांच में सामने आया कि विस्फोट एक ही बम में हुआ था जबकि दूसरा फटा नहीं, जिससे बड़ा नुकसान होने से बच गया।

संघ के बड़े नेताओं के नाम

देश में पहली बार किसी बड़े अपराध में संघ के बड़े नेताओं के नाम जुड़े थे।

अजमेर दरगाह ब्लास्ट मामले में शुरुआती जांच में बड़ा मोड़ तब आया, जब राजस्थान एटीएस ने इस मामले की जांच अपने हाथ में लेते हुए आरएसएस से जुड़े लोगों को आरोपी बनाया।

एटीएस ने इंद्रेश कुमार, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, स्वामी असीमानंद सहित कुल 14 लोगों को आरोपी बनाया।

इस मामले में सबसे पहले गिरफ्तारी संघ से जुड़े संगठन के भावेश पटेल की हुई।

बाद में इस मामले की जांच वर्ष 2011 में NIA को सौंपी गई।

NIA ने इस मामले में इंद्रेश कुमार, असीमानंद, प्रज्ञा ठाकुर को मुख्य आरोपी बनाया।

हालांकि जांच की शुरुआत में ही इंद्रेश कुमार को क्लीन चिट दे दी गई, लेकिन असीमानंद और प्रज्ञा ठाकुर को गिरफ्तार कर अन्य आरोपियों के साथ जेल भेज दिया गया।

सरकार बदली, क्लीन चिट

वर्ष 2011 में एनआईए ने अपनी चार्जशीट में इंद्रेश कुमार को ब्लास्ट के आरोपियों में शामिल किया था।

वर्ष 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार के आने के बाद NIA का रुख बदल गया।

NIAने पहले इंद्रेश कुमार, फिर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और अंततः असीमानंद को क्लीन चिट दे दी।

शुरुआती चार्जशीट में इंद्रेश कुमार का नाम शामिल था, जिसमें कहा गया था कि जयपुर के गुजराती भवन में बैठकर उन्होंने इस साजिश की योजना बनाई थी।

असीमानंद का बयान

NIA ने इस मामले में कुल 149 गवाह पेश किए और यह साबित करने का प्रयास किया कि असीमानंद और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के निर्देश पर इस घटना को अंजाम दिया गया।

लेकिन कोर्ट में गवाही के दौरान 26 गवाह अपने बयान से मुकर गए।

असीमानंद भी अपने पहले के बयान से पलट गए, जिसमें उसने कहा था कि उसके कहने पर ही इस घटना को अंजाम दिया गया।
असीमानंद ने कहा कि कांग्रेस सरकार में उन पर दबाव डालकर वह बयान दिलवाए गए थे।

आरोपी की हत्या

NIA की ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में तीन आरोपियों — भावेश पटेल, देवेंद्र गुप्ता और सुनील जोशी — को दोषी करार दिया था।

इस मामले का एक पहलू यह भी था कि दोषी घोषित किए गए आरएसएस प्रचारक सुनील जोशी की घटना के दो महीने बाद ही गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

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