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हाईकोर्ट ने कहा सेमी-परमानेंट दर्जा पाने के लिए प्रारंभिक योग्यता खास नहीं होती, बल्कि लगातार कार्य करने का होना आवश्यक

जयपुर, 24 सितम्बर।

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्टोर-मुंशी पद पर वर्षों से कार्यरत दो कर्मचारियों को सेमी-परमानेंट दर्जा देने का आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा जारी 12 मई 2016 के आदेशों को अवैध, मनमाना और असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया।

जस्टिस आनंद शर्मा की एकलपीठ ने कहा कि सेमी-परमानेंट दर्जा पाने का अधिकार किसी बाद के प्रशासनिक परिवर्तनों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह निरंतर रूप से निभाई गई जिम्मेदारियों की वास्तविकता से उत्पन्न होता है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं की स्टोर-मुंशी के रूप में अविरल सेवा, जिसे विभागीय प्रमाण पत्रों, रजिस्टरों और कार्यालयीन पत्राचार से प्रमाणित किया गया है, उन्हें सेमी-परमानेंट दर्जा दिए जाने की कानूनी शर्तों को स्पष्ट रूप से पूरा करती है।

दो साल का नियम

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता वर्ष 1987 और 1991 से विभागों में सहायक के पद पर नियुक्त हुए थे, लेकिन शुरू से ही स्टोर-मुंशी की जिम्मेदारियां निभा रहे थे।

उन्होंने लगातार स्टॉक रजिस्टर बनाए, लेखा-जोखा तैयार किया और सामग्री वितरण जैसी जिम्मेदारियां संभालीं। विभागीय पत्राचार और प्रमाण पत्र भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं।

वहीं, राज्य सरकार ने तर्क दिया कि कर्मचारियों के पास प्रारंभिक नियुक्ति के समय आवश्यक योग्यता नहीं थी और 1994 के बाद “वर्क-चार्ज कैडर” को “डाइंग कैडर” घोषित कर दिया गया था।

कोर्ट ने इन तर्कों को पूरी तरह अस्वीकार करते हुए कहा कि 1964 के नियमों के तहत दो साल लगातार सेवा देने के बाद कर्मचारी को स्वतः सेमी-परमानेंट दर्जा मिलना चाहिए।

लाभ रोकना असंगत

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि अन्य समान परिस्थिति वाले कर्मचारियों जैसे प्रेम रतन शर्मा, मुस्ताक अली और मदनलाल सांखला को पहले ही यह लाभ दिया जा चुका है। ऐसे में याचिकाकर्ताओं को लाभ से वंचित रखना भेदभावपूर्ण है और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट तक कायम हो चुके हेमसिंह बनाम राज्य सरकार के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि विभागीय तकनीकी आधार पर लाभ रोकना असंगत है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों याचिकाकर्ता—एक 15 मार्च 1991 से और दूसरा 16 अक्टूबर 1987 से—स्टोर-मुंशी पद पर सेमी-परमानेंट माने जाएंगे और उन्हें सभी वित्तीय व सेवा संबंधी लाभ दिए जाएंगे।

हाईकोर्ट ने दो माह में इस आदेश की पालना करने के निर्देश दिए हैं।

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