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सिर्फ बकाया भुगतान न करने से नहीं बनेगा आपराधिक मामला: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- कारोबारी विवाद का समाधान सिविल कोर्ट में होगा

Supreme Court Clarifies That Business Payment Disputes Cannot Automatically Be Treated As Criminal Cases

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कारोबारी लेन-देन से जुड़े विवादों पर बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी व्यापारी या खरीदार द्वारा बकाया रकम का भुगतान नहीं करना अपने आप में ‘क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट’ यानी आपराधिक विश्वासघात का मामला नहीं बनता।

कोर्ट ने कहा कि यदि विवाद केवल सामान खरीदने-बेचने के बाद बची हुई रकम के भुगतान का है, तो उसे आपराधिक मुकदमे में नहीं बदला जा सकता। ऐसे मामलों का समाधान सिविल कानून के तहत किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 406 तभी लागू होती है, जब किसी व्यक्ति को कोई सामान या संपत्ति भरोसे के साथ किसी खास उद्देश्य से सौंपी गई हो और उसने उस भरोसे का गलत इस्तेमाल किया हो। लेकिन सामान्य खरीद-बिक्री के सौदे में ऐसा नहीं होता। सामान बिकने के बाद उसका मालिक खरीदार बन जाता है और दोनों के बीच संबंध केवल विक्रेता और खरीदार का रह जाता है।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की तीन सदस्यीय बेंच ने राहुल अग्रवाल की अपील स्वीकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। साथ ही धारा 406 IPC के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही भी खत्म कर दी। हालांकि कोर्ट ने साफ किया कि यदि बकाया रकम की वसूली का दावा है, तो शिकायतकर्ता सिविल कानून के तहत उपलब्ध उपाय अपना सकता है।

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ज्वेलरी लेन-देन से शुरू हुआ विवाद

यह मामला उत्तर प्रदेश के आगरा के एक सर्राफ और उसके ग्राहक के बीच हुए कारोबारी लेन-देन से जुड़ा था।

शिकायतकर्ता का कहना था कि अक्टूबर 2015 से जून 2016 के बीच उसने राहुल अग्रवाल को करीब 11 लाख रुपये की चांदी की पायल और अन्य आभूषण उधार पर बेचे थे। उसके मुताबिक, राहुल अग्रवाल ने समय-समय पर कुछ भुगतान तो किया, लेकिन करीब 5,24,929 रुपये का भुगतान बाकी रह गया।

बार-बार रकम मांगने के बाद भी भुगतान नहीं होने पर शिकायतकर्ता ने कोर्ट में आवेदन दिया। इसके बाद पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 406, 504 और 506 के तहत कार्रवाई शुरू की।

हालांकि ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद केवल धारा 406 IPC के तहत संज्ञान लिया और आरोपी को समन जारी कर दिया।

इसके बाद आरोपी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने उसे ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज आवेदन देने की छूट दी, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि मामले के तथ्यों की जांच ट्रायल के दौरान होगी। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

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क्या सिर्फ बकाया रकम न चुकाना अपराध है? कोर्ट का जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले धारा 405 और 406 IPC के कानूनी प्रावधानों को समझाया।

कोर्ट ने कहा कि धारा 406 हर उस मामले में लागू नहीं हो सकती, जहां किसी ने किसी का पैसा नहीं चुकाया हो। इस धारा को लागू करने के लिए यह जरूरी है कि कोई सामान, पैसा या संपत्ति किसी व्यक्ति को भरोसे के साथ किसी खास उद्देश्य के लिए सौंपी गई हो और उसने उस भरोसे को तोड़ा हो।

कोर्ट ने कहा कि सामान्य खरीद-बिक्री का सौदा इससे पूरी तरह अलग होता है। जब कोई व्यक्ति किसी से सामान खरीदता है, तो सामान का मालिक वही बन जाता है। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि सामान उसे केवल संभालकर रखने या किसी और के लिए इस्तेमाल करने के लिए दिया गया था।

यानी विक्रेता और खरीदार के बीच का रिश्ता कारोबारी होता है, भरोसे के आधार पर किसी संपत्ति को संभालने वाला नहीं।

इसी वजह से केवल भुगतान बाकी रह जाने से धारा 406 अपने आप लागू नहीं हो जाती।

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इस मामले में धारा 406 क्यों लागू नहीं हुई?

