नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों की सुनवाई से जुड़ा एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि जिन मामलों की सुनवाई केवल सेशन कोर्ट में होनी है, उनमें मजिस्ट्रेट को चार्ज तय होने से पहले अभियोजन के गवाहों के बयान दर्ज करने की जरूरत नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 244 ऐसी परिस्थितियों पर लागू नहीं होती। अगर मजिस्ट्रेट को इस चरण में गवाहों के बयान दर्ज करने के लिए मजबूर किया गया तो वही गवाह एक ही घटना पर दो-दो बार बयान देंगे, जिससे मुकदमे बेवजह लंबा खिंचेगा और न्याय मिलने में देरी होगी।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह फैसला नीरज गुप्ता बनाम प्रदीप कुमार बंसल एवं अन्य मामले में सुनाया।
कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मामले को दोबारा मजिस्ट्रेट के पास भेजकर धारा 244 के तहत प्री-चार्ज सबूत दर्ज कराने का निर्देश दिया गया था।
एक झगड़े से शुरू हुई लंबी कानूनी लड़ाई
यह मामला 12 अप्रैल 2007 की एक कहासुनी और मारपीट की घटना से जुड़ा है। शिकायतकर्ता नीरज गुप्ता और उनके पिता का आरोप था कि विवाद के दौरान प्रतिवादियों के साथ झगड़ा हुआ। इसी दौरान उनके पिता अचानक गिर पड़े, बेहोश हो गए और अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने पुलिस से एफआईआर दर्ज करने की मांग की, लेकिन मामला दर्ज नहीं हुआ।
आखिरकार उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन दायर किया। मजिस्ट्रेट ने शिकायत पर संज्ञान लिया, प्रारंभिक प्रक्रिया पूरी की और समन जारी किए। बाद में मामला सेशन कोर्ट भेज दिया गया क्योंकि इसमें हत्या जैसे गंभीर आरोप शामिल थे, जिनकी सुनवाई केवल सेशन कोर्ट कर सकता है।
सेशन कोर्ट ने तीन आरोपियों में से सिर्फ एक के खिलाफ आरोप तय किए, जबकि बाकी दो को राहत दे दी। इसके बाद दोनों पक्ष हाई कोर्ट पहुंचे। हाई कोर्ट ने मामला फिर से मजिस्ट्रेट के पास भेजते हुए कहा कि धारा 244 CrPC के तहत चार्ज तय करने से पहले शिकायतकर्ता के गवाहों और सबूतों को रिकॉर्ड किया जाए। इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या था सबसे बड़ा सवाल?
सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे अहम सवाल यह था कि यदि कोई मामला निजी शिकायत से शुरू हुआ हो, लेकिन उसमें हत्या जैसे ऐसे अपराध हों जिनकी सुनवाई केवल सेशन कोर्ट में हो सकती है, तो क्या मजिस्ट्रेट को धारा 244 CrPC के तहत चार्ज से पहले अभियोजन के गवाहों के बयान दर्ज करना जरूरी है?
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट को चार्ज तय करने से पहले शिकायतकर्ता के गवाहों के बयान दर्ज करने की जरूरत नहीं है।
कोर्ट के मुताबिक, धारा 244 सिर्फ उन मामलों पर लागू होती है जिनकी सुनवाई मजिस्ट्रेट खुद करता है। लेकिन जब कानून कहता है कि मामला सीधे सेशन कोर्ट में चलेगा, तब मजिस्ट्रेट का काम सिर्फ जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी करके केस सेशन कोर्ट भेजना होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की दलील खारिज की
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने अपना फैसला देते समय सुप्रीम कोर्ट के तीन पुराने फैसलों का हवाला दिया था।
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के तीन पुराने फैसलों-अजय कुमार घोष, सुनील मेहता और हरिनारायण जी. बजाज-का हवाला देते हुए अपना फैसला सुनाया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन तीनों मामलों की परिस्थितियां अलग थीं। कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट जिन तीन पुराने फैसलों का हवाला दे रहा है, वे इस मामले पर लागू नहीं होते।
क्योंकि उन मामलों के तथ्य और कानूनी सवाल अलग थे। उनमें ऐसे मामले थे जिनकी सुनवाई मजिस्ट्रेट कर सकता था, जबकि मौजूदा मामला सीधे सेशन कोर्ट में चलने वाला है।
पहले मामले में ऐसे अपराध थे जिनकी सुनवाई मजिस्ट्रेट कर सकता था। दूसरे मामले में अतिरिक्त आरोपी के अधिकारों का सवाल था। तीसरे मामले में भी ऐसे अपराध थे जो मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र में आते थे।
