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ऑनलाइन गेमिंग पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ‘स्किल गेम’ पर भी बेटिंग को संवैधानिक संरक्षण नहीं, रम्मी-पोकर पर पैसे लगाना भी माना जाएगा सट्टेबाजी

Supreme Court Rules Betting On Skill Games Has No Constitutional Protection
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रम्मी और पोकर जैसे खेल कौशल आधारित हो सकते हैं, लेकिन उन पर पैसे लगाना ‘बेटिंग और गैंबलिंग’ ही माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु और कर्नाटक के कानूनों को सही ठहराया।

नई दिल्ली: ऑनलाइन गेमिंग और उससे जुड़े बेटिंग कारोबार पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भले ही “गेम ऑफ स्किल” (कौशल आधारित खेल) को कुछ हद तक संवैधानिक संरक्षण मिल सकता है, लेकिन उन खेलों पर की जाने वाली बेटिंग या सट्टेबाजी को कोई संरक्षण नहीं मिलेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु और कर्नाटक के उन कानूनों को वैध ठहराया है, जिनमें ऑनलाइन गेम्स पर पैसे लगाकर खेलने यानी बेटिंग और वेजरिंग पर रोक लगाई गई थी।

जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि राज्यों को संविधान के तहत “बेटिंग और गैंबलिंग” को नियंत्रित या प्रतिबंधित करने का पूरा अधिकार है। अदालत ने साफ कहा कि केवल इसलिए कोई गतिविधि सुरक्षित नहीं हो जाती क्योंकि मूल खेल कौशल आधारित है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि:


“कौशल आधारित खेलों को संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत संरक्षण मिल सकता है, लेकिन ऐसे खेलों पर सट्टेबाजी या पैसे लगाकर खेलने को कोई संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त नहीं है।”

यह फैसला ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों, बेटिंग प्लेटफॉर्म और डिजिटल गेमिंग उद्योग के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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क्या था मामला और किन कानूनों पर विवाद हुआ?

यह मामला तमिलनाडु और कर्नाटक द्वारा ऑनलाइन गेमिंग को लेकर किए गए कानूनी संशोधनों से जुड़ा था। तमिलनाडु ने अपने कानूनों में बदलाव कर ऑनलाइन बेटिंग और सट्टेबाजी पर रोक लगाई थी, वहीं कर्नाटक ने भी अपने पुलिस कानून में संशोधन कर ऐसी गतिविधियों को प्रतिबंधित किया था।

इन कानूनों को ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों ने अदालत में चुनौती दी। उनका कहना था कि रम्मी और पोकर जैसे खेल “गेम ऑफ स्किल” हैं, जिन्हें पहले भी अदालतें मान्यता दे चुकी हैं। इसलिए इन पर रोक लगाना उनके व्यवसाय करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

मद्रास हाईकोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट ने कुछ मामलों में कंपनियों के पक्ष में फैसला देते हुए कहा था कि गेम ऑफ स्किल को “गैंबलिंग” की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इसके बाद राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

इस मामले की सुनवाई जस्टिस जे.बी. पारडीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने की। कोर्ट ने कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची (List II) की एंट्री 34 राज्यों को “बेटिंग और गैंबलिंग” पर कानून बनाने का अधिकार देती है।

कोर्ट ने साफ किया कि यह मान लेना गलत है कि अगर कोई खेल कौशल आधारित है, तो उस पर होने वाली बेटिंग राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर हो जाती है।

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गेम ऑफ स्किल बनाम बेटिंग: कोर्ट ने फर्क बताया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी खेल का कौशल आधारित होना और उस पर पैसे लगाना दो अलग-अलग बातें हैं। कोई खेल भले ही कौशल पर आधारित हो, लेकिन जब उस पर पैसे लगाए जाते हैं, तो वह बेटिंग या गैंबलिंग की श्रेणी में आ सकता है।

कोर्ट ने कहा कि बेटिंग और गैंबलिंग में अनिश्चितता और पैसे जीतने की चाह मुख्य तत्व होते हैं, जो अक्सर लत और सामाजिक समस्याओं को जन्म देते हैं। इसलिए इन्हें नियंत्रित करना जरूरी है।

ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों के अधिकार का दावा खारिज

ऑनलाइन गेमिंग कंपनियों ने अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यवसाय करने के अधिकार का हवाला दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि जब कोई गतिविधि “बेटिंग और गैंबलिंग” की श्रेणी में आती है, तो उसे वैध व्यापार नहीं माना जाता।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी गतिविधियों को “रेस एक्स्ट्रा कॉमर्शियम” माना जाता है, यानी यह सामान्य व्यापारिक गतिविधि नहीं है और इसे मौलिक अधिकार का संरक्षण नहीं मिल सकता।

इस स्थिति में उस पर अनुच्छेद 19 के तहत कोई मौलिक अधिकार लागू नहीं होता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर किसी गतिविधि को कानून के तहत ही अनुचित या हानिकारक माना गया है, तो उसे मौलिक अधिकार का संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

हाईकोर्ट के फैसलों को क्यों पलटा गया

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास और कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसलों को गलत ठहराते हुए कहा कि उन्होंने “बेटिंग और गैंबलिंग” शब्दों की बहुत संकीर्ण व्याख्या की थी।

हाईकोर्ट ने यह माना था कि यह केवल “गैंबलिंग पर बेटिंग” तक सीमित है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह संविधान की गलत व्याख्या है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी व्याख्या करने से राज्यों की शक्तियां सीमित हो जाती हैं, जो संविधान की मंशा के खिलाफ है।

सामाजिक प्रभाव और राज्यों की भूमिका पर कोर्ट का जोर

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि डिजिटल युग में ऑनलाइन बेटिंग और गैंबलिंग का प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर पूरे समाज पर पड़ता है।

राज्यों ने अपने पक्ष में यह तर्क दिया था कि ऑनलाइन बेटिंग के कारण

  • लत की समस्या बढ़ रही है।
  • आर्थिक नुकसान हो रहा है।
  • आत्महत्या जैसे गंभीर मामले सामने आ रहे हैं.

तमिलनाडु सरकार ने जस्टिस के. चंद्रू समिति की रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें इन सामाजिक प्रभावों का विस्तृत अध्ययन किया गया था।

कोर्ट ने इन तर्कों को गंभीरता से लेते हुए माना कि ऐसे मामलों में राज्य का हस्तक्षेप जरूरी है। कोर्ट ने माना कि इन कानूनों के पीछे ठोस आधार और वास्तविक आंकड़े मौजूद हैं, इसलिए इन्हें मनमाना या असंगत नहीं कहा जा सकता।

क्या पूरी तरह बैन सही है? कोर्ट का जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि बेटिंग और गैंबलिंग को संविधान के तहत संरक्षण नहीं मिलता, इसलिए इन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना भी असंवैधानिक नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि जब किसी गतिविधि को मौलिक अधिकार का संरक्षण ही नहीं है, तो उस पर लगाया गया प्रतिबंध “प्रोपोर्शनैलिटी टेस्ट” में फेल नहीं होगा।

हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि यदि भविष्य में विधायिका चाहे तो गेम ऑफ स्किल पर बेटिंग को लेकर कोई अपवाद (exception) बना सकती है। लेकिन जब तक ऐसा नहीं किया जाता, तब तक मौजूदा प्रतिबंध वैध रहेंगे।

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गेमिंग इंडस्ट्री के लिए बड़ा झटका

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि संविधान कौशल आधारित खेलों को सीमित संरक्षण दे सकता है, लेकिन उन पर सट्टेबाजी को नहीं।

यह फैसला राज्यों को ऑनलाइन बेटिंग और गैंबलिंग पर सख्त नियंत्रण के लिए मजबूत संवैधानिक आधार देता है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऑनलाइन गेमिंग इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि “गेम ऑफ स्किल” का तर्क देकर बेटिंग को वैध नहीं ठहराया जा सकता।

राज्य सरकारों को इस क्षेत्र में कानून बनाने और सख्ती से लागू करने की पूरी छूट दी गई है। इस फैसले के बाद राज्यों को ऑनलाइन बेटिंग और गैंबलिंग पर सख्ती से नियंत्रण करने का पूरा अधिकार मिल गया है। आने वाले समय में अन्य राज्य भी इस तरह के कानून ला सकते हैं।

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