डॉ. महिपाल सिंह सिहाग को भूगोल विभागाध्यक्ष के पद से हटाने का आदेश अवैध घोषित, पद पर पुनः बहाली का आदेश, प्रोफेसर चंद्र विजय धबरिया की नई नियुक्ति का आदेश भी रद्द।
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने राजस्थान विश्वविद्यालय प्रशासन के उस आदेश को अवैध घोषित कर दिया है, जिसके जरिए भूगोल विभागाध्यक्ष (HOD) के पद से डॉ. महिपाल सिंह सिहाग को हटाया गया था।
राजस्थान हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा 18 जुलाई 2023 को जारी किए गए पद से हटाने के आदेश को रद्द करते हुए डॉ. महिपाल सिंह सिहाग को पुनः पद पर बहाल करने का आदेश दिया है।
जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी शिक्षक या विभागाध्यक्ष को बिना उचित कारण और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए हटाया नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि सरकारी वित्तपोषित विश्वविद्यालयों में कोई भी पद व्यक्तिगत इच्छा या मनमर्जी के आधार पर नहीं चल सकता।
प्रशासन पर गंभीर सवाल
राजस्थान हाईकोर्ट ने राजस्थान विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता भूगोल विभागाध्यक्ष (HOD) डॉ. महिपाल सिंह सिहाग के खिलाफ शिकायतें उसी दिन दर्ज हुईं, जिस दिन समिति गठित की गई और उसी दिन विभागाध्यक्ष को पद से हटा दिया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि समिति के पास शिकायतों की सत्यता की पुष्टि या याचिकाकर्ता से स्पष्टीकरण लेने का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था।
हाईकोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालयों में अनुशासन बनाए रखने के प्रयासों को शिकायतों का आधार बनाकर किसी शिक्षक को हटाना उचित नहीं है।
यदि कोई शिक्षक नियमों के पालन पर जोर देता है तो यह प्रशासनिक कार्रवाई का आधार नहीं बन सकता।
हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्रवाई को मनमानी और अवैध बताते हुए कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी प्रशासनिक निर्णय में पारदर्शिता और न्यायसंगत प्रक्रिया का पालन हो, ताकि शिक्षकों और संस्थानों की कार्यप्रणाली पर अनावश्यक विवाद न उत्पन्न हों।
यह है मामला
याचिकाकर्ता डॉ. महिपाल सिंह सिहाग को 21 अप्रैल 2023 के आदेश के तहत तीन वर्ष की अवधि के लिए भूगोल विभागाध्यक्ष नियुक्त किया गया था।
लेकिन बाद में विश्वविद्यालय के कुलपति के निर्देश पर गठित एक समिति की सिफारिशों के आधार पर 18 जुलाई 2023 को उन्हें विभागाध्यक्ष पद से हटा दिया गया और विभाग का प्रभार विज्ञान संकाय के डीन को सौंप दिया गया।
इसके बाद 4 अक्टूबर 2023 को प्रोफेसर चंद्र विजय धबरिया को विभागाध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया।
महिपाल सिंह सिहाग ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस आदेश को चुनौती दी।
याचिका में दलील
याचिकाकर्ता डॉ. महिपाल सिंह सिहाग की ओर से डॉ. सविता सिहाग ने दलीलें पेश करते हुए अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता को 21 अप्रैल 2023 के आदेश के तहत तीन वर्ष की अवधि के लिए राजस्थान विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग का विभागाध्यक्ष नियुक्त किया गया था, लेकिन नियुक्ति के कुछ ही समय बाद 18 जुलाई 2023 को बिना किसी पूर्व सूचना, नोटिस या स्पष्टीकरण के अवसर दिए उन्हें पद से हटा दिया गया।
अधिवक्ता ने कहा कि उन्हें बिना कारण बताए, बिना नोटिस दिए और बिना सुनवाई का अवसर प्रदान किए पद से हटा दिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि उनके खिलाफ की गई शिकायतें अनुशासन लागू करने, विशेषकर 75 प्रतिशत उपस्थिति नियम के पालन को लेकर असंतुष्ट छात्रों और कुछ शिक्षकों द्वारा की गई थीं।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उनके खिलाफ कुछ शोधार्थियों और शिक्षकों द्वारा की गई शिकायतें वास्तविक नहीं थीं, बल्कि उन्होंने विभाग में अनुशासन लागू करने और 75 प्रतिशत न्यूनतम उपस्थिति नियम को सख्ती से लागू करने के कारण असंतुष्ट लोगों द्वारा शिकायतें की गईं।
शिकायतों के आधार पर कुलपति द्वारा समिति गठित कर तुरंत कार्रवाई कर दी गई, जबकि उन्हें अपनी बात रखने या आरोपों का जवाब देने का कोई अवसर नहीं दिया गया।
अनियमितताओं को उजागर करने की सजा
अधिवक्ता ने यह भी कहा कि विभागाध्यक्ष पद पर नियुक्ति वरिष्ठता और नियमों के अनुसार की गई थी।
अधिवक्ता ने कहा कि याचिकाकर्ता अपने प्रतिवादी संख्या-2 प्रोफेसर चंद्र विजय धबरिया से वरिष्ठ थे। इसके बावजूद उन्हें हटाकर प्रतिवादी संख्या-2 को विभागाध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया, जो मनमाना और दुर्भावनापूर्ण निर्णय है।
याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय में शोध प्रवेश और अन्य प्रशासनिक मामलों में कई अनियमितताएँ थीं, जिन्हें उन्होंने उजागर किया था, जिसके कारण उनके खिलाफ शिकायतों का माहौल बनाया गया।
राजस्थान विश्वविद्यालय का जवाब
याचिका पर सुनवाई के दौरान राजस्थान विश्वविद्यालय की ओर से अदालत में कहा गया कि याचिकाकर्ता के विभागाध्यक्ष बनने के बाद विभाग में समन्वय की कमी और प्रशासनिक समस्याएँ उत्पन्न हो गई थीं।
प्रशासन ने कहा कि छात्रों, शोधार्थियों और शिक्षकों की ओर से गंभीर शिकायतें प्राप्त हुई थीं, जिनके आधार पर कुलपति ने जांच के लिए एक समिति गठित की और विभाग के हित में प्रशासनिक निर्णय लेते हुए याचिकाकर्ता को पद से हटाया गया।
विश्वविद्यालय ने यह भी कहा कि विभागाध्यक्ष का पद कोई स्थायी या वित्तीय लाभ वाला पद नहीं है, बल्कि यह एक मानद प्रशासनिक जिम्मेदारी है, जिसे विश्वविद्यालय प्रशासन आवश्यकता के अनुसार वरिष्ठता या प्रशासनिक विवेक के आधार पर बदल सकता है।
इसलिए कुलपति द्वारा विभाग के सुचारू संचालन के लिए किया गया निर्णय वैध और प्रशासनिक अधिकारों के दायरे में था।
विश्वविद्यालय की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता द्वारा कुलपति के निर्णय को दुर्भावनापूर्ण या मनमाना बताने के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है। विभाग में उत्पन्न परिस्थितियों और शिकायतों को देखते हुए प्रशासन ने जो कदम उठाए, वह संस्थान के हित में आवश्यक था।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में राजस्थान विश्वविद्यालय प्रशासन के 18 जुलाई 2023 के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत डॉ. सिहाग को विभागाध्यक्ष पद से हटाया गया था।
साथ ही 4 अक्टूबर 2023 को की गई नई नियुक्ति को भी निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता को उनके शेष कार्यकाल के लिए पुनः विभागाध्यक्ष पद पर बहाल करने का आदेश दिया है।