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उम्रकैद के कैदियों की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: नई नीति से नहीं छिनेगा पुरानी रिमिशन पॉलिसी का लाभ, हरियाणा सरकार को 4 हफ्ते में फैसला लेने को कहा

Supreme Court Protects Lifers' Remission Rights, Says New Policy Cannot Override Earlier Beneficial Scheme

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद की सजा काट रहे कैदियों की समय से पहले रिहाई (रिमिशन) को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने कहा कि अगर पुरानी रिहाई नीति संविधान के तहत बनी है, तो बाद में लाई गई नई नीति उसका फायदा खत्म नहीं कर सकती।

‘कोर्ट ने कहा कि अगर पुरानी रिहाई नीति कैदी के लिए ज्यादा फायदेमंद है, तो सिर्फ नई नीति आने से उसका लाभ खत्म नहीं होगा। ऐसे मामलों में पुरानी नीति के आधार पर ही फैसला लिया जाएगा।’

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान के तहत राज्यपाल को मिली शक्तियां किसी सामान्य कानून या सरकारी नीति से कम नहीं की जा सकतीं।

अगर पुरानी नीति संविधान के तहत बनी है और नई नीति केवल दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत जारी की गई है, तो नई नीति पुरानी नीति को खत्म नहीं कर सकती।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमैकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने हरियाणा सरकार के खिलाफ परवीन कुमार उर्फ परवीन चौहान की अपील मंजूर करते हुए राज्य सरकार को 4 सप्ताह के भीतर उसकी रिमिशन (समय से पहले रिहाई) की अर्जी पर नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश दिया।

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दो नीतियों के टकराव से शुरू हुआ विवाद

यह मामला हरियाणा की दो अलग-अलग रिमिशन पॉलिसी को लेकर था।

परवीन कुमार उर्फ परवीन चौहान को वर्ष 2009 में 12 साल के एक बच्चे की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था।

ट्रायल कोर्ट ने उसे हत्या के लिए उम्रकैद, अपहरण के लिए 5 साल और सबूत मिटाने के लिए 2 साल की सजा सुनाई थी।

बाद में हाईकोर्ट ने अपहरण की सजा रद्द कर दी, जबकि हत्या की सजा बरकरार रही। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी दोषसिद्धि को बरकरार रखा और मामला अंतिम रूप से तय हो गया।

करीब 14 साल की वास्तविक सजा पूरी करने के बाद परवीन कुमार ने वर्ष 2022 में हरियाणा सरकार के सामने समय से पहले रिहाई की अर्जी दी। उसका कहना था कि उसका मामला वर्ष 2002 की रिमिशन पॉलिसी के तहत देखा जाना चाहिए।

लेकिन हरियाणा सरकार ने यह कहते हुए उसकी अर्जी खारिज कर दी कि उसके मामले पर वर्ष 2008 की नई नीति लागू होगी।

सरकार का कहना था कि नई नीति के तहत रिहाई के लिए 20 साल की वास्तविक और 25 साल की कुल सजा पूरी करना जरूरी है, जबकि परवीन कुमार ने यह अवधि पूरी नहीं की थी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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सुप्रीम कोर्ट के सामने विवाद क्या था?

सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल यह था कि परवीन कुमार के मामले में वर्ष 2002 की नीति लागू होगी या वर्ष 2008 की।

परवीन कुमार का कहना था कि 2002 की नीति संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत बनाई गई थी। इसलिए बाद में CrPC के तहत बनाई गई 2008 की नीति उससे मिलने वाले अधिकार को खत्म नहीं कर सकती।

वहीं, हरियाणा सरकार का तर्क था कि 2008 की नीति ने 2002 की नीति की जगह ले ली थी। इसलिए जिस समय परवीन कुमार दोषी ठहराया गया, उस समय 2008 की नीति लागू थी और उसी के आधार पर उसकी रिहाई पर फैसला होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष: 2002 की नीति का प्रभाव बना रहेगा

