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“rarest of rare”-मां ने बेटी को अपनी संतान मानने से किया इनकार: हाईकोर्ट ने डीएनए टेस्ट कराने का दिया आदेश, कहा-बाध्य नहीं किया जा सकता लेकिन सत्य तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिक जांच जरूरी

Rajasthan High Court Directs DNA Test After Mother Denies Daughter’s Maternity Claim

हाईकोर्ट ने कहा यदि मां डीएनए टेस्ट से इनकार करती हैं तो अदालत मां के खिलाफ प्रतिकूल अनुमान (adverse inference) लगाने के लिए स्वतंत्र

जयपुर।राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने जयपुर की एक अदालत में चल रहे पारिवारिक संपंति विवाद में मां द्वारा बेटी को बेटी मानने से इनकार करने से पैदा हुए कानूनी बिंदू को “rarest of rare” मानते हुए ऐतिहासिक और रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए मां का डीएनए टेस्ट कराने का आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी महिला द्वारा स्वयं किसी व्यक्ति को अपनी संतान मानने से इनकार किया जाता है, तो सत्य की पुष्टि के लिए डीएनए परीक्षण कराया जाना न्यायहित में आवश्यक हो सकता है।

जस्टिस बिपिन गुप्ता की एकलपीठ ने भौरी देवी की ओर से दायर याचिका को रद्द करते हुए आदेश दिया है। याचिका में ट्रायल कोर्ट द्वारा डीएनए परीक्षण संबंधी आवेदन खारिज किए जाने के आदेश को निरस्त कर दिया गया।

निजता का अधिकार

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि डीएनए परीक्षण से व्यक्ति की निजता प्रभावित हो सकती है, लेकिन अदालत का दायित्व सत्य का पता लगाना भी है। इसलिए अदालत को निजता के अधिकार और न्यायिक सत्य की खोज-दोनों के बीच संतुलन बनाकर निर्णय लेना होता है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को जबरन डीएनए परीक्षण कराने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, लेकिन अदालत परीक्षण कराने का आदेश दे सकती है।

हाईकोर्ट ने कहा यदि संबंधित व्यक्ति परीक्षण से इंकार करता है, तो अदालत परिस्थितियों के आधार पर उसके विरुद्ध प्रतिकूल अनुमान (adverse inference) लगा सकती है

अत्यंत आवश्यकता

राजस्थान हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि डीएनए परीक्षण का आदेश सामान्य या नियमित प्रक्रिया के रूप में नहीं दिया जाना चाहिए। यह तभी दिया जाना चाहिए जब मामले के न्यायपूर्ण निर्णय के लिए इसकी “अत्यंत आवश्यकता” (eminent need) हो और अन्य साक्ष्यों से सत्य तक पहुंचना संभव न हो।

हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का अंतिम उद्देश्य सत्य तक पहुंचना है। यदि वैज्ञानिक तकनीकें सत्य स्थापित करने में सहायक हैं, तो अदालत को उनका उपयोग करने से संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि न्याय का आधार वास्तविक तथ्य और सत्य है।

ये है मामला

यह पूरा मामला एक संपत्ति की वसीयत से जुड़ा है, जिसमें याचिकाकर्ता भौरी देवी ने अपने पिता स्वर्गीय बद्री द्वारा वर्ष 2014 में बनाए गए वसीयतनामे को निरस्त घोषित करने तथा संपत्ति में अपने हिस्से का अधिकार घोषित करने के लिए दीवानी वाद दायर किया था।

जयपुर के सांगानेर निवासी याचिकाकर्ता के पिता बद्री के नाम सांगानेर में कृषि भूमि दर्ज थी, जो पैतृक संपत्ति थी, जिसमें उनके पास आधा हिस्सा था।

इस भूमि का कुछ भाग रीको द्वारा “सेंट्रल स्पाइन योजना” के लिए अधिग्रहित कर लिया गया और इसके बदले में बद्री को उनके हिस्से के बदले विभिन्न आवंटन पत्रों के माध्यम से आठ भूखंड प्रदान किए गए।

पिता के निधन के बाद वसियत

याचिकाकर्ता भौरीदेवी के पिता ब्रदी का निधन 14 जनवरी 2017 को हो गया, निधन के बाद याचिकाकर्ता बेटी को वसियत की जानकारी हुई जो कि उसके पिता द्वारा उसके भाई रामस्वरूप के पक्ष में निष्पादित कि गयी थी.

