नई दिल्ली: नाबालिग से दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे आसाराम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने मेडिकल आधार पर आसाराम को अंतरिम जमानत देने से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि केवल उम्र बढ़ने या सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं के आधार पर किसी उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी को अंतरिम जमानत नहीं दी जा सकती।
कोर्ट ने कहा कि:
“हर कैदी को स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, लेकिन इससे सजा पर रोक नहीं लगाई जा सकती।”
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ उम्र ज्यादा होना या सामान्य बीमारी होना अंतरिम जमानत का आधार नहीं है। कोर्ट ने साफ किया कि मेडिकल आधार पर राहत तभी मिलेगी, जब यह साबित हो जाए कि जेल में रहने से कैदी की जान को खतरा है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि फिलहाल न तो सजा पर रोक लगेगी और न ही आसाराम को नियमित जमानत मिलेगी। हालांकि, चूंकि मामला उम्रकैद की सजा से जुड़ा है, इसलिए उसकी याचिका पर सुनवाई के लिए नोटिस जारी किया गया है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नोटिस जारी होने का मतलब यह नहीं है कि आसाराम को किसी तरह की राहत मिल गई है।
जस्टिस एम.एम. सुंद्रेश और जस्टिस शील नागू की बेंच ने आसाराम की अंतरिम जमानत की मांग खारिज करते हुए जेल प्रशासन को निर्देश दिया कि उसे पहले से मिल रही सभी मेडिकल सुविधाएं जारी रखी जाएं।
साथ ही कहा कि यदि भविष्य में ऐसी गंभीर मेडिकल स्थिति पैदा होती है, जिसमें उसकी जान को खतरा हो, तभी मेडिकल आधार पर राहत देने पर विचार किया जाएगा।
आसाराम ने सुप्रीम कोर्ट का रुख क्यों किया?
यह मामला राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें आसाराम की 2018 की दोषसिद्धि पर सुनवाई करते हुए कुछ धाराओं में उसे राहत दी गई थी, लेकिन मुख्य सजा बरकरार रखी गई थी।
हाईकोर्ट ने उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश), धारा 34 (समान मंशा) और धारा 376-डी (गैंगरेप) के तहत दोषसिद्धि को हटाया था। कोर्ट ने कहा था कि इन आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म, पॉक्सो एक्ट और अन्य गंभीर धाराओं में उसकी दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी थी।
इसी फैसले को चुनौती देते हुए आसाराम ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की। इसके साथ ही उसने अंतरिम जमानत और सजा पर रोक लगाने की भी मांग की।
आसाराम की दलील: बढ़ती उम्र और बिगड़ती सेहत का हवाला
आसाराम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने कोर्ट को बताया कि उसकी उम्र करीब 90 वर्ष है और वह कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहा है।
उन्होंने कहा कि आसाराम लंबे समय से इलाज करा रहा है और उसे लगातार डॉक्टर की जरूरत है। पहले भी उसे आयुर्वेदिक अस्पताल में इलाज की अनुमति दी गई थी।
बचाव पक्ष ने कहा कि वह बिना शर्त रिहाई नहीं मांग रहा, बल्कि केवल मेडिकल आधार पर अंतरिम राहत चाहता है। उसकी बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य को देखते हुए मानवीय आधार पर जमानत दी जानी चाहिए। वकील ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी उसके स्वास्थ्य से जुड़े मामलों की सुनवाई कर चुका है और उसकी मेडिकल स्थिति से अच्छी तरह परिचित है।
पीड़ित पक्ष ने क्या कहा?
