टॉप स्टोरी

चर्चित खबरें

यदि कोई व्यक्ति उधारकर्ता या गारंटर नहीं फिर भी जा सकते हैं DRT” – राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, फ्लैट खरीदार की रिट याचिका खारिज

Rajasthan High Court: Flat Purchaser Can Approach DRT Even if Not Borrower or Guarantor Under SARFAESI Act

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने SARFAESI Act से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा कानूनी सिद्धांत स्पष्ट करते हुए कहा है कि यदि किसी व्यक्ति के अधिकार बैंक या वित्तीय संस्था की रिकवरी कार्रवाई से प्रभावित होते हैं, तो वह व्यक्ति भले ही ऋण का उधारकर्ता या गारंटर न हो, फिर भी उसे “पीड़ित व्यक्ति” (Aggrieved Person) माना जाएगा और वह डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) का दरवाजा खटखटा सकता है।

जस्टिस सुनील बेनीवाल की एकलपीठ ने फ्लैट खरीदार द्वारा दायर रिट याचिका को जारी रखने योग्य नहीं (Not Maintainable) मानते हुए खारिज कर दिया और कहा कि जब कानून में प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है, तो सीधे हाईकोर्ट की रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग नहीं किया जा सकता।

क्या है पूरा मामला

जोधपुर निवासी राजीव भंडारी ने वर्ष 2018 में पार्श्वनाथ सिटी, जोधपुर में स्थित एक फ्लैट खरीदा था और अपने परिवार के साथ उसी फ्लैट में रह रहे थे।

बाद में एक एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी द्वारा SARFAESI Act, 2002 की धारा 13(4) के तहत नोटिस जारी किया गया, जिसमें उक्त फ्लैट को सुरक्षित संपत्ति (Secured Asset) बताते हुए रिकवरी प्रक्रिया शुरू की गई।

फ्लैट खरीदार ने दावा किया कि वह न तो उस ऋण का उधारकर्ता है और न ही गारंटर, इसलिए उसके फ्लैट के खिलाफ की जा रही कार्रवाई अवैध है।

इसी आधार पर उसने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर नोटिस को रद्द करने और फ्लैट की नीलामी पर रोक लगाने की मांग की।

याचिकाकर्ता की प्रमुख दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में यह दलील दी गयी कि SARFAESI Act के तहत कार्रवाई करने से पहले निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है, लेकिन इस मामले में उचित प्रक्रिया अपनाए बिना सीधे कार्रवाई की गई।

यह भी कहा गया कि चूंकि याचिकाकर्ता न तो उधारकर्ता है और न गारंटर, इसलिए उसके खिलाफ रिकवरी कार्रवाई करना कानून के विरुद्ध है।

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि उसके पास कोई प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध नहीं है, इसलिए उसे सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

हाईकोर्ट का फैसला

राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जिस वित्तीय संस्था ने नोटिस जारी किया है, वह एक निजी वित्तीय संस्था और राज्य नहीं है और सामान्यतः ऐसे मामलों में सीधे रिट याचिका दाखिल करना उचित नहीं माना जाता।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अलग अलग फैसलो का हवाला देते हुए कहा कि SARFAESI Act के तहत की गई कार्रवाई को चुनौती देने के लिए कानून में स्पष्ट रूप से वैधानिक मंच उपलब्ध है और उसी का उपयोग किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने इस मामले में विशेष रूप से व्यवस्था स्थापित करते हुए कहा कि भले ही याचिकाकर्ता उधारकर्ता या गारंटर नहीं है, लेकिन यदि उसके अधिकार नोटिस से प्रभावित होते हैं तो वह “Aggrieved Person” की श्रेणी में आता है और धारा 17 के तहत डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल में आवेदन कर सकता है।

वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने पर रिट नहीं

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट कर चुका है कि जब किसी कानून में प्रभावी और पर्याप्त वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो, तो हाईकोर्ट को रिट याचिकाओं पर सुनवाई से बचना चाहिए।

SARFAESI Act में डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल को विस्तृत अधिकार दिए गए हैं और वहां प्रभावित व्यक्ति अपनी शिकायतों का समाधान प्राप्त कर सकता है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल न केवल रिकवरी कार्रवाई की वैधता की जांच कर सकता है, बल्कि आवश्यक होने पर संपत्ति की स्थिति बहाल करने जैसे आदेश भी पारित कर सकता है। इसलिए ऐसे मामलों में ट्रिब्यूनल एक प्रभावी और सक्षम मंच है।

याचिका खारिज, ट्रिब्यूनल जाने की छूट

इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रस्तुत रिट याचिका वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने के कारण सुनवाई योग्य नहीं है।

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी कि वह कानून के अनुसार उचित मंच यानी डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल में जाकर अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकता है और आवश्यक राहत प्राप्त कर सकता है।

सबसे अधिक लोकप्रिय