याचिकाकर्ता भौरी देवी ने इसके अपने पिता की वसीयत को शून्य एवं निरस्त घोषित करने तथा स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए जयपुर की एक अदालत में वाद दायर किया.

याचिकाकर्ता बेटी की ओर से वाद में कहा गया कि पंजीकृत वसीयत याचिकाकर्ता के पिता द्वारा निष्पादित की गई, जबकि पैतृक संपत्ति होने के कारण उन्हें ऐसी वसीयत करने का अधिकार नहीं था।

मां ने बेटी मानने से किया इनकार

ट्रायल कोर्ट में बेटी की ओर से दायर वाद के जवाब में भाई ने जवाब देते हुए याचिकाकर्ता को उनके पिता ब्रदी की बेटी मानने से ही इनकार कर दिया.

विवाद तब गंभीर हो गया जब प्रतिवादी पक्ष ने यह दावा किया कि भौरी देवी स्वर्गीय बद्री और उनकी पत्नी बीला देवी की संतान नहीं हैं।

यहां तक कि मां बीला देवी ने भी अदालत में भौरी देवी को अपनी बेटी मानने से इनकार कर दिया। इस स्थिति में यह प्रश्न प्रमुख बन गया कि क्या याचिकाकर्ता वास्तव में बीला देवी की संतान हैं या नहीं।

मां और भाई के डीएनए टेस्ट की मांग

इस वाद की सुनवाई के दौरान ही याचिकाकर्ता भौरी देवी ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष एक आवेदन पेश कर अपनी मां बिलादेवी और भाई का डीएनए टेस्ट कर उसके डीएनए से मिलान का अनुरोध किया.

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गयी कि 90 वर्षिय बिलादेवी दबाव में हैं इसलिए भी डीएनए परीक्षण कराना आवश्यक है, ताकि अदालत वैज्ञानिक जांच के माध्यम से किसी निर्णायक निष्कर्ष पर पहुंच सके

डीएनए टेस्ट के लिए आवेदन और ट्रायल कोर्ट का आदेश

याचिकाकर्ता भौरी देवी ने ट्रायल कोर्ट में आवेदन देकर कहा कि मातृत्व का निर्धारण वैज्ञानिक जांच यानी डीएनए टेस्ट से ही संभव है और इससे विवाद का निर्णायक समाधान हो सकता है।

लेकिन ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि डीएनए टेस्ट से प्रतिवादी मां यानी बीला देवी की निजता का अधिकार प्रभावित होगा और उन्होंने जांच के लिए सहमति भी नहीं दी है।

ट्रायल कोर्ट के इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता बेटी ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।

हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता बेटी की दलीलें

याचिकाकर्ता बेटी की ओर से अधिवक्ता अनिल मेहता, राजकमल गौड़ और यशोधर पांडे ने पैरवी करते हुए अदातल से कहा कि वह स्वर्गीय बद्री की पुत्री हैं तथा विवादित संपत्ति पैतृक संपत्ति है, जिसमें उनका वैधानिक हिस्सा बनता है। उनके पिता द्वारा दिनांक 10.04.2014 को बनाई गई वसीयत अवैध है, क्योंकि पैतृक संपत्ति पर अकेले वसीयत करने का अधिकार नहीं था।

अधिवक्ता ने कहा कि बिलादेवी ने याचिकाकर्ता को अपनी पुत्री मानने से इनकार किया गया है, इसलिए इस तथ्य का निर्णायक प्रमाण केवल वैज्ञानिक जांच अर्थात डीएनए टेस्ट से ही संभव है।

अधिवक्ता ने दलील दी कि याचिकाकर्ता अशिक्षित होने के कारण अपने जन्म अथवा संबंध का कोई ठोस दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पा रही हैं, इसलिए वैज्ञानिक जांच आवश्यक है।

अधिवक्ता ने इस मामले में प्रतिवादी संख्या 3 रामस्वरूप को जिसने खुद को स्वर्गीय बद्री का पुत्र बता बताया उसका किसी रिकॉर्ड में उसका नाम पुत्र के रूप में दर्ज नहीं है। अतः सत्य की पुष्टि के लिए डीएनए परीक्षण किया जाए.

