जोधपुर। जोधपुर के फैमिली कोर्ट ने एक ऐसे मामले में विवाह को शून्य घोषित किया है, जिसमें पत्नी पर अपने पहले विवाह के सच को छुपाने का आरोप लगा था।
फैमिली कोर्ट ने इस मामले में पत्नी द्वारा पहले विवाह के तथ्य को छुपाने के आधार पर उसके वर्तमान दूसरे विवाह को शून्य घोषित कर दिया है।
फैमिली कोर्ट संख्या 1 ने पति की ओर से दायर मुकदमे में फैसला सुनाते हुए हिंदू विवाह अधिनियम की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि हिंदू रीति-रिवाजों के तहत होने वाले विवाह में ‘सप्तपदी’ (अग्नि के समक्ष सात फेरे) एक अनिवार्य कानूनी शर्त है।
रस्में पूर्ण होना जरूरी
अदालत ने कहा कि केवल आर्य समाज मंदिर का प्रमाण पत्र या विवाह पंजीकरण अपने आप में विवाह को वैध नहीं बनाता, जब तक कि अधिनियम की धारा 7 में वर्णित आवश्यक रस्में पूरी न की गई हों।
जज सतीश चंद्र गोदारा की अदालत ने इस मामले में पति महेन्द्र सिंह चौहान द्वारा दायर याचिका स्वीकार करते हुए पत्नी प्रीति सिकरवार के साथ 5 फरवरी 2017 को हुए विवाह को शून्य (Void) घोषित कर दिया।
अदालत ने माना कि प्रीति का पूर्व विवाह विधिक रूप से अस्तित्व में था और उसका कोई वैधानिक विच्छेद नहीं हुआ था, जिसे छिपाकर दूसरा विवाह किया गया।
ऑनलाइन पोर्टल से रिश्ता, ‘पूर्व विवाह’ का राज
प्रार्थी महेन्द्र सिंह चौहान की ओर से दायर की गई शिकायत में कहा गया कि उसने ‘शादी डॉट कॉम’ के माध्यम से प्रीति सिकरवार से संपर्क किया था।
दोनों पक्षों के बीच बातचीत के बाद 2 फरवरी 2017 को एक लिखित इकरारनामा तैयार किया गया, जिसमें दोनों को अविवाहित बताया गया। इसके बाद 5 फरवरी 2017 को हिंदू रीति-रिवाजों से विवाह संपन्न हुआ।
प्रार्थी के अधिवक्ता ने कोर्ट में तर्क दिया कि विवाह के कुछ समय बाद उन्हें पता चला कि प्रीति सिकरवार ने 8 फरवरी 2011 को रणजीत कुमार विद्यार्थी के साथ आर्य समाज मंदिर, रामबाग स्कीम, महामंदिर, जोधपुर में विवाह किया था।
यह विवाह न तो विधिक रूप से विच्छेदित हुआ था और न ही उसकी जानकारी प्रार्थी को दी गई।
मामले की सुनवाई के दौरान अप्रार्थी पत्नी की ओर से पहले किसी भी वैध विवाह से इनकार किया।
सप्तपदी है वैध विवाह की आत्मा
पति के अधिवक्ता ने अदालत से हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 का आधार बनाते हुए कहा कि हिंदू विवाह की वैधता के लिए पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन आवश्यक है और यदि पक्षकारों की परंपरा में ‘सप्तपदी’ अनिवार्य है, तो अग्नि के समक्ष सात फेरे लिए बिना विवाह पूर्ण नहीं माना जा सकता।
जज गोदारा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के ‘श्रुति अग्निहोत्री बनाम आनंद कुमार’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि केवल आर्य समाज मंदिर का प्रमाण पत्र विवाह का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं हो सकता, यदि मूल धार्मिक संस्कार सिद्ध न हों।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह पंजीकरण एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जो तभी मान्य है जब मूल विवाह विधिक रूप से संपन्न हुआ हो। यदि विवाह की बुनियादी रस्में ही पूरी न हुई हों, तो पंजीकरण से उसकी वैधता स्वतः सिद्ध नहीं होती।
दहेज और क्रूरता के आरोप
सुनवाई के दौरान अप्रार्थी प्रीति सिकरवार ने प्रार्थी और उसके परिवार पर दहेज उत्पीड़न और क्रूरता के गंभीर आरोप लगाए।
पत्नी के वकील ने दावा किया कि सगाई और विवाह के समय भारी मात्रा में आभूषण और नकद राशि दी गई थी तथा अतिरिक्त दहेज की मांग को लेकर प्रताड़ित किया गया। गर्भपात कराने के प्रयास के भी आरोप लगाए गए।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इन आरोपों के संबंध में पीसीपीएनडी, जोधपुर महानगर द्वारा 27 जनवरी 2020 को भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए और 406 के तहत प्रसंज्ञान लिया जा चुका है और वह मामला अलग से विचाराधीन है।
अतः इस आदेश में उन आरोपों पर कोई टिप्पणी नहीं की गई।
पूर्व विवाह छिपाना ठहराया गंभीर तथ्य
अदालत ने सभी पक्षों की बहस और दलीलें सुनने के बाद कहा कि इस मामले में महिला प्रीति सिकरवार ने अपने पूर्व विवाह के तथ्य को छिपाया।
अदालत ने माना कि उपलब्ध साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि उनका पूर्व विवाह विधिक रूप से समाप्त नहीं हुआ था।
ऐसी स्थिति में, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 11 के तहत यह दूसरा विवाह शून्य की श्रेणी में आता है, क्योंकि किसी भी पक्ष के जीवित पति या पत्नी के रहते दूसरा विवाह वैध नहीं हो सकता।