जोधपुर: राजस्थान की जोजरी, बांडी और लूणी नदियों में प्रदूषण का मामला अब सिर्फ गंदा पानी छोड़ने वाले उद्योगों पर कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने इन नदियों की निगरानी और संरक्षण के लिए स्थायी व्यवस्था बनाने के निर्देश दिए हैं, ताकि प्रदूषण रोकने के लिए अलग-अलग विभागों की कार्रवाई के बजाय सभी एजेंसियां मिलकर काम करें।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को राजस्थान में एक अलग रिवर कमीशन या रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी बनाने का निर्देश दिया है।
साथ ही राज्य सरकार को सात दिन में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में इंटीग्रेटेड कोऑर्डिनेशन ग्रुप गठित करना होगा, ताकि प्रदूषण से जुड़े अलग-अलग विभागों की कार्रवाई को एक साथ जोड़ा जा सके।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि जोजरी-बांडी-लूणी नदी तंत्र के लिए अब अलग-अलग विभागों की कार्रवाई से काम नहीं चलेगा।
नदी कॉरिडोर की वैज्ञानिक पहचान, हाई फ्लड लाइन और इकोलॉजिकल बफर जोन तय करने के साथ-साथ औद्योगिक प्रदूषण, भूजल, अतिक्रमण और अवैध खनन पर भी एक साथ काम करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि जब तक हाई फ्लड लाइन और इकोलॉजिकल बफर जोन का वैज्ञानिक तरीके से निर्धारण नहीं हो जाता, तब तक चिन्हित नदी कॉरिडोर में नए औद्योगिक, व्यावसायिक या आवासीय निर्माण की अनुमति नहीं दी जाएगी।
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7 दिन में बनेगी खास टीम
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को सात दिन के अंदर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में इंटीग्रेटेड कोऑर्डिनेशन ग्रुप बनाने का निर्देश दिया है।
इसमें पर्यावरण, वन, जल संसाधन, उद्योग, शहरी विकास, राजस्व, स्थानीय निकाय, कृषि और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समेत संबंधित विभागों के अधिकारी शामिल किए जा सकेंगे।
इस ग्रुप का काम अलग-अलग विभागों के बीच तालमेल बनाना और कोर्ट के निर्देशों पर हो रही कार्रवाई की निगरानी करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति के साथ चर्चा कर तीन सप्ताह में पूरी समाधान योजना तैयार करने को कहा है।
इसमें हर काम की जिम्मेदारी, उसकी समय सीमा और निगरानी की व्यवस्था साफ तौर पर तय करनी होगी।
नदी किनारे नए निर्माण पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने नदियों को सुरक्षित रखने के लिए हाई फ्लड लाइन और इकोलॉजिकल बफर जोन को जरूरी माना है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी रिपोर्ट में बताया गया कि इन सीमाओं का वैज्ञानिक तरीके से निर्धारण नहीं होने से नदी के आसपास औद्योगिक विकास, नदी तल में अतिक्रमण और बाढ़ वाले इलाकों में निर्माण बढ़ता गया।
इसी को देखते हुए कोर्ट ने राजस्थान की नदी प्रणालियों में हाई फ्लड लाइन और जरूरी इकोलॉजिकल बफर जोन का वैज्ञानिक तरीके से निर्धारण करने को कहा है।
जब तक यह काम पूरा नहीं होता, चिन्हित नदी कॉरिडोर में नए उद्योग, व्यावसायिक गतिविधियों या आवासीय निर्माण को मंजूरी नहीं दी जाएगी।
कांकाणी में उद्योगों पर सवाल
जोधपुर के कांकाणी में प्रस्तावित रीको औद्योगिक क्षेत्र को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के सामने रखी रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 12.805 हेक्टेयर जमीन संभावित हाई फ्लड एरिया में आती है।
वहीं प्रस्तावित प्रस्तावित टेक्सटाइल यूनिट लूणी नदी से करीब 30 से 60 मीटर की दूरी पर बताई गई हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले हाई फ्लड लाइन और इकोलॉजिकल बफर जोन का वैज्ञानिक तरीके से निर्धारण किया जाए। इसके बाद कांकाणी के प्रस्तावित औद्योगिक क्षेत्र के लेआउट की दोबारा समीक्षा की जाए।
अगर इस जमीन का कोई हिस्सा नदी के बाढ़ क्षेत्र या इकोलॉजिकल बफर जोन में आता है, तो औद्योगिक लेआउट में जरूरी बदलाव करने होंगे। जरूरत पड़ने पर कुछ औद्योगिक भूखंडों को दूसरी जगह भी किया जा सकता है।
अंबे वैली पर भी जांच
लूणी नदी के पास अंबे वैली इंडस्ट्रियल पार्क को लेकर भी कोर्ट ने मुख्य सचिव को जांच के निर्देश दिए हैं।
विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में कृषि जमीन के इस्तेमाल में बदलाव, मास्टर प्लान से अलग विकास और आवासीय इस्तेमाल के लिए तय जमीन पर औद्योगिक भूखंड विकसित करने जैसे मुद्दे उठाए गए हैं।
नदी तल और हाई फ्लड एरिया के पास जमीन के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल सामने आए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव से जमीन के इस्तेमाल में बदलाव, मंजूरियों और भूखंडों के आवंटन की जांच कर जरूरी कार्रवाई करने को कहा है।
SIT को भी फटकार
नदी प्रदूषण से जुड़े आपराधिक मामलों की जांच कर रही एसआईटी की कार्रवाई पर भी सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई।