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों रिहाई नीतियों को ध्यान से देखा। कोर्ट ने 2002 और 2008 की दोनों रिहाई नीतियों की तुलना की।

कोर्ट ने पाया कि वर्ष 2002 की नीति के तहत रिमिशन से जुड़े मामलों का अंतिम फैसला राज्यपाल द्वारा संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत किया जाना था। वहीं वर्ष 2008 की नीति साफ तौर पर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 432 और 433 के तहत जारी की गई थी।

कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को मिली शक्ति अलग और स्वतंत्र है। इसे किसी सामान्य कानून या उसके तहत बनाई गई नीति से सीमित नहीं किया जा सकता।

इसी वजह से वर्ष 2008 की नीति, वर्ष 2002 की नीति से मिलने वाले लाभ को खत्म नहीं कर सकती।

पुराने फैसले पर भी सुप्रीम कोर्ट ने जताई असहमति

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर पहले दिए गए अपने फैसलों को भी देखा।

कोर्ट ने कहा कि ‘स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम जगदीश’ मामले में तीन जजों की बेंच पहले ही साफ कर चुकी है कि 1993 की रिहाई नीति संविधान के तहत बनी थी। इसलिए बाद में आई 2008 की नीति उसका फायदा खत्म नहीं कर सकती।

इसके बाद आए ‘स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम राज कुमार’ फैसले में कहा गया था कि 2002 की रिहाई नीति एक सामान्य कानूनी नीति है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1993 और 2002 की दोनों रिहाई नीतियां लगभग एक जैसी हैं। इसलिए 2002 की नीति को अलग नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘राज कुमार’ मामले में जो राय दी गई थी, वह पहले आए बड़े बेंच के फैसले से मेल नहीं खाती। इसलिए इस मामले में उसे आधार नहीं बनाया जा सकता।

कैदी परवीन कुमार को क्या राहत मिली?

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि परवीन कुमार का मामला वर्ष 2002 की रिमिशन नीति के तहत ही देखा जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि 2002 की नीति लागू होने पर परवीन कुमार की समय से पहले रिहाई की अर्जी पर विचार किया जा सकता है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने परवीन कुमार की तुरंत रिहाई का आदेश नहीं दिया। कोर्ट ने हरियाणा सरकार से कहा कि वह चार सप्ताह के भीतर उसकी समय से पहले रिहाई (रिमिशन) की अर्जी पर इस फैसले के अनुसार दोबारा फैसला ले।

साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने आदेश की कॉपी हरियाणा के मुख्य सचिव को भेजने का भी निर्देश दिया, ताकि संबंधित अधिकारी समय पर आवश्यक कार्रवाई कर सकें।

रिमिशन नीति पर स्पष्ट दिशा-निर्देश

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से रिमिशन यानी समय से पहले रिहाई के नियमों पर स्थिति काफी हद तक साफ हो गई है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत बनी रिहाई नीति का लाभ बाद में लाई गई सामान्य सरकारी नीति से खत्म नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ परवीन कुमार के मामले तक सीमित नहीं है। इसका असर हरियाणा में उम्रकैद की सजा काट रहे कई ऐसे कैदियों पर पड़ सकता है, जिनकी रिमिशन की अर्जी पुरानी और नई नीति के विवाद में अटकी हुई है।

कोर्ट ने साफ किया है कि यदि कोई रिमिशन नीति संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत बनाई गई है, तो बाद में CrPC के तहत लाई गई नई नीति अपने आप उसका स्थान नहीं ले सकती।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि यह फैसला आगे आने वाले मामलों पर लागू होगा। जिन कैदियों की समय से पहले रिहाई (रिमिशन) की अर्जी पर पहले ही अंतिम फैसला हो चुका है, उनके मामले दोबारा नहीं खोले जाएंगे। कोर्ट ने यह भी कहा कि अब हरियाणा सरकार को दोनों रिहाई नीतियों को ध्यान में रखकर आगे के मामलों में फैसला लेना होगा।

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