जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ में जस्टिस अनिल कुमार उपमन की अदालत ने एक ऐतिहासिक और रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए POCSO के तहत दर्ज एफआईआर को न केवल रद्द किया, बल्कि FIR और उसके आधार पर चल रही समस्त आपराधिक कानूनी कार्यवाही और सेशन ट्रायल को भी रद्द (Quash) कर दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के साथ ही तीन अहम फैसलों का हवाला दिया है।
जिसमें Dilawar Kurane v. State of Maharashtra, Varadarajan v. State of Madras और State of Uttar Pradesh v. Anrudh (SC, 2026) शामिल हैं।
इन फैसलों के आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि चार्ज फ्रेमिंग के स्तर पर भी अदालत को सामग्री की गंभीर जाँच करनी चाहिए।
कहाँ दर्ज है एफआईआर
याचिकाकर्ता लगभग 19 वर्ष युवक के विरुद्ध जिला जयपुर ग्रामीण थाना में BNS, 2023 की धारा 137(2) तथा POCSO Act, 2012 की धारा 5(l)/6 सहित अन्य धाराओं में FIR दर्ज की गई थी।
आरोप यह था कि याचिकाकर्ता ने न केवल नाबालिग पीड़िता को जबरन अपने साथ घर से लेकर गया, बल्कि उसके साथ यौन अपराध किया है।
पुलिस ने जाँच के पश्चात चार्जशीट पेश की और ट्रायल कोर्ट ने आरोप भी तय कर दिए। इन्हीं आदेशों को याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।
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याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता युवक की ओर से अधिवक्ता प्रखर गुप्ता ने कई महत्वपूर्ण दलीलें देते हुए कहा कि—
• पीड़िता ने किसी भी स्तर (धारा 180, 183 BNSS व न्यायालयीन बयान) में याचिकाकर्ता के विरुद्ध यौन शोषण या जबरदस्ती का आरोप नहीं लगाया।
• पीड़िता ने स्पष्ट कहा कि वह स्वेच्छा से याचिकाकर्ता के साथ गई थी।
• मेडिकल रिपोर्ट में भी यौन उत्पीड़न का कोई प्रमाण नहीं मिला।
• POCSO की गंभीर धाराओं को यांत्रिक (mechanical) रूप से लगाया गया है।
• यह मामला सहमति आधारित संबंध (consensual relationship) का है, न कि यौन अपराध का।
पीड़िता ने खुद नकारा यौन शोषण, फिर भी लगा POCSO!
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध पीड़िता के धारा 180, 183 BNSS और अदालत में दिए गए बयानों का गहन परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि—
- पीड़िता ने किसी भी स्तर पर जबरन यौन संबंध या शोषण का आरोप नहीं लगाया
- उसने स्वीकार किया कि वह अपनी इच्छा से याचिकाकर्ता के साथ गई
- मेडिकल रिपोर्ट में भी यौन शोषण का कोई प्रमाण नहीं मिला
इसके बावजूद पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल करना और ट्रायल कोर्ट द्वारा गंभीर धाराओं में आरोप तय करना न्यायालय को “अविवेकपूर्ण और चिंताजनक” प्रतीत हुआ।
अपहरण नहीं, स्वैच्छिक साथ जाना था
अपहरण के आरोपों पर भी हाईकोर्ट ने स्पष्ट रुख अपनाया। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि—
- यदि कोई नाबालिग, जो अपने कार्यों के परिणाम समझने में सक्षम है,
- स्वयं अपनी इच्छा से घर छोड़ती है,
तो इसे “अपहरण” नहीं कहा जा सकता। इस मामले में “taking” या “enticing” का तत्व पूरी तरह अनुपस्थित
राज्य सरकार और परिवादी पक्ष
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और परिवादी पक्ष की ओर से मुख्य रूप से कई दलीलें दी गईं।
• राज्य ने स्वीकार किया कि पीड़िता के बयानों में यौन अपराध का आरोप नहीं है।
• पीड़िता एवं उसके भाई (परिवादी) ने भी कार्यवाही रद्द करने पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले की मुख्य बातें
जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने इस फैसले में खासतौर से पीड़िता के बयानों को मुख्य आधार माना और कहा कि जब पीड़िता लगातार इस बात से इनकार कर रही है कि उसके साथ कोई यौन अपराध नहीं हुआ है, तो फिर अदालत कैसे उस पर गंभीर आरोप तय कर सकती है।
हाईकोर्ट के मुख्य बिंदु
- POCSO Act की धारा 5/6 (Aggravated Penetrative Sexual Assault) जैसे गंभीर आरोप लगाने के लिए prima facie ठोस सामग्री आवश्यक है, जो यहाँ पूरी तरह अनुपस्थित है।
- पीड़िता लगभग 17 वर्ष की, शिक्षित (B.Sc. छात्रा) थी और अपने कार्यों के परिणाम समझने में सक्षम थी।
- रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि यह मामला अपहरण या यौन शोषण का नहीं, बल्कि स्वैच्छिक संबंध का है।
- ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोप तय करते समय न्यायिक विवेक का प्रयोग नहीं किया गया।
- POCSO कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से बचाना है, सहमति से बने किशोर संबंधों को अपराध बनाना नहीं।
- ऐसे मामलों में कानून का कठोर प्रयोग न्याय का दुरुपयोग बन जाता है।
अंतिम आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद हस्तक्षेप करते हुए फैसले में माना कि—
• FIR और उसके आधार पर चल रही समस्त कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
• इसलिए, धारा 528 BNSS (समकक्ष धारा 482 CrPC) के तहत हस्तक्षेप किया जा सकता है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता आर्यन के खिलाफ दर्ज एफआईआर तथा उससे उत्पन्न सभी आपराधिक कार्यवाहियाँ और सेशन ट्रायल को रद्द (Quash) कर दिया।