कोर्ट ने शिकायत और गवाहों के बयानों पर गौर किया।कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता ने खुद माना था कि आरोपी समय-समय पर भुगतान करता रहा था। विवाद केवल बची हुई रकम का था।

कोर्ट ने यह भी देखा कि शिकायत में कहीं भी यह आरोप नहीं लगाया गया कि चांदी के आभूषण आरोपी को किसी खास उद्देश्य से सौंपे गए थे या उसने उन्हें किसी और की ओर से संभालकर रखना था। सारा लेन-देन सामान्य व्यापार के तहत हुआ था और सभी आभूषण बिल के आधार पर बेचे गए थे। दो अन्य गवाहों ने भी केवल इतना कहा कि आरोपी ने उधार में सामान लिया और बाकी रकम नहीं चुकाई।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन तथ्यों से केवल इतना पता चलता है कि दोनों पक्षों के बीच भुगतान को लेकर विवाद है। इससे आपराधिक विश्वासघात का मामला नहीं बनता।

कोर्ट ने कहा कि अगर शिकायत में धारा 406 लागू होने की जरूरी बातें ही नहीं हैं, तो सिर्फ ट्रायल चलाने के लिए किसी के खिलाफ आपराधिक केस नहीं चलाया जा सकता।

हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट की गलती कहां हुई?

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस मामले में निचली कोर्टों ने शिकायत में मौजूद तथ्यों को सही कानूनी नजरिए से नहीं परखा। साथ ही कहा कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने धारा 406 IPC लागू होने की जरूरी शर्तों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।

कोर्ट के अनुसार ट्रायल कोर्ट ने बिना जरूरी तत्वों की जांच किए संज्ञान ले लिया और हाईकोर्ट ने भी इस पहलू को नजरअंदाज कर दिया कि मामला सिविल प्रकृति का है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली कोर्टों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल केवल उन्हीं मामलों में हो, जहां स्पष्ट रूप से अपराध के तत्व मौजूद हों।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में धारा 406 IPC के तहत मुकदमा चलाने का कोई आधार नहीं बनता।

कोर्ट ने माना कि यदि शिकायत में दर्ज सभी आरोपों को सही भी मान लिया जाए, तब भी वे आपराधिक विश्वासघात का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के आदेश रद्द कर दिए। साथ ही राहुल अग्रवाल के खिलाफ धारा 406 IPC के तहत चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर दी।

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि शिकायतकर्ता का बकाया रकम मांगने का अधिकार खत्म हो गया है। यदि उसे लगता है कि उसके पैसे बाकी हैं, तो वह सिविल कानून के तहत रकम की वसूली के लिए उचित कार्रवाई कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में कोई राय नहीं दी कि आखिरकार किसका दावा सही है। यह सवाल सिविल कोर्ट में तय होगा।

सिविल और आपराधिक विवाद का फर्क भी समझाया

इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सिविल और आपराधिक विवाद के बीच का अंतर भी साफ किया।

कोर्ट ने कहा कि हर पैसे के लेन-देन का विवाद आपराधिक मामला नहीं होता। अगर खरीद-बिक्री के बाद सिर्फ भुगतान को लेकर विवाद है, तो उसका समाधान सिविल कानून के तहत किया जाना चाहिए। केवल इसलिए कि किसी ने पूरी रकम नहीं चुकाई, उसके खिलाफ धारा 406 का मुकदमा शुरू नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल केवल उन मामलों में होना चाहिए, जहां कानून में तय सभी जरूरी शर्तें पूरी होती हों।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पैसे के सामान्य कारोबारी विवाद का समाधान आपराधिक केस नहीं है। यानी कारोबारी लेन-देन के विवाद को बेवजह आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता।

फैसले का असर: व्यापारिक विवादों में बड़ी राहत

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला व्यापारियों, उद्योगों और कारोबार से जुड़े लोगों के लिए अहम है।

अक्सर कारोबारी लेन-देन में भुगतान को लेकर विवाद होने पर आपराधिक मुकदमे दर्ज कराने की कोशिश की जाती है। इस फैसले से साफ हो गया है कि केवल बकाया रकम न चुकाने के आधार पर धारा 406 IPC नहीं लगाई जा सकती।

यदि मामला सामान्य खरीद-बिक्री का है और विवाद केवल पैसे के भुगतान तक सीमित है, तो उसका समाधान सिविल कानून के तहत ही तलाशना होगा।

साथ ही यह फैसला निचली कोर्टों के लिए भी अम है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि डिस्चार्ज आवेदन पर फैसला करते समय यह देखना जरूरी है कि शिकायत में जिस अपराध का आरोप लगाया गया है, उसके सभी जरूरी कानूनी आधार मौजूद हैं या नहीं।

कोर्ट ने कहा कि अगर शिकायत और रिकॉर्ड से पहली नजर में अपराध का मामला ही नहीं बनता, तो किसी को सिर्फ ट्रायल चलाने के लिए आपराधिक केस में नहीं घसीटा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि कारोबारी बकाया और आपराधिक विश्वासघात दो अलग-अलग बातें हैं और दोनों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।

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