एसआईटी ने जोधपुर, पाली और बालोतरा में नदी प्रदूषण से जुड़े 16 मामलों की समीक्षा की है। इनमें चार एफआईआर दर्ज की गई हैं और कुछ लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गंभीर धाराएं जोड़ने और गिरफ्तारियां करने की कार्रवाई सुनवाई की तारीख नजदीक आने पर तेज हुई। इससे एसआईटी की कार्रवाई की नीयत पर सवाल उठता है।
सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी को जांच को और आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं।
उसे यह पता लगाना होगा कि बिना ट्रीटमेंट वाला औद्योगिक पानी नदी तक कैसे पहुंचा और इसमें किसकी भूमिका रही।
जांच में सरकारी अधिकारियों, उद्योगों और सीईटीपी से जुड़े लोगों की भूमिका भी देखी जाएगी।
अगर किसी की मिलीभगत या लापरवाही सामने आती है तो उसके खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई करनी होगी।
कोर्ट ने साफ कहा कि जांच सिर्फ गंदा पानी छोड़ने वाले उद्योग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। पूरे मामले की कड़ी और उससे जुड़े फैसलों की भी जांच होनी चाहिए।
CETP पर कम होगी निर्भरता
औद्योगिक गंदे पानी को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने कई निर्देश दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट यानी सीईटीपी पर ज्यादा निर्भर रहने से कई जगह इनकी क्षमता पर दबाव बढ़ रहा है। गंदे पानी को लंबी दूरी तक ले जाने में भी जोखिम रहता है।
इसीलिए रोजाना 100 किलोलीटर या उससे ज्यादा औद्योगिक गंदा पानी निकालने वाली इकाइयों में तकनीकी और आर्थिक रूप से संभव होने पर अपना ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की संभावना देखने को कहा गया है।
छोटे उद्योगों में भी ऐसे प्लांट को बढ़ावा देने के निर्देश दिए गए हैं।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि मौजूदा सीईटीपी की जरूरत खत्म हो जाएगी। कोर्ट ने उनकी क्षमता और काम करने के तरीके को बेहतर करने पर भी जोर दिया है।
लक्ष्य जीरो लिक्विड डिस्चार्ज की तरफ बढ़ना है।
यानी उद्योगों से निकलने वाले गंदे पानी को ट्रीटमेंट के बाद दोबारा इस्तेमाल किया जाए और प्रदूषित पानी नदी में जाने की स्थिति खत्म हो।
पहले भी मांगा था रोडमैप
जोजरी, बांडी और लूणी नदियों के प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी राजस्थान सरकार से ठोस योजना मांग चुका है।
पिछली सुनवाई में कोर्ट ने प्रदूषण रोकने के लिए करीब 20 बिंदुओं की कार्ययोजना तैयार करने को कहा था।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए, जिससे हर बार प्रदूषण की शिकायत सामने आने पर सुप्रीम कोर्ट को दखल न देना पड़े।
मुख्य सचिव को पाली, जोधपुर और बालोतरा जाकर संबंधित विभागों और दूसरे पक्षों से बात करने के लिए भी कहा गया था। उस समय कोर्ट ने जीरो लिक्विड डिस्चार्ज को लक्ष्य बनाने और वर्षों से जमा औद्योगिक गंदगी को हटाने पर भी जोर दिया था।
अब नए आदेश में कोर्ट ने इसी दिशा को आगे बढ़ाते हुए स्थायी व्यवस्था बनाने पर जोर दिया है।
यानी सिर्फ मौजूदा प्रदूषण रोकना ही लक्ष्य नहीं है, बल्कि ऐसा सिस्टम तैयार करना है जो आगे भी नदियों की निगरानी और प्रदूषण रोकने का काम लगातार करता रहे।
भूजल पर भी नजर
सुप्रीम कोर्ट ने उद्योगों में भूजल के इस्तेमाल को लेकर भी ठोस योजना बनाने को कहा है।
इसमें भूजल निकालने पर नियंत्रण, ट्रीट किए गए पानी का दोबारा इस्तेमाल, भूजल रिचार्ज और पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच जैसे कदम शामिल होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि जिन इलाकों को भूजल के लिहाज से डार्क जोन यानी ज्यादा दोहन वाले क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया है, वहां ज्यादा पानी इस्तेमाल करने वाले उद्योगों को आगे अनुमति नहीं दी जाएगी।
इसके अलावा नदी तल, हाई फ्लड लाइन और इकोलॉजिकल बफर जोन में अतिक्रमण और अवैध खनन का सर्वे भी कराया जाएगा। जहां भी अतिक्रमण या अवैध खनन मिलेगा, वहां कानून के मुताबिक कार्रवाई करनी होगी।
22 सितंबर को फिर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर 2026 को तय की है।
उस दिन राज्य सरकार को इंटीग्रेटेड कोऑर्डिनेशन ग्रुप की ओर से तैयार पूरी कार्ययोजना कोर्ट के सामने रखनी होगी।
साथ ही रिवर कमीशन की संरचना, उसके अधिकार और काम करने के तरीके की जानकारी भी देनी होगी।
इस आदेश के बाद साफ है कि जोजरी-बांडी-लूणी का मामला अब सिर्फ प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर कार्रवाई तक सीमित नहीं रहेगा।
नदी की सीमा तय करने से लेकर आसपास के निर्माण, भूजल, अतिक्रमण, औद्योगिक प्रदूषण और सरकारी विभागों की जवाबदेही तक, सभी पहलुओं को एक साथ लेकर काम करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट अब यह देखेगा कि इस पूरे सिस्टम को जमीन पर किस तरह लागू किया जाता है।