नई दिल्ली : कार या बाइक का बीमा खरीदते समय सिर्फ प्रीमियम देखकर फैसला करना अब भारी पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मोटर वाहन बीमा को लेकर बड़ा फैसला सुनाते हुए अलग-अलग इंश्योरेंस पॉलिसियों का दायरा साफ किया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कॉम्प्रिहेंसिव (पैकेज) पॉलिसी को सामान्य थर्ड पार्टी बीमा के बराबर नहीं माना जा सकता। ऐसी पॉलिसी में सिर्फ दूसरे व्यक्ति का नुकसान ही नहीं, बल्कि वाहन मालिक और गाड़ी में बैठे लोगों को भी बीमा सुरक्षा मिलती है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने कहा कि कॉम्प्रिहेंसिव (पैकेज) पॉलिसी का दायरा ज्यादा व्यापक है और इसे सामान्य थर्ड पार्टी बीमा की तरह नहीं देखा जा सकता।
फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार आसान भाषा में मोटर इंश्योरेंस की चार प्रमुख श्रेणियों का फर्क भी समझाया।
कोर्ट ने साथ ही बीमा नियामक IRDAI से कहा कि बीमा खरीदने वाले हर ग्राहक को अलग-अलग कवर की जानकारी आसान भाषा में दी जाए, ताकि वह अपनी जरूरत के हिसाब से सही विकल्प चुन सके।
दरअसल नई कार या बाइक खरीदते समय ज्यादातर लोग बीमा तो करा लेते हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि उनकी पॉलिसी में क्या-क्या कवर है। कई लोग यह मान लेते हैं कि हर मोटर इंश्योरेंस एक जैसा होता है, जबकि ऐसा नहीं है।
गलत पॉलिसी चुनने की वजह से हादसे के बाद कई बार मुआवजा मिलने में भी परेशानी आती है। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए मोटर इंश्योरेंस के अलग-अलग प्रकार आसान भाषा में समझाए हैं।
कैसे पहुंचा मामला सुप्रीम कोर्ट?
यह मामला तेलंगाना के टी. रामू से जुड़ा है। 13 जुलाई 1996 को वे अपनी कार से अपने गांव लौट रहे थे। रास्ते में एक अज्ञात ट्रक ने उनकी कार को पीछे से टक्कर मार दी। इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
ट्रक का पता नहीं चल सका, इसलिए परिवार ने उनकी कार की कॉम्प्रिहेंसिव इंश्योरेंस पॉलिसी के आधार पर मुआवजे की मांग की।
मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि मालिक के व्यक्तिगत जोखिम के लिए अलग से प्रीमियम नहीं दिया गया था।
हालांकि, तेलंगाना हाईकोर्ट ने यह फैसला पलट दिया और परिवार को करीब 10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया।
इस फैसले को बीमा कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
हालांकि, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामलों में जरूरत से ज्यादा तकनीकी आधार पर फैसला नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में व्यावहारिक और न्यायसंगत नजरिया अपनाना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बीमा कंपनियां पॉलिसी की शर्तों को इस तरह स्पष्ट करें कि आम ग्राहक भी आसानी से समझ सके कि उसे किस स्थिति में कितना कवर मिलेगा और किस स्थिति में दावा स्वीकार नहीं होगा।
कोर्ट ने IRDAI से भी कहा कि सभी मोटर इंश्योरेंस पॉलिसियों की जानकारी सरल और स्पष्ट भाषा में ग्राहकों तक पहुंचाई जाए, ताकि लोग अपनी जरूरत के अनुसार सही पॉलिसी चुन सकें।
सुप्रीम कोर्ट ने समझाया पॉलिसियों का फर्क
फैसले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर इंश्योरेंस की अलग-अलग पॉलिसियों का दायरा अलग होता है।
इसलिए वाहन मालिकों के लिए यह समझना जरूरी है कि कौन-सी पॉलिसी में क्या कवर मिलता है और कौन-सा कवर अतिरिक्त प्रीमियम पर उपलब्ध होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी दौरान मोटर इंश्योरेंस की चार प्रमुख पॉलिसियों का फर्क भी विस्तार से समझाया।
