वकील पिता के पक्ष में न्यायिक अधिकारी ने की थी सिफारिश, फुल कोर्ट ने रोकी थी न्यायिक अधिकारी की तीन वार्षिक वेतनवृद्धियाँ
जयपुर। न्यायपालिका की गरिमा, ईमानदारी और नैतिकता को लेकर Rajasthan High Court ने एक बार फिर बेहद कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि न्यायिक सेवा किसी साधारण रोजगार के अर्थ में सेवा नहीं है, बल्कि यह राज्य की संप्रभु न्यायिक शक्ति के प्रयोग से जुड़ा एक पवित्र दायित्व है, जिसमें किसी भी प्रकार के समझौते की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले की शुरुआत Supreme Court of India के ऐतिहासिक निर्णयों और टिप्पणियों का हवाला देते हुए की।
कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि न्यायाधीश न केवल कानून का पालन कराने वाला अधिकारी है, बल्कि वह संपूर्ण न्याय व्यवस्था का स्तंभ होता है। ऐसे में उसकी ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और नैतिक चरित्र संदेह से परे होना चाहिए और यह उसके सार्वजनिक व निजी जीवन-दोनों में परिलक्षित होना चाहिए।
ये महत्वपूर्ण टिप्पणीयां जस्टिस इंदरजीत सिंह और जस्टिस रवि चिरानिया की खंडपीठ ने न्यायिक अधिकारी गोविंद अग्रवाल की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए की हैं.
न्यायाधीश का पद = सार्वजनिक विश्वास
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को उद्धृत करते हुए कहा कि “एक न्यायाधीश सार्वजनिक विश्वास के पद पर कार्य करता है। निष्कलंक ईमानदारी, अडिग स्वतंत्रता और मूल्यों से परिपूर्ण नैतिक चरित्र ऐसे अनिवार्य तत्व हैं, जिनमें किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं है।”
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि जनता को यह अधिकार है कि वह न्यायिक कार्य करने वाले व्यक्ति से लगभग निर्दोष आचरण की अपेक्षा करे। न्यायाधीशों को अपने व्यावसायिक ही नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी उच्चतम नैतिक मानकों पर खरा उतरना चाहिए।
जनता का विश्वास डगमगाना गंभीर अपराध
कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जनता का न्याय प्रणाली पर गहरा विश्वास होता है और जिला न्यायपालिका इसकी मजबूत रीढ़ है। यदि किसी न्यायिक अधिकारी का आचरण ऐसा हो, जिससे आम पक्षकार के मन में न्यायपालिका की छवि धूमिल हो और जनता का विश्वास डगमगाए, तो ऐसे आचरण को न तो अनदेखा किया जा सकता है और न ही उस पर कोई उदारता दिखाई जा सकती है।
न्याय वितरण एक पवित्र कर्तव्य
हाईकोर्ट ने कहा कि न्याय का वितरण केवल एक कठिन प्रशासनिक कार्य नहीं, बल्कि इसे पवित्र कर्तव्य के रूप में देखा जाता है। इसलिए जो नैतिक मानक किसी अन्य सरकारी सेवा में स्वीकार्य हो सकते हैं, वे न्यायिक अधिकारी के लिए पर्याप्त नहीं माने जा सकते।
हाईकोर्ट की सीमा
अनुशासनात्मक कार्यवाही से जुड़े मामलों में न्यायिक पुनरावलोकन की सीमा स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट विभागीय प्राधिकरणों के निर्णयों पर अपील अदालत की तरह कार्य नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक समीक्षा केवल उसी स्थिति में संभव है, जब यह साबित हो कि निर्णय तक पहुंचने की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ हो।
याचिकाकर्ता को राहत से इनकार
हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से माना कि संबंधित याचिकाकर्ता के मामले में एक न्यायिक अधिकारी से अपेक्षित निष्कलंक ईमानदारी और सत्यनिष्ठा का गंभीर अभाव पाया गया है।
इसी आधार पर फुल कोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वह अनुच्छेद 226 के तहत अपनी न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति का प्रयोग करना उपयुक्त नहीं समझता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी द्वारा दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट की फुल कोर्ट द्वारा उनके विरुद्ध पारित तीन वार्षिक वेतनवृद्धि बिना संचयी प्रभाव के रोकने की सजा को चुनौती दी गई थी।
इस मामले में कानूनी प्रश्न केवल वेतनवृद्धि रोके जाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके केंद्र में यह प्रश्न था कि न्यायिक अधिकारी से किस स्तर के नैतिक आचरण और निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है, और यदि उस पर आंच आती है तो न्यायपालिका को किस प्रकार प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
कहां से शुरू हुआ मामला?
