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जिस कर्मचारी ने खुद को पीड़ित बताकर SC/ST का मुकदमा दर्ज कराया, वही वीडियो में करता दिखा मारपीट

Video Evidence Turns Case Around: Rajasthan HC Slams Probe in SC/ST Act FIR, Orders Senior-Level Investigation

एक ही घटना की दो एफआईआर, जांच अधिकारी की भूमिका पर हाईकोर्ट सख्त, राजसमंद सड़क नामकरण विवाद में हाईकोर्ट का बड़ा हस्तक्षेप, गिरफ्तारी पर रोक

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसले में न केवल पुलिस जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि आपराधिक कानून की प्रक्रिया को किसी व्यक्ति को दबाने, डराने या प्रताड़ित करने का माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता।

जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने भरत कुमार दवे की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट रूम में स्वयं वीडियो क्लिप चलाकर देखी।

वीडियो में चौंकाने वाला दृश्य सामने आया, जिसमें वह सरकारी कर्मचारी, जिसने स्वयं को पीड़ित बताते हुए SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज कराया था, याचिकाकर्ता भरत कुमार दवे पर मुक्कों और लातों से हमला करता हुआ दिखाई दिया।

एसपी को आदेश: वरिष्ठ अधिकारी से कराएं निष्पक्ष जांच

हाईकोर्ट ने राजसमंद के पुलिस अधीक्षक को आदेश दिए कि इस हाई-प्रोफाइल मामले की आगे की जांच किसी अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) या उससे वरिष्ठ अधिकारी से कराई जाए।

कोर्ट ने कहा कि जब एक ही घटना को लेकर दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज हों और दोनों के कथन परस्पर विरोधाभासी हों, तब जांच एजेंसी का दायित्व और भी अधिक बढ़ जाता है। ऐसे मामलों में निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और साक्ष्यों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन अनिवार्य है।

क्या है राजसमंद सड़क नामकरण विवाद

यह मामला राजसमंद जिले के कांकरोली क्षेत्र में सड़क के नाम परिवर्तन को लेकर उत्पन्न विवाद से जुड़ा है। नगर परिषद, राजसमंद द्वारा एक सड़क का नाम बदलने का निर्णय लिया गया था, जिसका याचिकाकर्ता भरत कुमार दवे ने विरोध किया।

याचिकाकर्ता का कहना था कि संबंधित सड़क एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व से जुड़ी है और बिना जनसहमति ऐसा परिवर्तन उचित नहीं है।

इसी विरोध के दौरान मौके पर मौजूद नगर परिषद अध्यक्ष, अधिशासी अधिकारी और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी (जमादार/प्यून) जयराज कालोसिया के साथ विवाद बढ़ गया, जो हाथापाई और मारपीट तक पहुंच गया।

एक घटना, दो एफआईआर

घटना के बाद दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गईं।

एक एफआईआर नगर परिषद अध्यक्ष, अधिशासी अधिकारी और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जयराज कालोसिया की ओर से दर्ज कराई गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता और उसके साथियों ने सरकारी कार्य में बाधा डाली, मारपीट की और जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया।

इसी एफआईआर में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जयराज कालोसिया की ओर से SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धाराएं भी जोड़ी गईं।

वहीं दूसरी एफआईआर में भरत कुमार दवे ने स्वयं को पीड़ित बताते हुए आरोप लगाया कि कुछ लोगों ने उसे पकड़कर बुरी तरह पीटा।

जांच अधिकारी की भूमिका पर कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि जांच अधिकारी ने याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए प्रतिवेदन को केवल फाइल में संलग्न किया, लेकिन उस पर कोई वास्तविक विचार नहीं किया।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी बताया गया कि जांच अधिकारी ने उसके अधिवक्ता को संकेत दिया कि अपराध “सिद्ध” हो चुका है और शीघ्र गिरफ्तारी की जाएगी। कोर्ट ने इसे पूर्वनिर्धारित मानसिकता (pre-determined mindset) का गंभीर संकेत बताया।

वीडियो क्लिप से बदली पूरे मामले की दिशा

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता योगेन्द्र सिंह चारण ने एक वीडियो क्लिप पेश की। वीडियो में पाँच से छह व्यक्ति याचिकाकर्ता को जबरन पकड़े हुए दिखाई दिए, जबकि SC/ST मुकदमा दर्ज कराने वाला चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी स्वयं याचिकाकर्ता पर हमला करता नजर आया।

कोर्ट में मौजूद जांच अधिकारी, उप पुलिस अधीक्षक रोहित चावला ने संकोच के साथ स्वीकार किया कि वीडियो उसी घटना का है, जिसकी एफआईआर दर्ज की गई है।

हाईकोर्ट ने वीडियो को महत्वपूर्ण प्रथम दृष्टया साक्ष्य मानते हुए कहा कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

SC/ST एक्ट की धाराओं पर भी उठे सवाल

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर मामले की मेरिट में नहीं जा रहा, लेकिन SC/ST अधिनियम की धाराएं जोड़ने को लेकर गंभीर और वस्तुनिष्ठ जांच आवश्यक है।

कोर्ट ने महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि यदि याचिकाकर्ता का चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से कोई व्यक्तिगत शत्रुता या पूर्व विवाद नहीं था, तो वह उसे जातिसूचक शब्दों से अपमानित क्यों करेगा? इस पहलू की जांच किए बिना सीधे निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है।

गिरफ्तारी पर रोक, संविधान का हवाला

जस्टिस फरजंद अली ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत का कर्तव्य है कि वह नागरिकों के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करे।

कोर्ट ने दो टूक कहा कि यदि आपराधिक कानून का उपयोग किसी व्यक्ति को दबाने या राजनीतिक/प्रशासनिक प्रभाव में डराने के लिए किया जा रहा है, तो न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।

याचिकाकर्ता को बड़ी राहत

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता भरत कुमार दवे को बड़ी राहत देते हुए आदेश दिया कि अगली सुनवाई और निष्पक्ष जांच के निष्कर्ष आने तक उसकी गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।

साथ ही निर्देश दिया गया कि याचिकाकर्ता 10 फरवरी 2026 तक जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर अपना बयान दर्ज कराए और वीडियो साक्ष्य विधिवत प्रमाणित रूप में प्रस्तुत करे।

मामले की अगली सुनवाई 16 फरवरी 2026 को तय की गई है।

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