जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने साक्ष्य कानून और निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया हैं कि किसी गवाह से क्रॉस एक्जामिनेशन के दौरान केवल दस्तावेज़ का हस्ताक्षर वाला हिस्सा दिखाकर शेष सामग्री को छिपाना सामान्यतःस्वीकार नहीं किया जा सकता.
राजस्थान हाईकोर्ट ने इसे इसे भ्रामक, छलपूर्ण और न्यायिक प्रक्रिया के मूल सिद्धांतों के विपरीत मानते हुए तथाकथित “पिजन होल थ्योरी” अथवा “विंडो मेथड” के उपयोग कि स्पष्ट सीमा निर्धारित की हैं.
जस्टिस संजीत पुरोहित ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट राजेश कुमार की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए हैं.
क्या है पूरा मामला
मामला पाली जिला स्थित “मरुधर होटल” नामक संपत्ति के विवाद से जुड़ा है।
याचिकाकर्ता राजेश कुमार ने पाली सिविल न्यायालय में वाद दायर कर यह दावा किया था कि यह संपत्ति संयुक्त हिंदू परिवार की है।
याचिकाकर्ता ने संपत्ति के संबंध में घोषणा, बंटवारा और निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) की मांग करते हुए दावा किया कि उसके पिता स्वर्गीय हीरालाल ने परिवार के संयुक्त व्यवसाय से अर्जित धन से यह संपत्ति खरीदी थी, इसलिए सभी उत्तराधिकारी इसमें हिस्सेदार हैं।
दूसरी ओर, प्रतिवादी पक्ष ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि 23 जून 1988 को हुई कथित पारिवारिक सुलह जाली है और मरुधर होटल किसी भी तरह से संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति नहीं है।
इसी विवाद के केंद्र में दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता और उन पर किए गए हस्ताक्षरों का प्रश्न खड़ा हुआ।
क्रॉस एक्जामिनेशन के दौरान उठा विवाद
मुकदमे की सुनवाई के दौरान जब प्रतिवादी के गवाह से जिरह चल रही थी, तब वादी की ओर से भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 138 और 145 के तहत एक आवेदन प्रस्तुत किया गया।
इस आवेदन में मांग की गई कि गवाह को दस्तावेज़ की पूरी सामग्री दिखाए बिना, केवल हस्ताक्षर वाला हिस्सा दिखाकर उससे हस्ताक्षर की पहचान कराई जाए।
वादी पक्ष ने इस तरीके को “पिजन होल थ्योरी” या “विंडो मेथड” बताते हुए इसे कानूनी और स्वीकार्य बताया।
ट्रायल कोर्ट ने किया खारिज
हालांकि, अपर जिला न्यायाधीश, पाली की अदालत ने 17 सितंबर 2025 को इस आवेदन को खारिज कर दिया।
ट्रायल कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि जब किसी गवाह को दस्तावेज़ दिखाया जाता है, तो पूरा दस्तावेज़ दिखाना आवश्यक है। केवल हस्ताक्षर दिखाकर शेष सामग्री छिपाना विधिसम्मत नहीं है।
इसके बाद वादी ने इसी प्रकृति का एक और आवेदन दायर किया, जिसे 14 नवंबर 2025 को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि यह पूर्व आदेश की पुनरावृत्ति है और कानून में इसकी अनुमति नहीं है।
अदालत ने यह भी पाया कि बार-बार ऐसे आवेदन देकर मुकदमे में अनावश्यक देरी की जा रही है, इसलिए गवाह की जिरह का अधिकार भी बंद कर दिया गया।
हाईकोर्ट में चुनौती
इन दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता राजेश कुमार ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता तर्क दिया गया कि साक्ष्य अधिनियम की धाराएं 138 और 145 इस प्रकार की जिरह की अनुमति देती हैं।
वादी पक्ष ने यह भी दलील दी कि “पिजन होल थ्योरी” का उपयोग गवाह की सच्चाई परखने के लिए किया जाता है और इसे पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता।
प्रतिवादी पक्ष की दलीलें
आनंदकुमार व अन्य प्रतिवादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता राजेश परिहार ने मामले में याचिकाकर्ता की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि यह तरीका गवाह को भ्रमित करने और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का माध्यम बन सकता है।
प्रतिवादी पक्ष ने मद्रास हाईकोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी जिरह को “चालाक” और “छलपूर्ण” माना गया है।
हाईकोर्ट का आदेश
दोनो पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस संजीत पुरोहित ने अपने विस्तृत और तर्कपूर्ण फैसले में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धाराओं 138, 145, 45, 47, 67 और 73 का की जांच के बाद कहा कि कहा कि इन धाराओं में कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि गवाह को केवल हस्ताक्षर दिखाकर शेष दस्तावेज़ छिपाया जाए।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि “पिजन होल थ्योरी” कोई वैधानिक नियम नहीं है, बल्कि कुछ सीमित परिस्थितियों में विकसित हुई एक पद्धति है। इसका उपयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जा सकता है, जहां गवाह वस्तुतः हस्तलेखन या हस्ताक्षर का विशेषज्ञ हो, या वह स्वयं विशेषज्ञ की तरह बयान दे रहा हो।
वर्तमान मामले में क्यों नहीं लागू हुई थ्योरी
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद गवाह के बयान का हवाला देते हुए कहा कि प्रतिवादी का गवाह कोई हस्तलेखन विशेषज्ञ नहीं था। स्वयं गवाह ने यह स्वीकार किया था कि यदि पूरा दस्तावेज़ न दिखाया जाए, तो वह अपने ही हस्ताक्षर पहचानने में असमर्थ है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे में केवल हस्ताक्षर दिखाकर उससे अन्य हस्ताक्षरों की पहचान कराने की अनुमति देना न्यायसंगत नहीं हो सकता।
हाईकोर्ट ने माना कि इस तरह की जिरह एक सच्चे गवाह को भी भ्रमित कर सकती है और उसके बयान की विश्वसनीयता पर अनुचित संदेह पैदा कर सकती है।
प्रक्रिया के दुरुपयोग पर सख्त टिप्पणी
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में इस तथ्य पर भी गंभीर चिंता जताई कि मूल वाद पिछले 20 वर्षों से लंबित है। मुद्दे वर्ष 2006 में तय हो चुके थे, लेकिन अब तक मुकदमा अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सका।
कोर्ट ने कहा कि एक ही गवाह की जिरह 11 अलग-अलग तारीखों में 62 पृष्ठों तक चली, जिसे अदालत ने असामान्य और अनावश्यक देरी का उदाहरण बताया।
कोर्ट ने कहा कि बार-बार समान प्रकृति के आवेदन दायर करना प्रक्रिया का दुरुपयोग है। ऐसे मामलों में “रेस जुडीकाटा” का सिद्धांत लागू होता है, जिसके तहत एक बार तय हो चुके मुद्दे को दोबारा उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अनुच्छेद 227 के तहत सीमित हस्तक्षेप
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत उसका पर्यवेक्षणीय अधिकार सीमित है। इस अधिकार का प्रयोग तभी किया जा सकता है, जब निचली अदालत के आदेश में स्पष्ट अवैधता, गंभीर त्रुटि या अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने जैसी स्थिति हो।
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान मामले में ट्रायल कोर्ट के आदेशों में ऐसी कोई खामी नहीं पाई गई।