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जोधपुर दीक्षांत समारोह में सीजेआई सूर्यकांत का आह्वान- “कानून को जनता से जोड़े, उसे फिर से बंद किला ना बनने दे

“Time Has Come to Move Law from Fortress to Forum”: CJI Justice Surya Kant’s Inspiring Address at NLU Jodhpur

जोधपुर, 21 फरवरी। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, जोधपुर के 18वें दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि और देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने अपने संबोधन में कहा है कि “कानून अब एक किला नहीं, बल्कि एक मंच होना चाहिए — जहाँ संवाद हो, मतभेद सुने जाएँ और न्याय सुलभ हो।”

सीजेआई ने अपने संबोधन की शुरुआत जोधपुर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर — मेहरानगढ़ किले — का उल्लेख करते हुए कहा कि जैसे यह किला मरुस्थल की हवाओं में सदियों से मजबूती से खड़ा है, वैसे ही कानून भी समाज को अराजकता और असमानता से बचाने का एक किला था।

“कानून को जटिल नहीं, सहज बनाना होगा”

सीजेआई ने कहा कि आधुनिक वकील का कार्य कानून को और कठिन बनाना नहीं, बल्कि उसे “अधिक समझने योग्य और अधिक मानवीय” बनाना है।

“आपका कार्य है कि मंच को विस्तृत करें, दीवारें नहीं खड़ी करें। आपका लक्ष्य होना चाहिए कि कानून समाज से जुड़ा रहे, समाज से दूर न हो।”

उन्होंने जोधपुर की भूमि और रेगिस्तान का उदाहरण देते हुए कहा कि मरुस्थल हमें “संतुलन, धैर्य और दिशा पहचानने” की शिक्षा देता है।

“किला अपने भीतर बंद हो सकता है, लेकिन मंच हमेशा खुला रहता है। इसलिए कानून को भी खुला, उत्तरदायी और मानवीय बनाना आवश्यक है।”

फिर से किला न बन जाए

समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि
“अब समय है कि यह किला एक ‘फॉर्म’, यानी एक खुला मंच बने — जहाँ बहसें हों, विचार टकराएँ, अधिकारों की आवाज़ गूँजे और शक्ति केवल दर्ज न हो, बल्कि विवेक से नियंत्रित भी हो।”

सीजेआई ने आह्वान करते हुए कहा कि
“कानून केवल चंद लोगों की ढाल नहीं, बल्कि बहुसंख्यकों का सहारा है। इसलिए जो इसे अभ्यास में लाते हैं, उन पर यह जिम्मेदारी है कि यह यात्रा निरंतर और निष्पक्ष बनी रहे।”

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कानून को फिर से “जटिल शब्दों, कठिन प्रक्रियाओं और सीमित पहुँच” की दीवारों में कैद किया गया, तो वह फिर एक किला बन जाएगा — “पत्थरों का नहीं, बल्कि बौद्धिक जटिलताओं का।”

कानून: एक विकसित होती जीवंत संस्था

सीजेआई ने कहा कि कानून कभी स्थिर नहीं रहा। यह एक जीवित विचार है जो समाज के साथ विकसित होता है।

“जीवन बदलता है, इसलिए कानून भी बदलता है। परिवर्तन कानून का विघटन नहीं, बल्कि उसका जीवन है।”

उन्होंने ओलिवर वेंडल होम्स के प्रसिद्ध कथन को उद्धृत करते हुए कहा —
“कानून का जीवन तर्क में नहीं, अनुभव में है।”

सीजेआई ने कहा कि जैसे-जैसे समाज परिपक्व होता गया, वैसे-वैसे कानून का स्वरूप भी बदलता गया। कभी जो कानून केवल “सुरक्षा का कवच” था, वह अब “सशक्तिकरण का औजार” बन गया है।

भारतीय संविधान: जीवंत दस्तावेज़, न कि स्थिर ग्रंथ

सीजेआई ने भारतीय संविधान को “जीवंत दस्तावेज़” बताते हुए कहा कि इसे स्थिर ग्रंथ के रूप में नहीं, बल्कि परिवर्तनशील रूप में देखा जाना चाहिए।

सीजेआई ने कहा – “हर पीढ़ी ने संविधान की व्याख्या अपने समय की परिस्थितियों में की है। गोपनीयता से लेकर समानता तक, औपचारिक न्याय से लेकर वास्तविक न्याय तक — हर व्याख्या ने हमारे संविधान को और व्यापक बनाया है।”

सीजेआई ने अपने संबोधन में छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि लॉ की पढ़ाई केवल अधिकारों का ज्ञान नहीं, बल्कि कर्तव्यों की समझ भी है।

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, जोधपुर की प्रशंसा

सीजेआई ने एनएलयू जोधपुर की तारीफ करते हुए कहा कि इस विश्वविद्यालय ने अपनी बौद्धिक कठोरता, अनुसंधानात्मक सोच और सामाजिक उत्तरदायित्व से देश में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।

“यह विश्वविद्यालय केवल रैंकिंग या प्लेसमेंट के आधार पर नहीं, बल्कि अपने विचारों की गहराई, आलोचनात्मक दृष्टिकोण और नैतिक प्रतिबद्धता के आधार पर अग्रणी है।”

उन्होंने कहा कि यह संस्था प्रतिभा नहीं, बल्कि “मानक” निर्यात करती है — ऐसे वकील जो समाज के प्रति उत्तरदायी हों।

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