राज्य या राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग द्वारा जमानत खारिज होने के बाद सेशंस कोर्ट/हाईकोर्ट को जमानत का अधिकार बरकरार
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत दर्ज आपराधिक मामलों में जमानत प्रक्रिया को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि जिला, राज्य या राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग द्वारा किसी आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी जाती है, तो वह व्यक्ति भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत संबंधित सेशंस कोर्ट अथवा हाईकोर्ट में जमानत के लिए आवेदन करने का पूरा अधिकार रखता है।
जस्टिस अनिल कुमार उपमन की एकलपीठ ने यह कानूनी व्यवस्था याचिकाकर्ता संजय सक्सेना की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दी है।
मामले में याचिकाकर्ता संजय सक्सेना को उपभोक्ता आयोग द्वारा जमानत खारिज किए जाने के बाद से न्यायिक हिरासत में रखा गया था।
राजस्थान हाईकोर्ट ने न केवल संजय सक्सेना की जमानत मंजूर की, बल्कि कानून की व्याख्या करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम में जमानत से संबंधित प्रक्रिया को लेकर एक “प्रक्रियात्मक शून्य” (procedural vacuum) मौजूद है, जिसे सामान्य आपराधिक कानून के माध्यम से भरा जाना आवश्यक है।
मामला क्या था
मामले के अनुसार, वर्ष 2019 में प्रतिभा श्रीवास्तव और गौरव श्रीवास्तव ने राजस्थान राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग, जयपुर के समक्ष सहारा प्राइम सिटी लिमिटेड और अन्य के खिलाफ उपभोक्ता शिकायत दर्ज कराई थी। इस शिकायत में आरोप था कि उन्हें भूखंड/निवेश के बदले निर्धारित राशि और लाभ नहीं दिया गया।
16 अगस्त 2021 को उपभोक्ता आयोग ने शिकायत स्वीकार करते हुए कंपनी और संबंधित पक्षों को लगभग 66 लाख रुपये की राशि 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित लौटाने तथा 2.50 लाख रुपये क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया।
जब इस आदेश का पालन नहीं हुआ, तो शिकायतकर्ताओं ने आयोग के समक्ष अवमानना/दंडात्मक कार्यवाही के तहत आवेदन प्रस्तुत किया।
इस कार्यवाही में संजय सक्सेना, जो सहारा समूह से जुड़े अधिकारी बताए गए, को भी आरोपी बनाया गया।
आयोग के समक्ष उपस्थित न होने पर गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया और पेश होने पर उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
जमानत खारिज और कानूनी उलझन
आरोपी संजय सक्सेना ने उपभोक्ता आयोग के समक्ष जमानत के लिए आवेदन किया, जिसे 5 अगस्त 2025 को खारिज कर दिया गया।
इसके बाद दूसरी जमानत याचिका भी 4 सितंबर 2025 को यह कहते हुए खारिज कर दी गई कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 72 के तहत अपराध गैर-जमानती है।
इसके बाद आरोपी ने सीधे राजस्थान हाईकोर्ट में BNSS की धारा 483 (पूर्व में CrPC की धारा 439) के तहत जमानत याचिका दायर की।
हालांकि कोर्ट रजिस्ट्री ने प्रारंभिक आपत्ति उठाई कि क्या उपभोक्ता आयोग के आदेश के खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की जा सकती है।
हाईकोर्ट का अहम फैसला
जस्टिस अनिल कुमार उपमन ने इस मुद्दे पर वरिष्ठ अधिवक्ताओं की सहायता से विस्तृत सुनवाई की। कोर्ट ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 72 और 73 का विश्लेषण करते हुए महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले।
कोर्ट ने कहा कि:
धारा 72 के तहत जब उपभोक्ता आयोग किसी व्यक्ति के खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही करता है, तो वह प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (Judicial Magistrate First Class) के समान अधिकारों का प्रयोग करता है।
धारा 73 केवल सजा/दोषसिद्धि के बाद अपील का प्रावधान करती है, न कि जमानत खारिज जैसे अंतरिम आदेशों के खिलाफ।
अधिनियम में यह नहीं बताया गया है कि यदि उपभोक्ता आयोग जमानत खारिज कर दे, तो आगे कौन सा मंच उपलब्ध होगा।
हाईकोर्ट ने इसे एक गंभीर कानूनी शून्य मानते हुए कहा कि यदि इस स्थिति में आरोपी को किसी हाईकोर्ट या सेशंस कोर्ट में जाने का अधिकार नहीं दिया जाए, तो यह अनिश्चितकालीन हिरासत जैसी स्थिति पैदा कर सकता है, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मूल अधिकार के विरुद्ध है।
जमानत “अपील” नहीं,वैधानिक अधिकार
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत याचिका को अपील नहीं माना जा सकता। जमानत व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा विषय है और इसे केवल इस आधार पर रोका नहीं जा सकता कि अधिनियम में अपील का प्रावधान सीमित है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जहां विशेष कानून (Consumer Protection Act) मौन है, वहां सामान्य आपराधिक कानून (BNSS/CrPC) लागू होगा।
इस कारण से, उपभोक्ता आयोग द्वारा जमानत खारिज किए जाने के बाद आरोपी को सेशंस कोर्ट या हाईकोर्ट में जमानत के लिए जाने का अधिकार होगा।
हाईकोर्ट ने दी जमानत
मामले में लंबी सुनवाई के बाद राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने पाया कि आरोपी के खिलाफ अधिकतम सजा तीन वर्ष तक की है।
वह पहले ही पांच महीने से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में था और उसे पुनः सेशंस कोर्ट भेजना न्यायसंगत नहीं होगा।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने अपनी समवर्ती अधिकारिता (Concurrent Jurisdiction) का प्रयोग करते हुए संजय सक्सेना को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया और ट्रायल कोर्ट को उचित शर्तें तय करने के आदेश दिए।