हाईकोर्ट ने कहा- लाइसेंस प्राप्त पादरी द्वारा जारी प्रमाणपत्र को सिविल रजिस्टर में दर्ज नहीं करना अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है।
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और रिपोर्टेबल फैसले के जरिए भारत में विवाह पंजीकरण की पूरी कानूनी संरचना को स्पष्ट करते हुए ईसाई समुदाय को बड़ी राहत दी है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ईसाई रीति-रिवाजों से संपन्न सभी विवाहों को राज्य के सिविल रजिस्टर में दर्ज करना अनिवार्य है और कोई भी सरकारी अथवा नगर निकाय इससे इनकार नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ईसाई विवाह अधिनियम, 1872 के तहत जारी विवाह प्रमाणपत्रों को सिविल रजिस्टर में दर्ज करना राज्य का वैधानिक दायित्व है, न कि किसी अधिकारी की विवेकाधीन कृपा।
जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने फादर पॉल पी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह रिपोर्टेबल फैसला सुनाया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस फैसले के जरिए वर्षों से चली आ रही ईसाई रीति-रिवाजों से संपन्न सभी विवाहों के प्रति प्रशासनिक अस्पष्टता और अस्वीकार की प्रवृत्ति पर निर्णायक विराम लगा दिया है।
विवाह केवल धार्मिक संस्कार नहीं, बल्कि कानूनी स्थिति
हाईकोर्ट ने फैसले की शुरुआत ही विवाह की संवैधानिक और कानूनी अवधारणा से करते हुए कहा कि—
“विवाह केवल निजी या धार्मिक संबंध नहीं, बल्कि एक वैधानिक स्थिति (legal status) है, जिससे उत्तराधिकार, भरण-पोषण, सामाजिक सुरक्षा, नागरिक अधिकार और राज्य से जुड़े अनेक परिणाम उत्पन्न होते हैं।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह का सिविल रजिस्ट्रेशन राज्य की शासन व्यवस्था का मूल स्तंभ है, जिससे नागरिकों की पहचान, अधिकार और कर्तव्य सुनिश्चित होते हैं।
फादर पॉल पी. की जनहित याचिका
जयपुर स्थित सिरो-मलाबार रोमन कैथोलिक चर्च के प्रीस्ट-इन-चार्ज फादर पॉल पी. ने जनहित याचिका दायर कर इस महत्वपूर्ण कानूनी मुद्दे को अदालत के सामने रखा।
अधिवक्ता सुसान मैथ्यू के जरिए दायर की गई जनहित याचिका में कहा गया कि ईसाई विवाह अधिनियम, 1872 के तहत विधिवत संपन्न विवाहों को नगर निगम और रजिस्ट्रार कार्यालय सिविल रजिस्टर में दर्ज करने से मना कर रहे हैं।
जनहित याचिका में कहा गया कि राजस्थान अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2009 का हवाला देते हुए अधिकारी अक्सर मुश्किलें खड़ी करते हैं।
याचिका में यह भी कहा गया कि विवाह पंजीकरण नहीं होने से ईसाई दंपतियों को पासपोर्ट, वीज़ा, सरकारी सेवाओं, बैंकिंग, बीमा, उत्तराधिकार और पहचान पत्रों से जुड़े गंभीर संकटों का सामना करना पड़ रहा है।
2009 के कानून पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
राज्य सरकार और नगर निकायों का तर्क था कि राजस्थान अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2009 ईसाई विवाहों पर लागू नहीं होता।
राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा—
“धारा 20 केवल प्रक्रिया को बाहर करती है, कर्तव्य को नहीं।”
हाईकोर्ट ने कहा कि 2009 का कानून विशेष विवाह कानूनों को समाप्त नहीं करता, बल्कि उन्हें संरक्षित (protect) करता है।
कोर्ट ने कहा कि ईसाई विवाह अधिनियम के तहत पंजीकरण की प्रक्रिया पहले से मौजूद है और राज्य का दायित्व है कि उन प्रमाणपत्रों को सिविल रजिस्टर में शामिल करे।
चार कानूनों की संयुक्त व्याख्या
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में चार प्रमुख कानूनों- ईसाई विवाह अधिनियम, 1872 (विवाह की विधि और प्रमाणपत्र),
जन्म, मृत्यु एवं विवाह पंजीकरण अधिनियम, 1886 (सिविल रिकॉर्ड का भंडारण), जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 (रजिस्ट्रार की नियुक्ति और प्रशासन), राजस्थान अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2009 (सामान्य विवाहों के लिए ढांचा)
की सामंजस्यपूर्ण (harmonious) व्याख्या करते हुए कहा कि ये सभी कानून एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।
ईसाई विवाह प्रमाणपत्र की कानूनी ताकत
हाईकोर्ट ने ईसाई विवाह अधिनियम की धारा 61 और 62 का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि लाइसेंस प्राप्त पादरी द्वारा जारी प्रमाणपत्र किसी भी न्यायिक कार्यवाही में विवाह का निर्णायक और अंतिम प्रमाण होता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे प्रमाणपत्रों को सिविल रजिस्टर में दर्ज न करना कानून का सीधा उल्लंघन है।
अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि ईसाई विवाहों का पंजीकरण न करना अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने इसे मनमाना, भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक करार दिया।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार, नगर निगम और सभी रजिस्ट्रारों को निर्देश दिया कि ईसाई विवाह अधिनियम, 1872 के तहत संपन्न सभी विवाह संबंधित रजिस्ट्रार द्वारा सिविल विवाह रजिस्टर में दर्ज किए जाएं।
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही विवाह प्रमाणपत्र पर आवश्यक endorsement दी जाए और प्रमाणित प्रतियां जारी की जाएं।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह कोई नई शक्ति नहीं, बल्कि पहले से मौजूद वैधानिक दायित्व है।