जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने कथित वीआईपी नंबर घोटाले में परिवहन विभाग द्वारा जारी उन आदेशों पर अहम अंतरिम रोक लगा दी है, जिनके आधार पर प्रदेशभर में अधिकारियों-कर्मचारियों और वाहन मालिकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए गए थे।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना व्यक्तिगत दोष और जवाबदेही तय किए किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती, और ऐसी कार्रवाई कानून के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
यह आदेश जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने जोधपुर और पाली के पूर्व जिला परिवहन अधिकारियों सहित कुल 17 याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए पारित किया।
अदालत ने राज्य सरकार, गृह सचिव, प्रमुख सचिव, परिवहन आयुक्त और राज्य के पुलिस महानिदेशक को नोटिस जारी करते हुए मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद तय की है।
आदेशों पर रोक, एफआईआर की कार्रवाई भी स्थगित
हाईकोर्ट ने परिवहन विभाग के 20 नवंबर 2025 और 9 दिसंबर 2025 को जारी उन आदेशों पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिनके तहत एफआईआर दर्ज कराने और दंडात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए थे।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि इन आदेशों के आधार पर कोई एफआईआर पहले ही दर्ज हो चुकी है, तो उस पर आगे की कार्रवाई भी अगली सुनवाई तक स्थगित रहेगी और किसी भी प्रकार का दमनात्मक कदम नहीं उठाया जाएगा।
कोर्ट का यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इन आदेशों के चलते बड़ी संख्या में पूर्व और वर्तमान अधिकारियों-कर्मचारियों पर आपराधिक मुकदमे का खतरा मंडरा रहा था।
क्या है पूरा विवाद
यह विवाद मुख्य रूप से 1989 से पहले के पुराने वाहन पंजीकरण नंबरों के नवीनीकरण, संरक्षण (Retention) और वर्ष 2013 से पूर्व के वाहनों के बैकलॉग डेटा को VAHAN सॉफ्टवेयर में दर्ज करने की प्रक्रिया से जुड़ा है।
परिवहन विभाग की एक जांच समिति ने आरोप लगाया था कि इन प्रक्रियाओं में गंभीर अनियमितताएं हुईं, जिससे राज्य सरकार को कथित तौर पर 400 से 600 करोड़ रुपये तक के राजस्व नुकसान की आशंका है।
जांच रिपोर्ट के आधार पर विभाग ने अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने और विभागीय कार्रवाई शुरू करने के आदेश जारी कर दिए थे।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मुक्तेश माहेश्वरी ने अदालत में जोरदार दलीलें पेश करते हुए कहा कि जांच समिति की 4 अप्रैल 2025 की रिपोर्ट अस्थायी और अपूर्ण थी।
इसमें न तो किसी आरोपी की स्पष्ट पहचान की गई, न किसी जाली दस्तावेज का ठोस उल्लेख किया गया और न ही किसी प्रकार की आपराधिक मंशा साबित की गई।
उन्होंने तर्क दिया कि जिन अधिकारियों के खिलाफ आरोप लगाए गए, उन्हें न तो कोई नोटिस दिया गया, न सुनवाई का अवसर, और न ही उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन है।
अधिवक्ता ने यह भी कहा कि जांच रिपोर्ट पूरी तरह अनुमानों और कयासों पर आधारित है। कथित राजस्व नुकसान के आकलन के लिए न तो किसी वित्तीय सलाहकार की रिपोर्ट पेश की गई और न ही वाहन-वार विवरण उपलब्ध कराया गया।
रिपोर्ट में यह तक स्पष्ट नहीं किया गया कि किस वाहन से कितना नुकसान हुआ और किस अधिकारी ने कौन-सा नियम तोड़ा।
‘VIP नंबर’ की अवधारणा पर सवाल
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि 1989 से पहले तीन अंकों वाले रजिस्ट्रेशन नंबरों को आज ‘VIP नंबर’, ‘हेरिटेज नंबर’ या ‘फैंसी नंबर’ बताकर आरोप लगाए जा रहे हैं, जबकि उस समय ऐसी कोई श्रेणी अस्तित्व में ही नहीं थी। उस दौर में सभी वाहन सामान्य क्रम में पंजीकृत होते थे।
इसके अलावा, परिवहन विभाग ने समय-समय पर आदेश जारी कर पुराने पंजीकरण नंबरों के Retention और Transfer की अनुमति दी है और इसके लिए निर्धारित शुल्क भी वसूला गया है। ऐसे में यह कहना कि इन नंबरों को नीलाम किया जा सकता था और इससे सैकड़ों करोड़ रुपये की आय होती, पूरी तरह काल्पनिक और अव्यावहारिक है।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब तक व्यक्तिगत दोष तय न हो, तब तक आपराधिक कानून को आगे बढ़ाना स्वीकार्य नहीं है।
किसी सामूहिक या यांत्रिक आदेश के आधार पर एफआईआर दर्ज कराना कानून की भावना के विपरीत है।