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मोटर दुर्घटना मुआवजे पर सुप्रीम कोर्ट की नई गाइडलाइन: नौकरीपेशा और कारोबारियों की आय तय करने के लिए ITR के इस्तेमाल को लेकर नए नियम

Supreme Court Lays Down Uniform Rules For Determining Income In Motor Accident Compensation Claims

नई दिल्ली: सड़क हादसों में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को मिलने वाले मुआवजे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश के लिए अहम गाइडलाइन जारी की है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना के मामलों में हर व्यक्ति की आय तय करने का एक ही तरीका नहीं अपनाया जा सकता। नौकरीपेशा और खुद का कारोबार या पेशा करने वाले लोगों की आय अलग-अलग तरीके से तय की जानी चाहिए, ताकि पीड़ित परिवार को उचित और न्यायसंगत मुआवजा मिल सके।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नौकरीपेशा व्यक्ति की आय तय करने के लिए दुर्घटना से पहले दाखिल किया गया पिछले वर्ष का आयकर रिटर्न (ITR) सबसे सही आधार होगा। वहीं, कारोबार या स्वरोजगार करने वाले लोगों के मामले में पिछले तीन वर्षों के ITR का औसत देखा जाएगा। हालांकि, कारोबार करने वाले लोगों के मामलों में सिर्फ ITR के आधार पर आय तय नहीं की जा सकती। कारोबार से जुड़ी दूसरी परिस्थितियों को भी देखना जरूरी होगा।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमैकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने यह फैसला ओडिशा के एक सड़क हादसे में मारे गए निर्माण कारोबारी मनोरंजन पांडे के परिवार को मुआवजा देने से जुड़े मामले में सुनाया। साथ ही, देशभर के कोर्टों में एक समान तरीका अपनाने के लिए दिशा-निर्देश भी जारी किए।

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कारोबारी की मौत से जुड़ा विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा

यह मामला ओडिशा के रहने वाले 39 वर्षीय निर्माण कारोबारी मनोरंजन पांडे की सड़क दुर्घटना में मौत से जुड़ा था।

29 मई 2018 को वह अपनी कार से बेरहामपुर से भुवनेश्वर जा रहे थे। राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक तेज रफ्तार ट्रक ने उनकी कार को टक्कर मार दी।

गंभीर चोटों के कारण इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। घटना के बाद पुलिस ने ट्रक चालक के खिलाफ मामला दर्ज किया।

मृतक के परिवार ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) में करीब 2.25 करोड़ रुपये मुआवजे की मांग की।

परिवार का कहना था कि मनोरंजन पांडे अपना निर्माण कारोबार चलाते थे और सालाना लगभग 15 लाख रुपये कमाते थे। वह पूरे परिवार के मुख्य कमाने वाले सदस्य थे।

अधिकरण ने उनके पक्ष में 2.27 करोड़ रुपये का मुआवजा तय किया। लेकिन बीमा कंपनी ने इस फैसले को ओडिशा हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने मृतक की आय का अलग तरीके से आकलन करते हुए मुआवजा घटाकर लगभग 1.87 करोड़ रुपये कर दिया। इसके बाद परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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ITR अहम, लेकिन कोई तय फार्मूला नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि मोटर दुर्घटना के मामलों में किसी व्यक्ति की सालाना आय तय करने के लिए कौन-सा ITR देखा जाए।

कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन कानून का उद्देश्य पीड़ित परिवार को उचित और न्यायसंगत मुआवजा दिलाना है। यह कोई तय गणित नहीं है कि हर मामले में एक ही तरीका अपनाया जाए। इसलिए कोर्टों को हर मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए फैसला करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि अलग-अलग हाईकोर्ट अलग-अलग तरीके अपना रही थीं। कहीं पिछले तीन वर्षों का औसत लिया जा रहा था तो कहीं केवल अंतिम ITR को आधार बनाया जा रहा था। इसी असमानता को खत्म करने के लिए यह गाइडलाइन जारी की गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ITR आय का पता लगाने का एक अहम दस्तावेज है, लेकिन सिर्फ उसी के आधार पर फैसला नहीं किया जा सकता। आय तय करते समय दूसरे तथ्यों और परिस्थितियों को भी देखना होगा।

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नौकरीपेशा और कारोबारियों के लिए अलग-अलग नियम

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नौकरी करने वालों और खुद का कारोबार करने वालों की कमाई एक जैसी नहीं होती। इसलिए दोनों की आय तय करने का तरीका भी अलग होना चाहिए।

