जयपुर, 14 अक्टूबर 2025
Rajasthan Highcourt ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कानूनी व्याख्या स्पष्ट करते हुए कहा है कि भारतीय सेना, नौसेना या वायुसेना के जवानों को भेजे जाने वाले समन (Summons) की सेवा व्हाट्सएप मैसेज के माध्यम से करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
Rajasthan Highcourt ने कहा कि ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया के तहत समन संबंधित सैनिक के कमांडिंग अफसर के माध्यम से ही भेजा जाना अनिवार्य है।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने यह आदेश सेना के जवान दीवान सिंह की ओर से दायर याचिका पर दिए हैं।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने करौली फैमिली कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ता जवान के खिलाफ दिए गए एक्स-पार्टी (एकतरफा) आदेश को रद्द कर दिया है।
फैमिली कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ उसकी पत्नी द्वारा दायर भरण-पोषण के मुकदमे में ₹12,000 प्रति माह देने का आदेश दिया था, जो कि व्हाट्सएप पर भेजे गए समन को आधार मानते हुए पारित किया गया था।
यह है मामला
याचिकाकर्ता दीवान सिंह भारतीय सेना में सिपाही के पद पर कार्यरत था और उस समय वह उच्च हिमालयी क्षेत्र में ऑपरेशनल ड्यूटी पर तैनात था।
इसी दौरान उसकी पत्नी ने भरण-पोषण की मांग करते हुए धारा 125 सीआरपीसी के तहत करौली फैमिली कोर्ट में आवेदन किया।
फैमिली कोर्ट ने याचिकाकर्ता को तीन बार समन जारी किया, लेकिन सेवा पूरी नहीं हुई।
जिसके बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता के व्हाट्सएप नंबर पर समन भेजा और स्क्रीनशॉट के आधार पर इसे “सेवा पूर्ण” मान लिया।
इसके बाद फैमिली कोर्ट ने बिना उसकी उपस्थिति के एक्स-पार्टी आदेश पारित किया।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता दीवान सिंह की ओर से अधिवक्ता राजेंद्र राठौड़, अजय पूनिया और लोकेश धौलपुरिया ने दलील देते हुए कहा कि सेना, वायुसेना और नौसेना को सामूहिक रूप से सशस्त्र बल (Armed Forces) कहा जाता है।
ये अत्यंत संगठित और अनुशासित बल हैं, जिन्हें विशेष रूप से युद्ध संचालन, बाहरी खतरों से राज्य की रक्षा करने और अन्य विशेष अभियानों को संचालित करने के लिए गठित किया गया है।
इन बलों को संबंधित राज्य द्वारा अधिकृत और सुव्यवस्थित रूप से बनाए रखा जाता है तथा इनके सदस्यों के लिए अलग सैन्य वर्दी निर्धारित होती है।
विधायिका द्वारा सेना, वायुसेना और नौसेना के जवानों के लिए समन की सेवा (Service of Summons) के लिए एक विशेष प्रक्रिया/प्रावधान निर्धारित किए गए हैं, ताकि जब उनके विरुद्ध व्यक्तिगत क्षमता में कोई वाद दायर हो, तो उन्हें विधि अनुसार अदालत के समक्ष पेश होने का अवसर मिल सके।
नोटिस प्राप्त नहीं
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता भारतीय सेना में एक सिपाही के पद पर कार्यरत है और मुकदमे की अवधि में वह सितंबर 2024 तक अत्यंत कठिन और ऊँचाई वाले संचालन क्षेत्र (Operational Exigencies Treacherous High Altitude Area) में तैनात रहा।
अधिवक्ता ने बताया कि Family Court द्वारा जारी किए गए नोटिस याचिकाकर्ता को कभी प्राप्त नहीं हुए।
अधिवक्ता ने आगे कहा कि जनरल रूल्स (सिविल एवं क्रिमिनल), 2018 के आदेश 31 के नियम 5 (Order 31 Rule 5) के अनुसार किसी सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक को समन भेजे जाने की प्रक्रिया उसके कमांडिंग ऑफिसर के माध्यम से की जानी आवश्यक है, जिसके साथ एक प्रति संबंधित व्यक्ति के पास रखने हेतु भेजी जाती है।
साथ ही, इस नियम के अनुसार संबंधित अधिकारी को राहत (relieving) की व्यवस्था करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना अनिवार्य है, परंतु इस मामले में उक्त प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और केवल व्हाट्सएप संदेश के आधार पर नोटिस की सेवा पूर्ण मान ली गई।
अधिवक्ता ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को Family Court के समक्ष पेश होने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल सका, जिसके परिणामस्वरूप एकपक्षीय आदेश (ex-parte order) पारित किया गया, जो कानून की दृष्टि में टिकाऊ नहीं है और इसे रद्द (quash) एवं निरस्त (set aside) किया जाना जरूरी है।
सरकार का जवाब
