जयपुर/जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट के वर्ष 2026 के चौथे सप्ताह में आए रिपोर्टेबल और ऐतिहासिक फैसलों का यह साप्ताहिक संक्षेप प्रस्तुत किया जा रहा है।
इस सप्ताह दिए गए निर्णय केवल उनकी संख्या के कारण नहीं, बल्कि संवैधानिक महत्व, सामाजिक प्रभाव और प्रशासनिक दूरगामी परिणामों के चलते विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे।
इस दौरान हाईकोर्ट ने ऐसे कई फैसले दिए, जो आगे चलकर देश की न्यायपालिका के लिए नजीर (प्रेसिडेंट) बन सकते हैं। निर्णयों में आम नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा, सरकारी तंत्र की जवाबदेही, सेवा कानून, आपराधिक न्याय, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और वरिष्ठ नागरिकों के हितों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर स्पष्ट दिशा दी गई।
यह वीकली डाइजेस्ट उन फैसलों का संक्षिप्त लेकिन सारगर्भित विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जो अधिवक्ताओं, न्यायिक अधिकारियों, लॉ स्टूडेंट्स, सरकारी विभागों और नीति-निर्माताओं के लिए मार्गदर्शक हैं। साथ ही, ये निर्णय कानून के शासन (Rule of Law) को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होते हैं।
वीकली डाइजेस्ट चौथा सप्ताह -2026
1 अवमानना कार्यवाही का उद्देश्य आदेश का “निष्पादन” (execution) कराना नहीं है।
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने अतिक्रमण हटाने से जुड़े एक पुराने मामले में दायर दूसरी अवमानना याचिका को सख्त टिप्पणी के साथ याचिकाकर्ताओं पर ₹1 लाख का जुर्माने के साथ याचिका को खारिज किया.
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि खारिज करते स्पष्ट किया कि जहां वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध हों, वहां अवमानना को निष्पादन का औजार नहीं बनाया जा सकता।
2 समन की कानूनी तरीके से सेवा नहीं, तो एक्स-पार्टी डिक्री टिकाऊ नहीं
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि यदि किसी मुकदमे में सामने वाले पक्षकारों यानी प्रतिवादी को समन की कानूनी तरीके से सेवा नहीं हुई है, तो उसके विरुद्ध पारित एक्स-पार्टी (एकतरफा) डिक्री टिकाऊ नहीं मानी जा सकती।
कोर्ट ने कहा कि एक्स-पार्टी कार्यवाही तभी हो सकती है, जब न्यायालय पूरी तरह संतुष्ट हो जाए कि प्रतिवादी को वास्तव में समन की जानकारी थी।
3 लंबे समय बाद आरोपियो को दोबारा जेल भेजना न्यायहित में नहीं
राजस्थान हाईकोर्ट ने करीब 33 वर्ष पुराने एक आपराधिक मामले में आरोपियों को उनके अपराध के लिए दोषी घोषित किया है, लेकिन अपराध के समय युवा अवस्था में रहे इन आरोपियों को 33 साल बाद जेल भेजने से इनकार किया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में खासतौर से प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958 की धारा 4 पर जोर देते हुए कहा कि यह धारा अदालत को व्यापक और कल्याणकारी अधिकार देती है कि यदि अपराध मृत्यु दंड या आजीवन कारावास से दंडनीय नहीं है, तो आरोपी को अच्छे आचरण पर प्रोबेशन पर छोड़ा जा सकता है।
4 वकीलों को हड़ताल का अधिकार नहीं / गरीबी सजा का आधार नहीं बन सकती
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक कैदी की याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यदि सजा निलंबन के दौरान लगाई गई शर्तें ऐसी हों, जिन्हें आरोपी अपनी आर्थिक स्थिति के कारण पूरा न कर सके, तो यह अपील के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को निष्फल करने जैसा होगा।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के CBI बनाम अशोक सिरपाल फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जुर्माना जमा करने की शर्त ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिसे पूरा करना असंभव हो।
इसी मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने अधिवक्ताओं की हड़ताल को भी स्पष्ट किया है कि वकीलों को न तो हड़ताल करने का अधिकार है और न ही सांकेतिक बहिष्कार का।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि इस प्रकार की हड़तालें न्याय चाहने वाले आम नागरिकों को “बंधक” बना लेती हैं और न्याय व्यवस्था को ठप कर देती हैं-
5 अस्थायी बताकर कर्मचारी अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई कर्मचारी स्वीकृत पद पर वर्षों तक निरंतर सेवा देता रहा है, उससे नियमित कर्मचारी की तरह कार्य लिया गया है और बाद में उसे नियमित किया गया है, तो उसकी प्रारंभिक सेवा अवधि को वरिष्ठता, पदोन्नति, वेतनमान और पेंशन जैसे सेवा लाभों से अलग नहीं किया जा सकता।
6 बिना सुने पुलिस अफसर को कटघरे में खड़ा करना गैरकानूनी