पीड़ित पक्ष ने अंतरिम जमानत का विरोध करते हुए कहा कि आसाराम की ओर से याचिका में कई महत्वपूर्ण बातें नहीं बताई गई हैं।
पीड़ित पक्ष ने कोर्ट को बताया कि गुजरात के मामले और राजस्थान के इस मामले में बड़ा अंतर है। गुजरात का मामला बालिग पीड़िताओं से जुड़ा था, जबकि राजस्थान का मामला नाबालिग पीड़िता से जुड़ा है। इसलिए यहां पॉक्सो एक्ट और किशोर न्याय कानून की धाराएं भी लागू होती हैं।
यह भी बताया गया कि दोषसिद्धि के बाद आसाराम को अस्पताल में भर्ती कराया गया था और फिलहाल भी उसे जरूरी मेडिकल सुविधाएं मिल रही हैं। इसलिए अतिरिक्त राहत देने की कोई जरूरत नहीं है।
आसाराम को अभी नहीं मिलेगी जमानत: सुप्रीम कोर्ट
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि फिलहाल सजा पर रोक लगाने या नियमित जमानत देने का कोई सवाल नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि सामान्य बीमारी, बढ़ती उम्र या इलाज की जरूरत अपने आप में अंतरिम जमानत का आधार नहीं बन सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान बेहद साफ शब्दों में कहा कि आसाराम को फिलहाल कोई अंतरिम जमानत नहीं दी जाएगी, न ही उसकी सजा पर भी कोई रोक लगेगी और मेडिकल आधार पर राहत के लिए सख्त मानक अपनाए जाएंगे।
यह टिप्पणी सीधे तौर पर आसाराम की याचिका को खारिज करने का आधार बनी, जिसमें उन्होंने अपनी उम्र और स्वास्थ्य को लेकर राहत मांगी थी।
कोर्ट की टिप्पणी: ‘सिर्फ जान का खतरा हो तभी मिलेगी राहत‘
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राहत पर तभी विचार किया जाएगा, जब यह साबित हो कि यदि अंतरिम जमानत नहीं दी गई तो कैदी की जान को वास्तविक खतरा हो सकता है।
कोर्ट ने साफ कहा:
“जब तक जीवन को वास्तविक खतरा न हो, तब तक हम सजा पर रोक नहीं लगाएंगे।”
कोर्ट ने कहा कि केवल सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं के आधार पर राहत नहीं दी जाएगी। पहले यह देखना जरूरी होगा कि मेडिकल स्थिति कितनी गंभीर है और क्या जेल में रहना वास्तव में उसके जीवन के लिए खतरा पैदा कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ सामान्य बीमारी के आधार पर अंतरिम जमानत नहीं दी जा सकती। केवल तब विचार होगा जब जीवन को सीधा खतरा हो और मेडिकल रिपोर्ट से यह स्पष्ट होना चाहिए कि इलाज न मिलने पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि मामला उम्रकैद की सजा से जुड़ा है, इसलिए विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करना कानून के मुताबिक जरूरी है। इसी कारण नोटिस जारी किया गया है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि आसाराम को किसी तरह की राहत मिल गई है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश: इलाज जारी रहेगा, लेकिन राहत नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आसाराम को जेल में जो मेडिकल सुविधाएं पहले से मिल रही हैं, वे आगे भी जारी रहेंगी लेकिन फिलहाल कोई जमानत या सजा पर रोक नहीं दी जाएगी।
कोर्ट ने साफ किया कि इस आदेश को नियमित जमानत या अंतरिम राहत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। साथ ही यदि भविष्य में कोई ऐसी असाधारण मेडिकल स्थिति पैदा होती है, जिसमें उसकी जान को गंभीर खतरा हो, तो दोनों पक्षों को सुनने के बाद उस पर अलग से विचार किया जा सकता है।
यानी फिलहाल कोर्ट ने सिर्फ इतना कहा है कि आसाराम को जेल में पहले की तरह इलाज मिलता रहेगा।
राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले पर होगी सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम जमानत देने से इनकार जरूर किया, लेकिन आसाराम की विशेष अनुमति याचिका पर नोटिस जारी कर दिया।
इस याचिका में राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें आपराधिक साजिश और गैंगरेप जैसी कुछ धाराओं में उसे राहत मिली थी, लेकिन नाबालिग से दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के तहत उसकी मुख्य दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा बरकरार रखी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस याचिका पर दोनों पक्षों को सुनने के बाद कानून के मुताबिक फैसला लिया जाएगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर सुनवाई से पहले आसाराम की तबीयत अचानक ज्यादा बिगड़ती है, तो वह मामले की जल्द सुनवाई की मांग कर सकता है।
कोई कानून से ऊपर नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश मेडिकल आधार पर अंतरिम जमानत से जुड़े मामलों के लिए अहम है।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि हर मामले में दखल नहीं दिया जाएगा। सिर्फ बेहद गंभीर स्थिति या असाधारण परिस्थितियों में होने पर ही राहत पर विचार होगा।
कोर्ट ने साफ कर दिया है कि केवल बढ़ती उम्र, सामान्य बीमारी या इलाज की जरूरत के आधार पर उम्रकैद की सजा काट रहे किसी कैदी को अंतरिम जमानत नहीं दी जा सकती। मेडिकल आधार पर राहत तभी मिलेगी, जब रिकॉर्ड से यह साबित हो कि जेल में रहने से उसकी जान को वास्तविक खतरा है।
यह फैसला यह भी बताता है कि गंभीर अपराधों में दोषसिद्ध लोगों की अंतरिम जमानत की मांग पर सुप्रीम कोर्ट बेहद सावधानी से विचार करता है। साथ ही यह भी सुनिश्चित करता है कि जेल में बंद कैदी को जरूरी मेडिकल सुविधाएं मिलती रहें।
फिलहाल आसाराम को अंतरिम जमानत नहीं मिली है। उसे जेल में ही रहना होगा और मौजूदा चिकित्सा सुविधाओं का लाभ मिलता रहेगा। वहीं, राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली उसकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में आगे सुनवाई होगी।
