टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

राज्य में 2 साल में क्यों नहीं बदली गई BSR, प्राइस वेरिएशन क्लॉज कैसे हटाए गए, हाईकोर्ट ने सरकार को नोटिस जारी कर मांगा जवाब

Why Was BSR Not Revised for Two Years? Rajasthan High Court Issues Notice to State Government

जनहित याचिका पर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा संज्ञान, जल जीवन मिशन और अमृत 2.0 के टेंडरों पर उठे गंभीर सवाल

जयपुर। राजस्थान में सार्वजनिक निर्माण कार्यों की दरें तय करने वाली बेसिक शेड्यूल ऑफ रेट्स (BSR) को लगातार दो वर्षों तक अपडेट न करने और नई निविदाओं (टेंडर) से प्राइस वेरिएशन क्लॉज हटाए जाने के मुद्दे पर राजस्थान हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए कई सवाल किए हैं, जिनके जवाब में जिम्मेदार अधिकारी का हलफनामा पेश करने का आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए सरकार से पूछा है कि पिछले दो वर्षों से बीएसआर में संशोधन क्यों नहीं किया गया?

इसके साथ ही वर्तमान बाजार दरों की तुलना में पुराने बीएसआर को लागू रखने का औचित्य क्या है? और क्या नियमों के तहत प्राइस वेरिएशन क्लॉज हटाने की अनुमति ली गई थी?

कोर्ट ने आदेश दिया कि राज्य सरकार जिम्मेदार अधिकारी के माध्यम से हलफनामा दाखिल करे, जिसमें इन सभी सवालों के स्पष्ट जवाब हों। साथ ही मामले की अगली सुनवाई 19 फरवरी 2026 को तय की गई है।

हाईकोर्ट का अंतरिम आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार को नोटिस जारी किया।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से स्पष्ट रूप से पूछा कि पिछले दो वर्षों से बीएसआर में संशोधन क्यों नहीं किया गया?

कोर्ट ने आदेश दिया कि राज्य सरकार जिम्मेदार अधिकारी के माध्यम से हलफनामा दाखिल करे, जिसमें इन सभी सवालों के स्पष्ट जवाब हों। साथ ही मामले की अगली सुनवाई 19 फरवरी 2026 को तय की गई है।

जनहित याचिका में मुद्दा

यह जनहित याचिका अधिवक्ता महेन्द्र शांडिल्य के जरिए जयपुर जिले के एक सिविल वर्क कॉन्ट्रैक्टर ओमप्रकाश मीणा द्वारा दायर की गई है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं अभियांत्रिकी विभाग (PHED) सहित संबंधित विभागों ने राजस्थान पब्लिक वर्क्स फाइनेंस एंड अकाउंट्स रूल्स के स्पष्ट प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए न तो समय पर बीएसआर जारी किया और न ही वित्त विभाग से अनुमति लेकर टेंडरों की शर्तों में बदलाव किया।

ये है पूरा मामला

याचिका में बताया गया है कि राजस्थान में सार्वजनिक निर्माण कार्यों—विशेषकर जल जीवन मिशन और अमृत 2.0 जैसी बड़ी योजनाओं—के लिए निविदाएं जारी करते समय बीएसआर को आधार माना जाता है।

नियमों के अनुसार, हर वर्ष बीएसआर का पुनरीक्षण आवश्यक है ताकि बाजार में श्रम और सामग्री की वास्तविक दरों को प्रतिबिंबित किया जा सके।

लेकिन वर्ष 2023-24 के बाद प्रदेश में नया बीएसआर जारी नहीं किया गया, जबकि बाजार दरों में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।

इसके बावजूद विभाग पुराने बीएसआर के आधार पर टेंडर प्रक्रिया जारी रखे हुए हैं। याचिका में कहा गया है कि यह स्थिति न केवल नियमों के विरुद्ध है, बल्कि इससे राज्य के खजाने को भारी नुकसान होने की आशंका है।

प्राइस वेरिएशन क्लॉज हटाने पर आपत्ति

अधिवक्ता महेन्द्र शांडिल्य ने याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए गंभीर आरोप लगाया कि कई ताज़ा टेंडरों में प्राइस वेरिएशन क्लॉज को पूरी तरह हटा दिया गया है।

यह क्लॉज सामान्यतः ठेकेदारों को सामग्री और श्रम की कीमतों में उतार-चढ़ाव के अनुसार भुगतान में संशोधन का अधिकार देता है।

याचिका के अनुसार, नियम 322 और 331 के तहत यह क्लॉज मानक शर्त है और इसे बिना वित्त विभाग की पूर्व अनुमति हटाया नहीं जा सकता।

इसके बावजूद विभागीय अधिकारियों ने अपने स्तर पर यह बदलाव कर दिया, जिससे पारदर्शिता और नियमबद्धता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

याचिका में लगाए गए गंभीर आरोप

जनहित याचिका में कहा गया है कि बीएसआर का हर साल जारी होना अनिवार्य है, लेकिन इसे जानबूझकर रोका गया। दो वर्ष पुराने दरों पर टेंडर जारी कर वास्तविक बाजार स्थिति को नजरअंदाज किया जा रहा है।

याचिका में कहा गया है कि प्राइस वेरिएशन क्लॉज हटाकर ठेकेदारों को अनुचित लाभ और राज्य को नुकसान की स्थिति में डाला जा रहा है।

यह पूरी प्रक्रिया राजस्थान पब्लिक वर्क्स फाइनेंस एंड अकाउंट्स रूल्स और राज्य की घोषित नीति के विपरीत है।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट से मांग की है कि सरकार को हर वर्ष बीएसआर जारी करने के निर्देश दिए जाएं और अवैध रूप से हटाए गए प्राइस वेरिएशन क्लॉज को बहाल किया जाए।

सबसे अधिक लोकप्रिय