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राज्य सरकार को हाईकोर्ट से बड़ा झटका, अलवर के 3 खनिज ब्लॉकों की नीलामी रद्द

Rajasthan High Court Scraps Alwar Mineral Block Auctions, Says State Is Trustee of Natural Resources

30 करोड़ से अधिक बोली पर 25% बिड सिक्योरिटी की शर्त असंवैधानिक घोषित, हाईकोर्ट ने कहा -राज्य प्राकृतिक संसाधनों का मालिक नहीं, बल्कि जनता का ट्रस्टी है

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने प्रदेश में माइंस नीलामी को लेकर सरकार द्वारा बनाई गई शर्तों में से 30 करोड़ से अधिक बोली पर 25% बिड सिक्योरिटी की शर्त को असंवैधानिक बताया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा नीलामी की शर्तों को लेकर लाए गए नियम संशोधन पर गंभीर संवैधानिक आपत्तियाँ दर्ज करते हुए अलवर जिले के तीन खनिज ब्लॉकों 4/2023, 6/2023 और 8/2023 की हो चुकी नीलामी को रद्द कर दिया है।

हाईकोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई नियम अस्पष्ट, अव्यावहारिक और प्रतिस्पर्धा को बाधित करने वाला है, तो वह न केवल अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) बल्कि लोक-विश्वास सिद्धांत (Public Trust Doctrine) का भी उल्लंघन करता है।

यह रिपोर्टेबल जजमेंट कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने अनहद मिनेरारियो प्राइवेट लिमिटेड बनाम राजस्थान राज्य व अन्य मामले में दिया गया, जिसमें मार्च 2025 में अलवर जिले के तीन खनिज ब्लॉकों की ई-नीलामी को चुनौती दी गई थी।

तीनों खनिज ब्लॉकों की एक ही दर

अनहद मिनेरारियो प्राइवेट लिमिटेड की ओर से दायर की गई याचिका में कहा गया कि राज्य सरकार ने 1 मार्च 2025 को अधिसूचना जारी कर राजस्थान के विभिन्न जिलों में स्थित 67 लघु खनिज ब्लॉकों की ई-नीलामी की घोषणा की थी।

इनमें अलवर जिले के प्लॉट संख्या 4/2023, 6/2023 और 8/2023 शामिल थे, जिन्हें 50 वर्षों की अवधि के लिए आवंटित किया जाना था।

सरकार द्वारा की गई नीलामी में तीनों ब्लॉक एक ही कंपनी को मिले और तीनों की नीलामी की दर भी एक समान ₹29.99 करोड़, ₹29.99 करोड़ और ₹29.99 करोड़ पर समाप्त हुई।

हाईकोर्ट ने इस पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि—

यह संयोग नहीं हो सकता, बल्कि यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि “नियम ने बोली को 30 करोड़ की सीमा पर कृत्रिम रूप से रोक दिया।”

कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि—

“जब सभी बोलीदाता एक ही सीमा पर रुक जाते हैं, तो यह दर्शाता है कि नियम ने प्राकृतिक प्रतिस्पर्धा को बाधित किया है।”

हाईकोर्ट ने कहा कि खनिज संसाधन राज्य की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि “राज्य के पास जनता के ट्रस्टी के रूप में निहित प्राकृतिक संपत्ति हैं।”

इसलिए नीलामी का उद्देश्य केवल प्रक्रिया पूरी करना नहीं, बल्कि अधिकतम राजस्व प्राप्त करना भी है।

कोर्ट ने कहा—

“यदि कोई नियम अधिक बोली को रोकता है और राज्य को संभावित उच्च राजस्व से वंचित करता है, तो वह सार्वजनिक हित के विरुद्ध है।”

लोक-विश्वास सिद्धांत (Public Trust Doctrine) पर स्पष्ट रुख

राजस्थान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2G स्पेक्ट्रम, कोयला ब्लॉक और प्राकृतिक संसाधन आवंटन से जुड़े फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि राज्य प्राकृतिक संसाधनों का मालिक नहीं, बल्कि जनता का ट्रस्टी है। इस ट्रस्टीशिप का अर्थ है निष्पक्षता, पारदर्शिता, समान अवसर और अधिकतम सार्वजनिक लाभ।