कोर्ट ने कहा कि इन फैसलों को हत्या जैसे उन मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता जिनकी सुनवाई कानून के अनुसार केवल सेशन कोर्ट करती है। इसलिए हाई कोर्ट ने इन निर्णयों की गलत व्याख्या की।
मजिस्ट्रेट की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब मामला सेशन कोर्ट में भेजा जाना हो तो मजिस्ट्रेट का काम केवल यह देखना होता है कि कानूनी औपचारिकताएं पूरी हुई हैं या नहीं।
उसे इस स्तर पर मामले के गुण-दोष में जाने या गवाहों के विस्तृत बयान दर्ज करने की जरूरत नहीं होती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर हाई कोर्ट की बात मान ली जाए तो एक ही गवाह को एक ही घटना पर दो बार बयान देना पड़ेगा।
इससे सिर्फ मुकदमे की सुनवाई लंबी होगी, जबकि कानून का मकसद मामलों का जल्द निपटारा करना है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून बनाने वालों ने 1973 की नई दंड प्रक्रिया संहिता में जानबूझकर पुरानी कमिटल जांच (कमिटल इन्क्वायरी) की व्यवस्था खत्म की थी ताकि गंभीर मामलों की सुनवाई जल्दी शुरू हो सके।
इसलिए अब उस पुरानी प्रक्रिया को दोबारा लागू करने जैसा आदेश देना कानून की मंशा के खिलाफ होगा।
पुराने और नए कानून का फर्क- क्यों बदली गई प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बताया कि 1898 की पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता में सेशन कोर्ट भेजने से पहले मजिस्ट्रेट विस्तृत जांच करता था। गवाहों के बयान भी दर्ज होते थे।
लेकिन बाद में विधि आयोग की 41वीं रिपोर्ट में कहा गया कि यह पूरी प्रक्रिया समय की बर्बादी है और मुकदमों में अनावश्यक देरी करती है।
इसी सिफारिश के आधार पर 1973 की नई CrPC लाई गई, जिसमें कमिटल जांच की भूमिका काफी सीमित कर दी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों- संजय गांधी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, हरदीप सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब, स्टेट ऑफ ओडिशा बनाम देबेंद्र नाथ पाधी, रत्तीराम बनाम स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश और सुपरिंटेंडेंट एंड रिमेम्ब्रांसर ऑफ लीगल अफेयर्स बनाम अशुतोष घोष-का हवाला देते हुए कहा कि कानून पहले से ही साफ है।
ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट की भूमिका सीमित होती है। उसका काम सिर्फ जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी कर केस को सेशन कोर्ट भेजना है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: हाईकोर्ट का आदेश रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने कानून को सही तरीके से नहीं समझा। इसलिए उसका आदेश बरकरार नहीं रखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का 2 सितंबर 2019 का आदेश रद्द कर दिया। साथ ही कहा कि मामले को दोबारा मजिस्ट्रेट के पास भेजने की जरूरत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि शिकायतकर्ता और दूसरे पक्ष द्वारा दायर लंबित पुनरीक्षण याचिकाओं पर नए सिरे से सुनवाई की जाए।
चूंकि एक आरोपी के खिलाफ आरोप 2011 में ही तय हो चुके थे, इसलिए हाई कोर्ट से कहा गया कि दोनों याचिकाओं का फैसला ज्यादा से ज्यादा नौ महीने के अंदर किया जाए।
सभी पक्षों को 16 जुलाई 2026 को हाई कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया गया है।
देशभर की कोर्टों पर फैसले का असर
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर देशभर के ऐसे आपराधिक मामलों पर पड़ेगा, जिनकी सुनवाई सीधे सेशन कोर्ट में होती है। अब ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट से चार्ज तय होने से पहले गवाहों के बयान रिकॉर्ड कराने की मांग आसानी से नहीं की जा सकेगी।
इस फैसले से हत्या, हत्या के प्रयास और दूसरे गंभीर अपराधों से जुड़े निजी शिकायत वाले मामलों में बेवजह की देरी कम होगी और सुनवाई जल्दी आगे बढ़ सकेगी।
गवाहों को एक ही घटना पर बार-बार बयान देने की जरूरत नहीं पड़ेगी और मुकदमे जल्दी सेशन कोर्ट तक पहुंच सकेंगे।
यह फैसला देशभर की निचली कोर्टों के लिए भी एक साफ संदेश है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से यह भी साफ है कि केस सेशन कोर्ट भेजते समय मजिस्ट्रेट सिर्फ कानून में तय प्रक्रिया का पालन करेगा। उसे अतिरिक्त जांच या गवाहों के बयान रिकॉर्ड करने की जरूरत नहीं है।