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ट्रस्ट चुनाव विवाद पर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: भ्रष्टाचार या मिलीभगत के आरोप, तो ऐसे मामलों की सुनवाई सिविल कोर्ट में हो सकती है

Rajasthan High Court: Civil Suits Maintainable in Public Trust Election Fraud Cases, Section 73 Not a Bar

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने सार्वजनिक ट्रस्ट के चुनाव विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किन परिस्थितियों में सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र लागू रहेगा और कब नहीं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है कि यदि ट्रस्ट के चुनाव में अनियमितता, भ्रष्टाचार या मिलीभगत जैसे आरोप लगाए जाएं, तो ऐसे मामलों की सुनवाई सिविल कोर्ट में हो सकती है और केवल राजस्थान पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के आधार पर सिविल अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वतः समाप्त नहीं माना जा सकता।

जस्टिस मुकेश राजपुरोहित की एकलपीठ ने यह आदेश हरिगोपाल शर्मा व अन्य की ओर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

तीन कानूनी बिंदु तय

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में तीन कानूनी बिंदुओं को स्पष्ट किया है। हाईकोर्ट के अनुसार—

  1. चुनाव में fraud/corruption के आरोप हों तो सिविल कोर्ट में वाद चल सकता है।
  2. Section 73 RPT Act हर ट्रस्ट चुनाव विवाद में civil jurisdiction को bar नहीं करता।
  3. ऐसे विवाद evidence के आधार पर trial में तय होंगे, summary rejection उचित नहीं।

क्या है मामला

मामला अखिल भारतवर्षीय श्री महर्षि गौतम शैक्षणिक एवं परमार्थिक ट्रस्ट के अध्यक्ष पद के चुनाव से संबंधित है।

ट्रस्ट के अध्यक्ष पद पर 26 मार्च 2024 को हुए निर्विरोध चुनाव को चुनौती देते हुए वादी पक्ष ने जिला न्यायाधीश बीकानेर की अदालत में सिविल वाद दायर किया था।

वाद में आरोप लगाया गया कि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं थी, नामांकन पत्र को मनमाने ढंग से निरस्त किया गया और चुनाव अधिकारियों तथा कुछ व्यक्तियों की मिलीभगत से चुनाव परिणाम प्रभावित किया गया।

वाद में चुनाव को निरस्त घोषित करने, नए सिरे से निष्पक्ष चुनाव कराने तथा ट्रस्ट की संपत्ति और धन के दुरुपयोग को रोकने की मांग भी की गई थी।

इसके बाद प्रतिवादी पक्ष ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के तहत आवेदन देकर वाद को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज करने की मांग की, यह कहते हुए कि मामला राजस्थान पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1959 की धारा 73 के तहत सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

ट्रायल कोर्ट का निर्णय

जिला न्यायाधीश बीकानेर ने प्रतिवादी पक्ष की यह दलील स्वीकार नहीं की और आवेदन को खारिज कर दिया।

ट्रायल कोर्ट ने कहा कि वाद में चुनाव की वैधता को चुनौती दी गई है तथा भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप लगाए गए हैं, जिनकी जांच और निर्णय सिविल कोर्ट द्वारा किया जा सकता है, क्योंकि कानून में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है जो ऐसे विवादों को सिविल अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर करता हो।

इसी आदेश को चुनौती देते हुए प्रतिवादी पक्ष ने हाईकोर्ट में सिविल रिवीजन याचिका दायर की।

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता की दलीलें

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता हरिगोपाल शर्मा की ओर से दलीलें दी गईं कि ट्रस्ट के चुनाव से संबंधित विवाद राजस्थान पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के तहत आने वाले मामलों में शामिल हैं और इनकी सुनवाई देवस्थान विभाग के सक्षम अधिकारियों द्वारा की जानी चाहिए। इसलिए सिविल कोर्ट में दायर वाद कानूनन विचारणीय नहीं है।

दूसरी ओर, वादी पक्ष ने कहा कि वाद में केवल प्रशासनिक या प्रबंधन संबंधी विवाद नहीं है, बल्कि चुनाव प्रक्रिया में भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और मिलीभगत जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिनकी जांच साक्ष्यों के आधार पर ही संभव है और इसके लिए सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र लागू होता है।

हाईकोर्ट का फैसला

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि आदेश 7 नियम 11 के तहत आवेदन पर निर्णय करते समय अदालत केवल वादपत्र (प्लेंट) में किए गए कथनों को ही देखती है और प्रतिवादी के बचाव या विवादित तथ्यों की जांच इस स्तर पर नहीं की जाती।

अदालत ने कहा कि वादपत्र में चुनाव प्रक्रिया में अनियमितता, भ्रष्टाचार और मिलीभगत के स्पष्ट आरोप लगाए गए हैं, जो साक्ष्यों के आधार पर जांच की मांग करते हैं।

ऐसे मामलों में केवल इस आधार पर वाद को खारिज नहीं किया जा सकता कि संबंधित अधिनियम के अंतर्गत कुछ कार्यवाही लंबित है।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध धूलाभाई बनाम मध्य प्रदेश राज्य के फैसले के सिद्धांतों का भी उल्लेख करते हुए कहा कि सिविल अदालत के अधिकार क्षेत्र को तभी समाप्त माना जा सकता है जब कानून में स्पष्ट रूप से ऐसा प्रावधान हो या विवाद के समाधान के लिए पूर्ण वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध हो।

सिविल अदालतों का अधिकार क्षेत्र व्यापक

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कुछ महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट करते हुए कहा कि सिविल अदालतों का अधिकार क्षेत्र व्यापक है और इसे केवल स्पष्ट कानूनी प्रावधान द्वारा ही सीमित किया जा सकता है।

यदि किसी अधिनियम में चुनाव विवाद के समाधान के लिए स्पष्ट व्यवस्था नहीं है, तो ऐसे मामलों की सुनवाई सिविल अदालत कर सकती है।

आदेश 7 नियम 11 के तहत आवेदन पर विचार करते समय केवल वादपत्र की सामग्री को देखा जाता है, बचाव पक्ष के तर्कों को नहीं।

भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और मिलीभगत जैसे आरोपों वाले चुनाव विवाद साक्ष्य के आधार पर तय किए जाने चाहिए और उन्हें प्रारंभिक स्तर पर खारिज करना उचित नहीं है।

अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने इन तथ्यों और कानूनी बिंदुओं के आधार पर बीकानेर ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए याचिकाकर्ता की सिविल रिवीजन याचिका को खारिज करने का आदेश दिया।

राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष सिविल वाद की सुनवाई जारी रखने का रास्ता साफ कर दिया।

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