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Live-In Relationshipमें रहने वाले बालिग व्यक्तियों को भी समान रूप से जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार

Rajasthan High Court Orders Protection Assessment for Live-in Couple, Reaffirms Right to Life and Liberty

हाईकोर्ट ने पुलिस को दिया आदेश-खतरे की शिकायत मिलते ही तुरंत थ्रेट असेसमेंट कर आवश्यक सुरक्षा प्रदान करें

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे एक बालिग जोड़े की सुरक्षा याचिका पर महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति का जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार है, जिसकी किसी भी परिस्थिति में अनदेखी नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले बालिग व्यक्तियों को किसी प्रकार का खतरा महसूस होता है तो राज्य और पुलिस प्रशासन का कर्तव्य है कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करे।

राजस्थान हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे जोड़े की ओर से अपनी सुरक्षा को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला दिया है।

हाईकोर्ट ने इस मामले में पुलिस अधिकारियों को आदेश दिया कि यदि याचिकाकर्ता सुरक्षा को लेकर प्रतिवेदन देते हैं तो उनकी शिकायत पर विचार करते हुए खतरे के आकलन के आधार पर आवश्यक कार्रवाई की जाए।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह आदेश सुरभि और मनोहर लाल द्वारा दायर आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

मामला क्या था

याचिकाकर्ता युवक व युवती ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर अदालत को बताया कि वे दोनों बालिग हैं और अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रह रहे हैं।

उन्होंने 8 अक्टूबर 2025 को लिव-इन रिलेशनशिप का एक समझौता भी किया है और वर्तमान में साथ रह रहे हैं।

याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि उनके इस संबंध का कुछ परिजन और अन्य निजी पक्ष विरोध कर रहे हैं और उन्हें लगातार धमकियां दे रहे हैं, जिससे उनके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खतरा है। इसी आधार पर उन्होंने अदालत से सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश देने की मांग की।

हाईकोर्ट की टिप्पणी

राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार संविधान द्वारा हर व्यक्ति को दिया गया मौलिक अधिकार है और किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अलावा इससे वंचित नहीं किया जा सकता।

यदि किसी व्यक्ति को अपने जीवन या स्वतंत्रता को लेकर खतरे की आशंका है, तो संबंधित अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे उसकी शिकायत पर विचार करें और आवश्यक सुरक्षा सुनिश्चित करें।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि खतरे की वास्तविकता और सुरक्षा की आवश्यकता का आकलन पुलिस अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र का विषय है और कानून-व्यवस्था बनाए रखना उनका दायित्व है।

पुलिस को दिए आदेश

हाईकोर्ट ने मामले में आदेश दिया कि याचिकाकर्ता दस दिनों के भीतर संबंधित पुलिस अधीक्षक (SP) के समक्ष उपस्थित होकर लिखित रूप में यह बताएं कि उन्हें किन व्यक्तियों से खतरा है।

इसके बाद संबंधित पुलिस अधीक्षक याचिकाकर्ताओं की शिकायत पर सुनवाई करेंगे, आवश्यकता होने पर निजी पक्षकारों को भी सुनेंगे और खतरे की स्थिति का आकलन करेंगे।

यदि परिस्थितियां आवश्यक समझी जाएं तो कानून के अनुसार उचित सुरक्षा या अन्य आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी ताकि कोई भी व्यक्ति कानून अपने हाथ में न ले सके।

संबंध की वैधता पर हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया है कि उसने याचिकाकर्ताओं के लिव-इन संबंध की वैधता, उनके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की प्रामाणिकता या अन्य तथ्यों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है।

इन सभी पहलुओं की जांच संबंधित सक्षम प्राधिकारी द्वारा कानून के अनुसार की जा सकती है।

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