राज्य सरकार की ओर से मामले में राजकीय अधिवक्ता अमित पूनिया और धुराराम ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि Family Court द्वारा याचिकाकर्ता को समन उसके व्हाट्सएप नंबर पर भेजे गए थे और वे समन याचिकाकर्ता को प्राप्त भी हो गए थे।
इसलिए, याचिकाकर्ता यह बहाना नहीं बना सकता कि उसे पत्नी द्वारा धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) के अंतर्गत दायर आवेदन की जानकारी नहीं थी।
अधिवक्ता ने आगे कहा कि धारा 125 Cr.P.C. के तहत लंबित कार्यवाही की जानकारी होने के बावजूद याचिकाकर्ता ने जानबूझकर Family Court के समक्ष उपस्थिति नहीं दी।
इसलिए, ऐसी परिस्थितियों में Family Court ने याचिकाकर्ता के खिलाफ एकपक्षीय (ex-parte) आदेश पारित करते हुए प्रति माह ₹12,000 भरण-पोषण राशि देने का आदेश दिया, जिसमें कोई त्रुटि नहीं की गई है।
राजकीय अधिवक्ता ने कहा कि Family Court के आदेश में किसी तरह के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
मुख्य कानूनी बिंदु
दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने इस मामले के मुख्य कानूनी प्रश्न को तय किया —
“क्या सशस्त्र बलों (Armed Forces) में कार्यरत सैनिक (Soldier), नाविक (Sailor) या वायुसैनिक (Airman) को भेजे गए समन, यदि केवल उनके व्हाट्सएप नंबर पर भेजे जाएं, तो क्या ऐसी सेवा पर्याप्त मानी जा सकती है जिससे उनके विरुद्ध एकपक्षीय कार्यवाही की जा सके?”
अदालत ने इस कानूनी प्रश्न का जवाब स्पष्ट करते हुए कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (Code of Civil Procedure) के आदेश 5 नियम 28 (Order V Rule 28) में सैनिकों, नाविकों और वायुसैनिकों को समन (Summons) की सेवा से संबंधित प्रावधानों और प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है, जिसके अनुसार —
“सैनिकों, नाविकों या वायुसैनिकों को समन की सेवा — जब प्रतिवादी कोई सैनिक, नाविक या वायुसैनिक हो, तो अदालत को समन उसकी सेवा के लिए उसके कमांडिंग ऑफिसर (Commanding Officer) को भेजना चाहिए और साथ ही एक प्रति उस व्यक्ति के पास रखने हेतु भी भेजी जानी चाहिए।”
व्यवस्था के लिए समय जरूरी
अदालत ने कहा कि इस प्रावधान से स्पष्ट है कि सैनिकों के मामले में यह अनिवार्य है कि अदालत का अध्यक्ष या प्रक्रिया सर्वर (Process Server) समन को संबंधित सैनिक, नाविक या वायुसैनिक के कमांडिंग ऑफिसर को भेजे, साथ ही उसकी एक प्रति संबंधित व्यक्ति को रखने के लिए दी जाए।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया इसलिए आवश्यक मानी गई है ताकि सैनिक को सशस्त्र बलों के अभियानों से मुक्त करने हेतु आवश्यक व्यवस्था करने के लिए पर्याप्त समय दिया जा सके।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता द्वारा फैमिली कोर्ट की सुनवाई में Captain Officiating Adjutant for Commanding Officer पेश किए गए प्रमाण पत्र का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता उस समय उच्च ऊंचाई वाले कठिन और खतरनाक क्षेत्र में ऑपरेशनल ड्यूटी पर सितंबर 2024 तक तैनात था।
जिससे स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता सैन्य अभियानों में सक्रिय रूप से शामिल था और सितंबर 2024 से पूर्व उसे अवकाश नहीं मिल सकता था, जबकि विवादित आदेश 7 जून 2024 को दिया गया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता को उसके व्हाट्सएप नंबर पर भेजे गए समन की सेवा को पर्याप्त नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह आदेश 31 नियम 5 (Order 31 Rule 5) सामान्य नियम (सिविल एवं क्रिमिनल) 2018 तथा आदेश 5 नियम 28 (Order V Rule 28 CPC) में निर्धारित अनिवार्य प्रक्रिया का उल्लंघन है।
फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में करौली फैमिली कोर्ट के आदेश को विधिसम्मत नहीं होने के आधार पर रद्द करने का आदेश दिया है।
साथ ही हाईकोर्ट ने मामले को पुनः फैमिली कोर्ट को भेजते हुए नए सिरे से सुनवाई के आदेश दिए हैं।
कोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर देते हुए नए सिरे से सुनवाई करें और चार माह में मामले का निपटारा करें।
हाईकोर्ट ने इस फैसले की प्रति राजस्थान हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजकर राज्य के सभी न्यायिक अधिकारियों को भेजने के निर्देश दिए हैं, जिसमें फैमिली कोर्ट के न्यायिक अधिकारी भी शामिल हैं।