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क्या निजी जानकारी देने पर पूरी तरह रोक सही? RTI कानून में संशोधन को चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट कर रहा विचार, केंद्र से मांगा जवाब

Supreme Court Examines Challenge to RTI Amendment on Disclosure of Personal Information

नई दिल्ली: सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई किसी व्यक्ति की निजी जानकारी क्या हर हाल में छिपाई जा सकती है? अगर वही जानकारी किसी बड़े जनहित से जुड़ी हो, तो क्या उसे सामने लाने की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए?

सूचना के अधिकार कानून (RTI) में हुए बदलाव को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट अब इसी अहम सवाल पर विचार कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि निजी जानकारी के खुलासे को लेकर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय कानून में संतुलित और उचित तरीका अपनाना जरूरी हो सकता है।

अब केंद्र सरकार इस संशोधन के पक्ष में अपना जवाब दाखिल करेगी।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ सूचना के अधिकार कानून में किए गए उस बदलाव को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिसके बाद निजी जानकारी के खुलासे को लेकर पहले मौजूद जनहित की छूट हटा दी गई है।

मामला सूचना का अधिकार कानून की धारा 8(1)(जे) में हुए बदलाव से जुड़ा है। यह बदलाव डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के जरिए किया गया था।

अब सुप्रीम कोर्ट को यह देखना है कि क्या इस तरह निजी जानकारी के खुलासे पर रोक लगाना संविधान के मुताबिक सही है।

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सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि सवाल यह है कि क्या सभी डिजिटल निजी जानकारी के खुलासे पर पूरी तरह रोक लगाई जा सकती है या फिर कानून को संतुलित तरीका अपनाना होगा।

यानी कोर्ट यह देख रहा है कि क्या निजी जानकारी होने भर से किसी सूचना को रोक दिया जाना चाहिए या यह भी देखा जाए कि उस जानकारी का किसी सार्वजनिक काम या बड़े जनहित से संबंध है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि सूचना का अधिकार कानून का दायरा काफी बड़ा है। यह सिर्फ डिजिटल जानकारी तक सीमित नहीं है।

वहीं डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट मुख्य रूप से डिजिटल निजी जानकारी से जुड़ा है। यहीं से दोनों कानूनों के बीच संतुलन का सवाल खड़ा होता है।

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पहले जनहित में जानकारी देने की थी छूट

संशोधन से पहले आरटीआई कानून की धारा 8(1)(जे) में निजी जानकारी को लेकर स्पष्ट व्यवस्था थी।

अगर किसी जानकारी का सार्वजनिक काम या जनहित से कोई संबंध नहीं था, या उसके खुलासे से किसी व्यक्ति की निजता में अनुचित दखल होता था, तो उसे देने से इनकार किया जा सकता था।

लेकिन इसमें एक अहम अपवाद भी था। अगर संबंधित अधिकारी को लगता था कि किसी जानकारी का खुलासा बड़े जनहित में जरूरी है, तो निजी जानकारी होने के बावजूद उसे सार्वजनिक किया जा सकता था।

यानी पुराने नियम में निजता की सुरक्षा के साथ जनहित को भी जगह दी गई थी।

नए बदलाव में इसी जनहित वाली छूट को हटा दिया गया है। अब याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे निजी जानकारी को लेकर पहले मौजूद संतुलन खत्म हो गया है।

अभी सुप्रीम कोर्ट इसी बात पर विचार कर रहा है कि संशोधन के बाद यह संतुलन खत्म हो गया है या नहीं।

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कानून में बदलाव से क्या बदला?

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने कहा कि इस संशोधन से आरटीआई कानून में निजी जानकारी के खुलासे को लेकर पहले मौजूद संतुलन बदल गया है।

पहले निजी जानकारी की सुरक्षा के साथ यह भी देखा जाता था कि किसी मामले में बड़ा जनहित है या नहीं। अगर जनहित ज्यादा महत्वपूर्ण होता था, तो जानकारी सामने लाने की गुंजाइश रहती थी।

अब यह रास्ता हटा दिया गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि हर निजी जानकारी को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता।

कई मामलों में किसी व्यक्ति से जुड़ी जानकारी सरकारी फैसले, भ्रष्टाचार या किसी बड़े सार्वजनिक मुद्दे को समझने के लिए जरूरी हो सकती है।

लेकिन नए संशोधन ने इस संतुलन को खत्म कर दिया है। अब कोई भी निजी जानकारी, भले ही वह भ्रष्टाचार या सत्ता के दुरुपयोग को उजागर करती हो, साझा नहीं की जा सकती।

ऐसे में हर निजी जानकारी के खुलासे पर रोक लगाने से आरटीआई के जरिए सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का मकसद प्रभावित हो सकता है।

पत्रकारों के लिए अहम मामला

सुनवाई के दौरान अधिवक्ता निशा भंभानी और प्रशांत भूषण ने इस बदलाव का असर पत्रकारिता पर पड़ने की बात भी उठाई।

उनकी दलील थी कि खोजी पत्रकारिता में सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों की अहम भूमिका होती है।

कई बार इन्हीं रिकॉर्ड के जरिए भ्रष्टाचार, सरकारी गड़बड़ी या किसी मामले में सत्ता के दुरुपयोग का पता चलता है।

प्रशांत भूषण ने यह भी दलील दी कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून में पत्रकारों के लिए ऐसी स्पष्ट छूट नहीं है, जिससे इस तरह की रिपोर्टिंग आसान हो।

यानी अगर सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद कोई जानकारी निजी डेटा की श्रेणी में आ जाती है, तो उसके इस्तेमाल पर पत्रकारों के सामने नई मुश्किल खड़ी हो सकती है।

दो अधिकारों का मामला

इस मामले की सबसे अहम कड़ी दो मौलिक अधिकार हैं।

एक तरफ नागरिकों का सूचना का अधिकार है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) से जोड़ा जाता है। दूसरी तरफ व्यक्ति की निजता का अधिकार है, जिसे सुप्रीम कोर्ट मौलिक अधिकार मान चुका है।

सुप्रीम कोर्ट के सामने अब सवाल यह है कि दोनों अधिकारों के बीच सीमा कैसे तय की जाए।

क्या किसी व्यक्ति की निजता की रक्षा के लिए हर निजी जानकारी को छिपा दिया जाए?

या फिर ऐसा कोई तरीका हो जिसमें निजता भी सुरक्षित रहे और बड़े जनहित की जानकारी सामने आने का रास्ता भी पूरी तरह बंद न हो?

केंद्र सरकार ने मांगा समय

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय मांगा।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार अपने हलफनामे में इस संशोधन को सही ठहराने के लिए अपना पक्ष रखेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को समय दे दिया है। साथ ही इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी मामले में पक्षकार बनाया गया है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस संशोधन पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है।

अब अगली सुनवाई में केंद्र सरकार को यह बताना होगा कि निजी जानकारी के खुलासे पर रोक लगाने वाली नई व्यवस्था क्यों जरूरी है और इसे संविधान के तहत कैसे सही ठहराया जा सकता है।

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