पहली- थर्ड पार्टी बीमा
यह कानून के तहत अनिवार्य बीमा है। इसके बिना कोई भी वाहन सड़क पर नहीं चलाया जा सकता। यह दूसरे व्यक्ति की मौत, चोट या संपत्ति के नुकसान की भरपाई करता है, लेकिन आपकी अपनी गाड़ी के नुकसान को कवर नहीं करता।
दूसरी- कॉम्प्रिहेंसिव (पैकेज) पॉलिसी
यह सबसे व्यापक कवर देने वाली पॉलिसी है। इसमें वाहन में बैठे लोगों, चालक और कई अन्य जोखिमों के लिए भी सुरक्षा मिल सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसे सामान्य थर्ड पार्टी बीमा के बराबर नहीं माना जा सकता।
तीसरी- ओन डैमेज कवर
यह वैकल्पिक पॉलिसी है। इसमें दुर्घटना, आग, चोरी या अन्य कारणों से आपकी अपनी गाड़ी को हुए नुकसान की भरपाई की जाती है। इसका दायरा पॉलिसी की शर्तों पर निर्भर करता है।
चौथी- कमर्शियल वाहन बीमा
यह ट्रक, बस और अन्य व्यावसायिक वाहनों के लिए होता है। इसमें थर्ड पार्टी जोखिम के साथ वाहन, उसमें मौजूद सामान और कई अन्य जोखिमों का भी कवर मिलता है।
कॉम्प्रिहेंसिव पॉलिसी क्यों अलग है?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना मामलों में बहुत तकनीकी नजरिया नहीं अपनाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2009 के आईआरडीए के सर्कुलर का भी हवाला दिया और कहा कि कॉम्प्रिहेंसिव या पैकेज पॉलिसी के तहत वाहन में बैठे लोगों को भी बीमा सुरक्षा मिलती है।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के फैसले को सही माना और बीमा कंपनी की दलीलों को खारिज कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कॉम्प्रिहेंसिव पॉलिसी को केवल थर्ड पार्टी बीमा मानकर उसकी व्याख्या नहीं की जा सकती। दोनों का दायरा और लाभ अलग-अलग हैं।
बीमा खरीदने का तरीका बदलेगा
सुप्रीम कोर्ट ने आईआरडीएआई के सामने एक नई व्यवस्था का सुझाव भी रखा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब भी कोई व्यक्ति ऑनलाइन या ऑफलाइन मोटर इंश्योरेंस खरीदे, तो उसे एक कस्टमर ऑप्शन फॉर्म दिया जाए।
इसमें सभी उपलब्ध कवर, उनकी सुविधाएं और प्रीमियम साफ-साफ लिखे हों।
ग्राहक अपनी जरूरत के अनुसार जिन कवर को लेना चाहे, उनके सामने बने विकल्प पर निशान लगाकर उन्हें चुन सके।
इससे लोगों को बिना जानकारी के पॉलिसी खरीदने की समस्या काफी हद तक खत्म हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बीमा कंपनियां अपनी वेबसाइट पर कॉम्प्रिहेंसिव पॉलिसी के फायदे आसान भाषा में दिखाएं, ताकि ग्राहक फैसला लेने से पहले पूरी जानकारी पढ़ सकें।
बीमा खरीदने से पहले इन 4 बातों का रखें ध्यान
- सिर्फ प्रीमियम नहीं, मिलने वाला कवर देखें।
- थर्ड पार्टी और कॉम्प्रिहेंसिव पॉलिसी का अंतर समझें।
- पॉलिसी के एक्सक्लूजन (क्या कवर नहीं होगा) जरूर पढ़ें।
- जरूरत हो तो अतिरिक्त ऐड-ऑन कवर भी लें।
वाहन मालिकों के लिए अहम फैसला
यह फैसला सिर्फ एक बीमा विवाद तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि हर मोटर इंश्योरेंस पॉलिसी एक जैसी नहीं होती और हर पॉलिसी का दायरा अलग है।
अगर वाहन मालिक सिर्फ सबसे सस्ती पॉलिसी देखकर बीमा कराते हैं, तो हादसे के समय उन्हें उम्मीद के मुताबिक सुरक्षा नहीं मिल सकती।
इसलिए बीमा खरीदते समय यह समझना जरूरी है कि कौन-सी पॉलिसी क्या कवर करती है और किसके लिए अलग प्रीमियम देना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने बीमा कंपनियों को भी निर्देश दिया है कि वे ग्राहकों को अलग-अलग कवर, उनके फायदे और प्रीमियम की स्पष्ट जानकारी दें, ताकि बीमा खरीदते समय वे सोच-समझकर अपना विकल्प चुन सकें।