क्या है मामला

अलवर जिले के प्लॉट संख्या 4/2023, 6/2023 और 8/2023 के खनिज ब्लॉकों के लिए सरकार ने ई-नीलामी आमंत्रित की थी, जिन्हें 50 वर्षों की अवधि के लिए आवंटित किया जाना था।

नीलामी राजस्थान लघु खनिज रियायत नियम, 2017 (MMCR-2017) के अंतर्गत आयोजित की गई। सामान्य स्थिति में इन प्लॉट्स के लिए ₹25 लाख की बिड सिक्योरिटी निर्धारित थी।

लेकिन 3 जनवरी 2025 को नियम 18(2) में एक नया दूसरा प्रावधान (Second Proviso) जोड़ा गया, जिसके अनुसार यदि बोली राशि 30 करोड़ रुपये से अधिक होती है, तो बोलीदाता को बोली राशि का 25 प्रतिशत बिड सिक्योरिटी के रूप में जमा करना होगा।

नियम मौजूद, लेकिन पालन का कोई रास्ता नहीं

याचिकाकर्ता कंपनी ने अदालत में इस नियम को चुनौती देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता कंपनी ने ई-नीलामी के लिए समय पर पंजीकरण कराया, आवेदन शुल्क और ₹25 लाख की बिड सिक्योरिटी जमा की और बोली प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लिया।

लेकिन जैसे ही उसने ₹30 करोड़ से अधिक की बोली लगाने का प्रयास किया, ई-नीलामी पोर्टल ने बोली स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

कंपनी ने आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा कि नियम तो कहता है कि 30 करोड़ से अधिक बोली पर 25% राशि जमा करनी होगी, लेकिन यह कभी नहीं बताया गया कि यह राशि कब, कैसे और किस चरण पर जमा की जाए।

कंपनी ने अदालत से कहा कि ई-नीलामी के दौरान ऐसा कोई तकनीकी विकल्प उपलब्ध ही नहीं था, इस प्रकार यह नियम “पालन योग्य न होकर एक असंभव शर्त” बन गया।

सरकार का जवाब

राज्य सरकार तथा नीलामी में सफल कंपनी की ओर से अदालत में यह पक्ष रखा गया कि ई-नीलामी प्रक्रिया पूर्णतः पारदर्शी, निष्पक्ष और तकनीकी रूप से स्वचालित थी, जिसमें किसी भी स्तर पर मानवीय हस्तक्षेप नहीं हुआ।

राज्य ने बताया कि नियम 18(2) में 03.01.2025 को जोड़ा गया दूसरा प्रावधान पूरी तरह वैध, संवैधानिक और जनहित में है। इसके तहत 30 करोड़ रुपये से अधिक की बोली लगाने वाले बोलीदाता को 25 प्रतिशत राशि बिड सिक्योरिटी के रूप में जमा करना अनिवार्य था, जो सभी पर समान रूप से लागू होती है।

सरकार ने कहा कि यह शर्त 01.03.2025 के ई-नीलामी विज्ञापन में स्पष्ट थी और बोलीदाताओं को पहले से जानकारी थी।

सरकार ने कहा कि बोलीदाता अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार अग्रिम राशि ई-वॉलेट में जमा कर सकते थे। आवश्यक बिड सिक्योरिटी जमा न होने के कारण याचिकाकर्ता को आगे बोली लगाने से रोका गया।

राज्य ने यह भी स्पष्ट किया कि नियमों को स्वीकार कर भाग लेने के बाद उन्हें चुनौती देना कानूनन अस्वीकार्य है।

नियमों पर हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार द्वारा बाद में बनाए गए नियमों को लेकर कहा कि—

“यदि नियम यह अपेक्षा करता है, तो उसे स्पष्ट रूप से कहना चाहिए था।”

हाईकोर्ट ने कहा कि नियम में ऐसा कोई स्पष्ट निर्देश नहीं था और नीलामी पोर्टल में भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने विस्तृत फैसले में कहा कि—

नियम 18(2) का दूसरा प्रावधान अस्पष्ट, अव्यावहारिक और प्रतिस्पर्धा-विरोधी है, जो अनुच्छेद 14 और लोक-विश्वास सिद्धांत के विपरीत है और इसने ई-नीलामी की निष्पक्षता को प्रभावित किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि—

“प्राकृतिक संसाधनों की नीलामी केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवैधानिक उत्तरदायित्व है।”

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