राजस्थान हाईकोर्ट ने राजुराम चौधरी के मामले में स्पष्ट किया कि संज्ञान, पुनरीक्षण या रिमांड के स्तर पर अदालतों को संयम (Judicial Restraint) बरतना चाहिए। इस स्तर पर ऐसे निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते, जो जांच की निष्पक्षता पर अंतिम राय बना दें और संबंधित अधिकारी की सेवा या प्रतिष्ठा को प्रभावित करें।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब तक मामला तय करने के लिए अनिवार्य न हो, तब तक किसी व्यक्ति के विरुद्ध कठोर या कलंकित टिप्पणियां नहीं की जानी चाहिए।
7 प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर स्वतंत्र मेरिट पर निर्णय लिया जाए।
नर्सिंग/हेल्थ वर्कर भर्ती मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने जामिया और अलीगढ़ द्वारा जारी ADEEB (अदीब) योग्यता 10वीं कक्षा (माध्यमिक) के समकक्ष मान्यता देने और नियुक्तियों के लिए पात्र माने जाने के एकल पीठ के आदेश को रद्द करते हुए मामले को पुनः विचार हेतु एकल पीठ को वापस भेज दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि एकल पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेशों और तथ्यों पर स्वतंत्र रूप से विचार नहीं किया। केवल पूर्व फैसलों पर निर्भर रहते हुए मामले का निपटारा कर दिया गया, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिए थे कि प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर स्वतंत्र मेरिट पर निर्णय लिया जाए।
8 गंभीर अपराधों में आरोप तय करना केवल औपचारिकता नहीं हो सकती, अदालतें केवल जांच एजेंसी की राय पर मुहर लगाने का मंच नहीं हो सकतीं
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अत्यंत संवेदनशील और जटिल आपराधिक मामले में अहम हस्तक्षेप करते हुए हत्या के आरोप में ट्रायल कोर्ट द्वारा महिला अधिकारी के खिलाफ तय किए गए आरोपों को निरस्त कर दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले में आरोप तय करने की ट्रायल कोर्ट की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि किसी भी अभियुक्त के खिलाफ गंभीर अपराधों में आरोप तय करना केवल औपचारिकता नहीं हो सकती, बल्कि इसके लिए न्यायिक विवेक और स्वतंत्र सोच का प्रयोग अनिवार्य है।
9 असफल होने के बाद परीक्षा के नियम और शर्तो को चुनौती नहीं दे सकते
APO भर्ती परीक्षा–2024 के विवाद मामले में राजस्थान हाईकोर्ट में जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने फैसला सुनाते हुए RPSC की मूल्यांकन प्रक्रिया को सही ठहराया। हाईकोर्ट ने कहा कि मुख्य परीक्षा के मूल्यांकन में कोई मनमानी, पक्षपात या असंवैधानिकता नहीं पाई गई।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि जो अभ्यर्थी नियमों और शर्तों को स्वीकार कर परीक्षा में शामिल होते हैं, वे असफल होने के बाद उसी प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकते।
10 एक ही हादसे के पीड़ितो को दो कानूनों के तहत नहीं मिलेगा मुआवजा
राजस्थान हाईकोर्ट ने मुआवजा कानून से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि एक ही सड़क दुर्घटना या घटना के लिए पीड़ित या आश्रित दो अलग-अलग कानूनों के तहत मुआवजा नहीं ले सकते।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मुआवजा प्राप्त कर लिया है, तो वह उसके बाद वर्कमैन कम्पनसेशन एक्ट, 1923 के तहत अलग से दावा नहीं कर सकता।
11 “वेरी गुड” और “आउटस्टैंडिंग” ACR वाले अधिकारियों को पुराने दंड के आधार पर ‘अप्रभावी’ नहीं ठहराया जा सकता
राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग में अनिवार्य सेवानिवृत्ति के अधिकारों और उसकी सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि उत्कृष्ट और लगातार “वेरी गुड” व “आउटस्टैंडिंग” सेवा रिकॉर्ड वाले अधिकारी को केवल पुराने और मामूली दंडों के आधार पर “अप्रभावी” बताकर सेवा से बाहर नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति दंड नहीं है, लेकिन इसका प्रयोग अत्यंत सावधानी, निष्पक्षता और सार्वजनिक हित में ही किया जाना चाहिए।
12 विकलांगता 20% या उससे अधिक है, तो सैनिक को 50% विकलांगता मानकर पेंशन दी जाएगी
राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल फैसले में स्पष्ट किया है कि सेना में सेवा के दौरान लगी चोट या बीमारी के कारण डिस्चार्ज किए गए सैनिकों को विकलांगता पेंशन में “राउंडिंग ऑफ” (Broad Banding) का लाभ मिलना उनका वैधानिक अधिकार है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई सैनिक सेवा के दौरान लगी चोट या बीमारी के कारण डिस्चार्ज होता है और उसकी विकलांगता 20% या उससे अधिक है, तो उसे 50% मानकर पेंशन दी जाएगी।
13 डाटा बेच रही कंपनियों के खिलाफ हो प्रभावी कार्रवाई
राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने एक बड़े और संगठित साइबर फ्रॉड मामले में दो आरोपियों की दूसरी जमानत याचिकाएं खारिज करते हुए डिजिटल स्कैम को साइबर अपराधों का देश के लिए बेहद घातक रूप बताया है।
जस्टिस अनूप कुमार धंध की एकलपीठ ने आरबीआई, केंद्र सरकार और राज्य सरकार को निर्देश देते हुए कहा कि डाटा बेच रही कंपनियों के खिलाफ भी प्रभावी कार्रवाई हो.