जोधपुर। राजस्थान की न्यायिक व्यवस्था में एक अनोखा और विरोधाभासी दृश्य देखने को मिल रहा है। एक ओर जहां Rajasthan High Court Jaipur Bench अपना 50वां स्थापना दिवस पूरे राज्य में उत्साह और समारोह के साथ मना रही है, वहीं दूसरी ओर Rajasthan High Court Jodhpur की मुख्यपीठ पर अधिवक्ताओं का न्यायिक कार्य बहिष्कार लगातार जारी है।
यह बहिष्कार कोई नया आंदोलन नहीं, बल्कि पिछले 49 वर्षों से चला आ रहा एक ऐतिहासिक संघर्ष है।
एकीकृत हाईकोर्ट की मांग को लेकर शनिवार को जनवरी माह के अंतिम कार्य दिवस पर Rajasthan High Court Advocates Association एवं Rajasthan High Court Lawyers Association के आह्वान पर न्यायिक कार्य का बहिष्कार किया गया।
अध्यक्ष दिलीप सिंह उदावत के नेतृत्व में बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं ने इसमें भाग लिया।
इस दौरान महिला अधिवक्ताओं की सक्रिय भागीदारी भी देखने को मिली, जिन्होंने हाईकोर्ट परिसर में मौजूद रहकर एकीकृत हाईकोर्ट की मांग को मजबूती से उठाया।

अधिवक्ताओं का कहना है कि वर्ष 1977 में, आपातकाल के दौर में जयपुर में हाईकोर्ट पीठ की स्थापना की गई थी। तभी से जोधपुर के अधिवक्ता इसके विरोध में और न्यायिक एकरूपता की मांग को लेकर आंदोलनरत हैं।
यही कारण है कि राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ में हर माह के अंतिम कार्यदिवस को न्यायिक कार्य बहिष्कार किया जाता है, और यह परंपरा पिछले 49 वर्षों से बिना रुके जारी है।
इस बार आंदोलन का स्वर इसलिए भी अधिक तीखा नजर आया क्योंकि जयपुर में हाईकोर्ट पीठ की स्थापना के 50 वर्ष पूरे होने पर उत्सव मनाया जा रहा है, जबकि जोधपुर में उसी स्थापना के विरोध में हड़ताल की जा रही है।

अधिवक्ताओं ने इसे “एक तरफ जश्न, दूसरी तरफ संघर्ष” बताते हुए हाईकोर्ट परिसर और ऐतिहासिक हेरिटेज बिल्डिंग के सामने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया और नारेबाजी के माध्यम से अपना विरोध दर्ज कराया।
हेरिटेज बिल्डिंग के समक्ष हुए प्रदर्शन में अध्यक्ष रणजीत जोशी के नेतृत्व में अधिवक्ताओं ने न्यायिक कार्य का पूर्ण बहिष्कार रखा।
अधिवक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि यह आंदोलन न तो किसी व्यक्ति के खिलाफ है और न ही किसी संस्था के विरुद्ध, बल्कि न्यायिक ढांचे में संतुलन और प्रशासनिक सुविधा की मांग को लेकर है। उनका मानना है कि एकीकृत हाईकोर्ट से न्यायिक प्रक्रिया अधिक सुचारु, प्रभावी और जनहितकारी होगी।
अधिवक्ताओं ने दोहराया कि जब तक एकीकृत हाईकोर्ट की मांग पूरी नहीं होती, तब तक उनका यह शांतिपूर्ण, अनुशासित और लोकतांत्रिक आंदोलन इसी तरह जारी रहेगा।
राजस्थान के न्यायिक इतिहास में यह संभवतः देश की सबसे लंबी चली आ रही प्रतीकात्मक हड़ताल मानी जा रही है, जो आज भी उद्देश्य के साथ जारी है।