32 साल पुराने मामले में एससी/एसटी एक्ट में दी गई सजा रद्द, आरोपी बरी
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत दर्ज एक 32 वर्ष पुराने आपराधिक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए आरोपी को बड़ी राहत दी है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अधीनस्थ अदालत की दोषसिद्धि को अवैध ठहराते हुए उसे निरस्त कर दिया और यह स्पष्ट किया कि केवल जातिसूचक शब्दों का आरोप पर्याप्त नहीं है, जब तक अभियोजन यह सिद्ध न करे कि अपमान जानबूझकर और सार्वजनिक रूप से केवल जाति के आधार पर किया गया हो।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह फैसला लालसिंह की ओर से दायर याचिका पर दिया है। हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 1993 का दोषसिद्धि आदेश रद्द कर दिया और आरोपी को बरी कर दिया।
मामला क्या था
जोधपुर जिले की बिलाड़ा तहसील के सोवणिया गांव में 25 जुलाई 1993 को हुई एक घटना से जुड़ा यह मामला है, जिसमें आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता लालसिंह ने शिकायतकर्ता का रास्ता रोककर उसके साथ मारपीट की और कथित रूप से जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया।
मामले में ट्रायल के बाद सत्र न्यायालय, जोधपुर ने 6 दिसंबर 1993 को फैसला देते हुए लालसिंह को दोषी ठहराते हुए छह माह की साधारण कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी।
शिकायतकर्ता का दावा था कि वह अनुसूचित जाति से संबंधित है और आरोपी उच्च जाति से है। पुलिस द्वारा कार्रवाई नहीं होने पर अदालत के आदेश से प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
ट्रायल कोर्ट का फैसला और अपील
जोधपुर की विशेष अदालत ने अभियोजन साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी माना। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर तर्क दिया कि मामला झूठा और मनगढ़ंत है, जिसकी जड़ एक आर्थिक लेन-देन/आटा पिसाई शुल्क को लेकर हुआ विवाद है।
अपीलकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि अभियोजन साक्ष्य आपसी विरोधाभासों से भरे हैं और आवश्यक कानूनी तत्व सिद्ध नहीं होते।
अपीलकर्ता का पक्ष
अपीलकर्ता लाल सिंह की ओर से दायर अपील में कहा गया कि निचली अदालत द्वारा दी गई दोषसिद्धि का आदेश तथ्यों, साक्ष्यों और कानून के विपरीत है।
अपीलकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि यह पूरा मामला झूठा और मनगढ़ंत है, जिसकी उत्पत्ति किसी जातिगत द्वेष से नहीं बल्कि आर्थिक लेन-देन और आटा पिसाई शुल्क को लेकर हुए विवाद से हुई।
अपीलकर्ता पक्ष ने कहा कि शिकायतकर्ता और आरोपी एक ही गांव के निवासी हैं और उनके बीच सामान्य सामाजिक व व्यावसायिक संबंध रहे हैं। ऐसे में यह मानना कि आरोपी ने जानबूझकर केवल जाति के आधार पर सार्वजनिक रूप से अपमान किया, स्वाभाविक नहीं है।
अपीलकर्ता ने कहा कि कथित घटना की तिथि और स्थान को लेकर अभियोजन गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास हैं।
पिछका कुआं और सार्वजनिक कुआं
एक गवाह ने घटना 24 जुलाई को सार्वजनिक कुएं के पास बताई, जबकि अभियोजन कथा 25 जुलाई और “पिछका कुआं” स्थान दर्शाती है।
अपील में कहा गया कि शिकायत में यह नहीं बताया गया कि एक महत्वपूर्ण गवाह घटनास्थल पर मौजूद था, जबकि बाद में उसे प्रत्यक्षदर्शी बताया गया, जो बाद की जोड़-घटाव (embellishment) को दर्शाता है।
अपीलकर्ता पक्ष ने FIR दर्ज करने में लगभग 13 दिन की देरी को भी गंभीर बताया और कहा कि इस देरी का कोई संतोषजनक कारण नहीं दिया गया। इस अंतराल में शिकायतकर्ता को सोच-विचार कर झूठा मामला गढ़ने का अवसर मिला।
अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि अभियोजन का एक गवाह स्पष्ट रूप से कहता है कि उसने कोई झगड़ा नहीं देखा, फिर भी उसे शत्रुतापूर्ण घोषित नहीं किया गया।