प्रतिवादी मां की दलीलें

वही प्रतिवादी मां व अन्य की ओर से प्रहलाद शर्मा, रामप्रसाद शर्मा, खेमसिंह राजावत, लाखन शर्मा और अक्षय शर्मा ने पैरवी की.

अधिवक्ताओं ने पैरवी करते हुए कहा कि इस मामले में प्रतिवादी बिलादेवी ने स्पष्ट किया हैं कि याचिकाकर्ता उनकी पुत्री नहीं है और इसलिए उसके दावों का कोई आधार नहीं है।

अधिवक्ता ने डीएनए परीक्षण कराने से उनके निजी जीवन और निजता के अधिकार का उल्लंघन होने की बात कही. इसलिए इस प्रकार का आदेश नहीं दिया जाना चाहिए।

अधिवक्ताओं ने कहा कि यह सिद्ध करने का भार याचिकाकर्ता पर है कि वह स्वर्गीय बद्री और बीला देवी की पुत्री है; इसके लिए अदालत को डीएनए परीक्षण का आदेश देने की आवश्यकता नहीं है।

अत्यंत दुर्लभ मामला

राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले को अत्यंत दुर्लभ स्थिति का माना और कहा कि ऐसा बहुत कम सामने आया है कि कोई महिला स्वयं किसी व्यक्ति को अपनी संतान मानने से इनकार कर रही है। आमतौर पर ऐसे विवादों में पिता द्वारा पितृत्व से इनकार किया जाता है, लेकिन यहां मातृत्व ही विवाद का विषय है।

हाईकोर्ट ने कहा कि आधुनिक विज्ञान के दौर में डीएनए परीक्षण मातृत्व या पितृत्व की पुष्टि का सबसे विश्वसनीय साधन है और जब विवाद का समाधान अन्य साक्ष्यों से संभव न हो, तब वैज्ञानिक जांच आवश्यक हो जाती है।

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि डीएनए परीक्षण का आदेश नियमित रूप से नहीं दिया जाना चाहिए, बल्कि तभी दिया जाना चाहिए जब न्यायपूर्ण निर्णय के लिए इसकी “अत्यंत आवश्यकता” हो।

निजता बनाम सत्य का प्रश्न

हाईकोर्ट ने कहा कि डीएनए परीक्षण से व्यक्ति की निजता प्रभावित हो सकती है, लेकिन जब एक ओर निजता का अधिकार और दूसरी ओर अदालत का सत्य तक पहुंचने का दायित्व हो, तो दोनों के बीच संतुलन बनाते हुए निर्णय लेना जरूरी है।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति परीक्षण से इनकार करता है तो उसे बाध्य नहीं किया जा सकता, लेकिन ऐसे इनकार के आधार पर अदालत परिस्थितियों के अनुसार प्रतिकूल अनुमान लगा सकती है।

डीएनए टेस्ट कराने का आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद मामले में प्रतिवादी मां बीला देवी का डीएनए टेस्ट कराकर याचिकाकर्ता भौरी देवी के डीएनए से मिलान कराने का आदेश दिया है

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए स्पष्ट कहा कि यदि प्रतिवादी मां डीएनए परीक्षण से इनकार करती हैं, तो कानून के अनुसार इसके परिणामों का मूल्यांकन करते हुए अदालत उचित अनुमान लगा सकती है।

हालांकि इस मामले में एक ओर प्रतिवादी के डीएनए परीक्षण की मांग को आवश्यक नहीं माना और कहा कि यह उसके ऊपर है कि वह स्वयं अपने दावे को साक्ष्यों के माध्यम से सिद्ध करे।

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