विवाद की जड़ वर्ष 2008 में जयपुर की एक अदालत में हुई न्यायिक कार्यवाही से जुड़ी है।
जयपुर में अपर जिला न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट) महेन्द्र शर्मा के समक्ष दो पुराने सिविल वाद लंबित थे, जिनमें से एक में याचिकाकर्ता के पिता स्वयं पक्षकार थे और दोनों मामलों में वे अधिवक्ता के रूप में भी पेश हो रहे थे।
29 नवंबर 2008 को संबंधित अपर जिला न्यायाधीश ने अपने आदेश में याचिकाकर्ता का उल्लेख करते हुए टिप्पणी की कि—
“प्रतिवादी पक्ष की ओर से, उनके पुत्र, जो कि न्यायिक अधिकारी हैं, के माध्यम से अदालत पर प्रभाव डालने का प्रयास किया गया।”
यही टिप्पणी आगे चलकर इस पूरे मामले में विवाद और कार्रवाई का आधार बनी।
आरोप और विभागीय कार्यवाही
जिला अदालत के न्यायिक अधिकारी के आदेश में दर्ज की गई टिप्पणी के आधार पर वर्ष 2010 में याचिकाकर्ता न्यायिक अधिकारी के खिलाफ राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के अंतर्गत चार्जशीट जारी की गई।
चार्जशीट में पारिवारिक हित से जुड़े मामले में संलिप्तता, न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने या प्रभाव डालने का प्रयास, तथा आचरण नियमों के तहत अपेक्षित निष्पक्षता और ईमानदारी के उल्लंघन के मुख्य रूप से तीन आरोप लगाए गए।
चार्जशीट में इन आरोपों को न्यायिक सेवा के मानकों के विरुद्ध गंभीर कदाचार बताया गया।
याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत में लंबी बहस करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता का पूरा सेवा रिकॉर्ड निष्कलंक रहा है और 1996 में नियुक्ति के बाद कभी कोई शिकायत नहीं हुई।
जिस दिन की घटना बताई जा रही है, उस दिन याचिकाकर्ता जयपुर में मौजूद ही नहीं थे, बल्कि अलवर में पदस्थापित थे।
संबंधित अपर जिला न्यायाधीश उनसे वरिष्ठ अधिकारी थे; ऐसे में उनसे संपर्क या प्रभाव डालने का आरोप तर्कहीन है।
आदेश पत्र में याचिकाकर्ता का नाम स्पष्ट रूप से नहीं लिखा गया है और विभागीय जांच में प्रस्तुत किए गए तीन शपथपत्रों पर समुचित विचार नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता ने इसे दुर्भावनापूर्ण कार्यवाही बताते हुए सजा रद्द करने की मांग की।
जांच अधिकारी और फुल कोर्ट का फैसला
मामले में विभागीय जांच राजस्थान हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश द्वारा की गई। जांच में आरोप संख्या 1 (पारिवारिक हित से जुड़े मामले में संलिप्तता) को तथ्यात्मक रूप से सही माना गया।
वहीं आरोप संख्या 2 और 3 को आंशिक रूप से सिद्ध माना गया। इसके बाद जांच रिपोर्ट हाईकोर्ट की फुल कोर्ट के समक्ष रखी गई।
राजस्थान हाईकोर्ट की फुल कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड, रिपोर्ट और परिस्थितियों पर विचार करते हुए यह निर्णय लिया कि याचिकाकर्ता का आचरण न्यायिक मर्यादा के अनुरूप नहीं है और उन्हें दंडित किया जाना आवश्यक है।
फलस्वरूप, तीन वार्षिक वेतनवृद्धि बिना संचयी प्रभाव के रोकने की सजा दी गई।
हाईकोर्ट का फैसला
सभी पक्षों की बहस के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला देते हुए दो टूक कहा—
“न्यायिक सेवा कोई सामान्य सरकारी सेवा नहीं है। न्यायाधीश राज्य की संप्रभु न्यायिक शक्ति का प्रयोग करते हैं। उनकी ईमानदारी और निष्पक्षता संदेह से परे होनी चाहिए।”
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायाधीश का पद Public Trust है और समाज को उनसे सबसे उच्च स्तर के नैतिक आचरण की अपेक्षा होती है।
न्यायिक समीक्षा की सीमाएं
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के तहत अदालत अपील अदालत की तरह साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर सकती।
यदि विभागीय कार्यवाही विधिसम्मत है और प्राकृतिक न्याय का पालन हुआ है, तो न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होता है।
फुल कोर्ट जैसे सामूहिक और संवैधानिक निकाय के निर्णय में अदालत को अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए।
इस मामले में अदालत को न तो प्रक्रिया में कोई गंभीर त्रुटि दिखी और न ही निर्णय मनमाना प्रतीत हुआ।
धारणा भी प्रमाण जितनी ही महत्वपूर्ण
फैसले के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में हाईकोर्ट ने कहा—
“न्यायपालिका में केवल वास्तविक निष्पक्षता ही नहीं, बल्कि निष्पक्षता की धारणा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।”
यदि किसी न्यायिक अधिकारी के आचरण से यह धारणा बनती है कि वह पारिवारिक हितों के मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है, तो यह न्याय व्यवस्था के लिए घातक है—भले ही वह हस्तक्षेप प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध न हो।
याचिका खारिज, सजा बरकरार
राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले में याचिकाकर्ता न्यायिक अधिकारी की रिट याचिका खारिज करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट की फुल कोर्ट द्वारा दी गई सजा को सही ठहराया।
अदालत ने साफ कहा कि यह दंड न तो असंगत है और न ही अत्यधिक।