कोर्ट के मुताबिक, नौकरीपेशा व्यक्ति की आय तय करने के लिए दुर्घटना से पहले दाखिल किया गया पिछले वर्ष का ITR पर्याप्त होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि नौकरी में प्रमोशन या वेतन बढ़ने का असर सबसे पहले उसी वर्ष के ITR में दिखाई देता है।

यदि किसी कर्मचारी का प्रमोशन हुआ हो और उसका ITR अभी दाखिल न हुआ हो, तो कोर्ट प्रमोशन लेटर और अन्य वित्तीय दस्तावेज भी देख सकती है।

वहीं, कारोबार या स्वरोजगार करने वाले लोगों की आय हर साल एक जैसी नहीं रहती। इसलिए ऐसे मामलों में पिछले तीन वर्षों के ITR का औसत देखा जाएगा। अगर केवल एक या दो ITR उपलब्ध हों, तब भी कोर्ट मौजूद रिकॉर्ड और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखकर आय तय करेगी।

ITR के अलावा किन बातों पर भी गौर करेगी कोर्ट?

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ ITR देखकर ही मुआवजा तय नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब मृतक अपना कारोबार करता हो।

कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में यह भी देखा जाएगा कि कारोबार किस तरह का था, उसका विकास किस दिशा में हो रहा था, भविष्य में उसके बढ़ने की कितनी संभावना थी और शुरुआती वर्षों में यदि घाटा हुआ था तो उसका कारण क्या था।

कई कारोबार शुरू में घाटे में चलते हैं, लेकिन बाद में अच्छा लाभ देने लगते हैं। इसलिए केवल किसी एक वर्ष की आय देखकर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी व्यक्ति की मौत या दुर्घटना के बाद ITR दाखिल किया गया हो, तो कोर्ट उसे भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं करेगी।

लेकिन ऐसे ITR को तभी स्वीकार किया जाएगा, जब उसे अन्य वित्तीय दस्तावेजों और रिकॉर्ड से सही साबित किया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि मनोरंजन पांडे निर्माण का कारोबार करते थे। रिकॉर्ड में उनके दो ITR मौजूद थे। हाईकोर्ट ने दोनों का औसत निकालकर उनकी आय तय कर दी थी, लेकिन कारोबार की प्रकृति और भविष्य की संभावनाओं पर कोई विचार नहीं किया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायसंगत मुआवजा तय करने के लिए केवल औसत निकालना पर्याप्त नहीं है। कारोबार की प्रकृति को देखते हुए मृतक की वार्षिक आय 14 लाख रुपये मानी जानी चाहिए।

इसके आधार पर मुआवजे की नई गणना की गई और परिवार को कुल 1 करोड़ 97 लाख 81 हजार 505 रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया गया।

साथ ही कहा गया कि बढ़ी हुई राशि पर वही ब्याज मिलेगा, जो पहले MACT ने तय किया था। यह रकम 4 सप्ताह के भीतर परिवार के खाते में जमा कराई जाए।

‘जस्ट एंड फेयर कम्पनसेशन’ पर सुप्रीम कोर्ट का जोर

सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया है कि मोटर दुर्घटना मामलों में मुआवजा तय करने का उद्देश्य केवल तकनीकी गणना नहीं, बल्कि पीड़ित परिवार को न्यायसंगत और उचित राहत देना है।

ITR को महत्वपूर्ण मानते हुए भी कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया है कि आय निर्धारण केवल कागजी आंकड़ों तक सीमित न रहे, बल्कि वास्तविक परिस्थितियों और मानवीय पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाए।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आगे आने वाले मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में अहम आधार बनेगा। इससे ऐसे मामलों में फैसला लेने का तरीका ज्यादा स्पष्ट होगा।

अब मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में क्या बदलेगा?

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देशभर में मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों की सुनवाई के लिए अहम माना जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामलों में आय तय करने का एक स्पष्ट तरीका मिल गया है। इससे अलग-अलग कोर्टों में अलग-अलग आधार पर मुआवजा तय होने की स्थिति कम होगी।

इस फैसले के बाद नौकरीपेशा लोगों और कारोबार करने वालों की आय तय करने का एक साफ आधार मिल गया है।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि सिर्फ ITR देखकर फैसला नहीं किया जाएगा। हर मामले में उससे जुड़ी सभी परिस्थितियों और उपलब्ध रिकॉर्ड को भी ध्यान में रखा जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट की इस गाइडलाइन के बाद सड़क हादसों के मुआवजे से जुड़े मामलों में फैसले लेने का तरीका ज्यादा स्पष्ट होगा।

इससे देशभर के MACT और हाईकोर्टों को भी एक समान आधार मिलेगा। इससे पीड़ित परिवारों और बीमा कंपनियों के बीच होने वाले विवाद भी कम हो सकते हैं।

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