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जीवन का अधिकार केवल सांस लेने का अधिकार नहीं, बल्कि गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।

Rajasthan High Court Rules Insurance Company Not Liable to Pay Interest in Employee Compensation Case

राजस्थान में वृद्धाश्रमों की स्थिती को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने मांगी विस्तृत रिपोर्ट, कहा सिर्फ कागज़ों में नहीं हो वृद्धाश्रम

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों और वृद्धाश्रमों की वास्तविक स्थिति को लेकर एक ऐतिहासिक और बेहद सख्त रुख अपनाया है।

कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि

वृद्धाश्रमों का अस्तित्व मात्र औपचारिक नहीं हो सकता, बल्कि वहां रहने वाले बुज़ुर्गों को सम्मान, चिकित्सा, सुरक्षा और मानवीय गरिमा के साथ जीवन मिलना ही चाहिए।

लोक उत्थान संस्थान की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस पुष्पेन्द्रसिंह भाटी और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने पूरे राज्य में वृद्धाश्रम व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने संपूर्ण राजस्थान में वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों और वृद्धाश्रमों की वास्तविक स्थिति को लेकर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का आदेश दिया हैं.

कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि वृद्धाश्रमों का अस्तित्व मात्र औपचारिक नहीं हो सकता, बल्कि वहां रहने वाले बुज़ुर्गों को सम्मान, चिकित्सा, सुरक्षा और मानवीय गरिमा के साथ जीवन मिलना ही चाहिए।

यह टिप्पणी लोक उत्थान संस्थान बनाम राज्य सरकार मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसने पूरे राज्य में वृद्धाश्रम व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

“मातृ देवो भव, पितृ देवो भव” केवल श्लोक नहीं

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि भारतीय सभ्यता में बुज़ुर्गों को ईश्वर तुल्य माना गया है। लेकिन बदलते सामाजिक ढांचे, संयुक्त परिवारों के टूटने और शहरीकरण के कारण आज वही बुज़ुर्ग असहाय और उपेक्षित होते जा रहे हैं।

कोर्ट ने कहा—

वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल अब केवल पारिवारिक नैतिकता नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है।”

गरिमा के साथ जीने का अधिकार

हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि जीवन का अधिकार सिर्फ सांस लेने तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और आत्मसम्मान के साथ जीवन भी इसमें शामिल है।

साथ ही नीति निर्देशक तत्वों की ओर इशारा करते हुए कोर्ट ने दो टूक कहा अनुच्छेद 41: वृद्धावस्था में सहायता राज्य का दायित्व, अनुच्छेद 46: कमजोर वर्गों का संरक्षण, अनुच्छेद 47: जनस्वास्थ्य की जिम्मेदारी इन सभी को मिलाकर वरिष्ठ नागरिकों का कल्याण संवैधानिक दायित्व बनता है।

देश में बुज़ुर्गों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही, सिस्टम तैयार नहीं

कोर्ट ने देश की जनसांख्यिकी स्थिति को “खतरे की घंटी” बताया। हाईकोर्ट ने कहा कि 2022 में बुज़ुर्ग आबादी लगभग 10.5% जो 2050 तक यह बढ़कर 20% से अधिक हो सकती है.

कोर्ट ने कहा कि देश में 2046 तक बुज़ुर्गों की संख्या बच्चों से भी ज़्यादा होगी.

कोर्ट ने चेताया कि अगर अभी से ठोस व्यवस्था नहीं की गई, तो भविष्य में स्थिति सामाजिक संकट का रूप ले सकती है।

राजस्थान में 31 वृद्धाश्रम, लेकिन हालात क्या हैं?

राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि राजस्थान में फिलहाल 31 वृद्धाश्रम संचालित हो रहे हैं।
लेकिन यहीं से कोर्ट का तेवर सख्त हो गया। कोर्ट ने साफ कहा— “सिर्फ वृद्धाश्रम होना काफी नहीं है, यह देखा जाना ज़रूरी है कि वहां बुज़ुर्ग कैसे जी रहे हैं।”

ज़मीनी रिपोर्ट पेश करें

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (RSLSA) और जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को सीधे मैदान में उतरने का आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने 15 फरवरी 2026 तक राज्यभर के वृद्धाश्रम पर अलग-अलग रिपोर्ट पेश करने के आदेश दिए है। जिनमे वृद्धाश्रम की बिल्डिंग सरकार की है या नहीं, वहां रहने वाले लोग वास्तव में वरिष्ठ नागरिक हैं या नहीं, चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं या सिर्फ नाम की, सरकार से आर्थिक सहायता मिल रही है या नहीं, भोजन, स्वच्छता, सुरक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं की स्थिति की संपूर्ण रिपोर्ट पेश करनी होगी.

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला

राजस्थान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 एक लाभकारी कानून है और इसकी व्याख्या तकनीकी नहीं, मानवीय दृष्टि से होनी चाहिए।

कोर्ट ने दोहराया—

“कानून किताबों में नहीं, ज़मीन पर दिखना चाहिए।” “जीवन का अधिकार केवल सांस लेने का अधिकार नहीं, बल्कि गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।”

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