जांच अधिकारी स्वयं स्वीकार करता है कि पक्षों के बीच पैसों का विवाद मौजूद था, जो बचाव पक्ष के तर्क को मजबूत करता है।
अधिवक्ता ने दलील दी कि एससी/एसटी एक्ट के तहत दोषसिद्धि के लिए यह सिद्ध करना अनिवार्य है कि अपमान जानबूझकर, सार्वजनिक रूप से और केवल जाति के आधार पर किया गया हो। जब विवाद की जड़ आर्थिक है, तब इस विशेष कानून को लागू करना कानून का दुरुपयोग है। अतः अपील स्वीकार कर आरोपी को बरी किया जाए।
राज्य सरकार और शिकायतकर्ता का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से अपील का विरोध करते हुए तर्क दिया गया कि निचली अदालत ने सभी साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन कर अपीलकर्ता को दोषी ठहराया था और उस निर्णय में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है।
राज्य सरकार ने कहा कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति से संबंधित है और आरोपी उच्च जाति से है। घटना सार्वजनिक स्थान पर हुई, जहां आरोपी ने जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर शिकायतकर्ता को अपमानित किया।
सरकार ने कहा कि यह कृत्य एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के अंतर्गत स्पष्ट रूप से अपराध की श्रेणी में आता है।
राज्य सरकार ने यह भी दलील दी कि ग्रामीण परिवेश में पीड़ित व्यक्ति पहले सामाजिक स्तर पर समाधान की कोशिश करता है। पुलिस द्वारा तत्काल रिपोर्ट दर्ज न करने के कारण शिकायतकर्ता को न्यायालय की शरण लेनी पड़ी, जिससे देरी हुई।
राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि जातिसूचक शब्दों का सार्वजनिक प्रयोग अपने आप में अधिनियम के तहत गंभीर अपराध है। यदि आर्थिक विवाद भी मौजूद था, तब भी जातिगत अपमान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट का फैसला
सभी दलीलों और बहसों को सुनने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन की कहानी में तिथि, स्थान, घटनाक्रम और कारण को लेकर गंभीर विरोधाभास हैं। प्रमुख गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि घटना 25 जुलाई 1993 की बताई गई, जबकि प्राथमिकी 13 दिन बाद 7 अगस्त 1993 को दर्ज हुई। इस अकारण और अस्पष्ट देरी का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण रिकॉर्ड पर नहीं है। ऐसे मामलों में, जहां आरोप मौखिक कथनों पर आधारित हों, देरी अभियोजन के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
हाईकोर्ट ने गवाहों को लेकर कहा कि एक प्रमुख गवाह ने घटना की तिथि और स्थान ही अलग बता दिए—जहां अभियोजन “पिछका कुआं” और 25 जुलाई की बात करता रहा, वहीं गवाह ने “सार्वजनिक कुआं” और 24 जुलाई का उल्लेख किया। यह विरोधाभास मामूली नहीं, बल्कि मामले की जड़ पर प्रहार करने वाला माना गया।
विशेष कानून उद्देश्य
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम एक विशेष कानून है, जिसका उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को जाति-आधारित उत्पीड़न से बचाना है।
लेकिन इस अधिनियम के तहत दोषसिद्धि के लिए यह अनिवार्य है कि अभियोजन यह साबित करे कि कथित अपमान या धमकी जानबूझकर दी गई, वह केवल पीड़ित की जाति के कारण थी और वह सार्वजनिक दृष्टि में की गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि विवाद की उत्पत्ति निजी या आर्थिक कारणों से हुई हो, तो मात्र जातिसूचक शब्दों का आरोप लगना अपने आप में एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध सिद्ध नहीं करता, जब तक कि उपरोक्त तत्व संदेह से परे सिद्ध न हों।
हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया और गंभीर विरोधाभासों को नजरअंदाज कर दिया।
हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 1993 का दोषसिद्धि आदेश रद्द कर दिया और आरोपी को बरी कर दिया।