जोधपुर, 10 फरवरी। राजस्थान हाईकोर्ट ने भूमि विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला देते हुए कहा कि बिना वास्तविक आपात स्थिति और शांति भंग होने के ठोस प्रमाण के किसी संपत्ति को कुर्क करना और उस पर रिसीवर नियुक्त करना कानून का दुरुपयोग माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल संभावित विवाद या अनुमान के आधार पर संपत्ति को कुर्क करना कानून सम्मत नहीं है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि धारा 145 और 146 का उद्देश्य केवल शांति बनाए रखना है, न कि संपत्ति के अधिकारों या स्वामित्व का निर्णय करना, जो कि सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट रामूराम की ओर से दायर याचिका पर दिया है।
बीकानेर के नाथूसर गांव का मामला
बीकानेर जिले के नाथूसर गांव स्थित एक भूमि को लेकर दो पक्षकारों के बीच विवाद था।
पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर उपखंड मजिस्ट्रेट (एसडीएम) ने 18 जून 2025 को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 145-146 के तहत भूमि को अटैच कर दिया और एसएचओ को रिसीवर नियुक्त कर दिया।
बाद में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने इस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की।
याचिका में दलील
राजस्थान हाईकोर्ट में दायर याचिका में अधिवक्ता एम. एस. पुरोहित ने दलील दी कि भूमि को कुर्क करने और एसएचओ को रिसीवर नियुक्त करने का आदेश कानूनन गलत तथा बिना पर्याप्त आधार के पारित किया गया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि संबंधित भूमि पर कब्जे को लेकर कोई वास्तविक हिंसक विवाद या शांति भंग की स्थिति मौजूद नहीं थी, फिर भी एसडीएम ने धारा 145-146 के तहत अत्यधिक कठोर कार्रवाई करते हुए सीधे भूमि को अटैच कर दिया।
याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि पुलिस की शिकायत पर अदालत द्वारा उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, न ही पक्षकारों को पर्याप्त सुनवाई का अवसर दिया गया। रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं था जिससे यह सिद्ध हो सके कि तत्काल आपात स्थिति उत्पन्न हो गई थी। इसलिए रिसीवर नियुक्त करना तथा कब्जे से वंचित करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
राज्य सरकार का पक्ष
मामले में राज्य सरकार और निजी प्रतिवादियों की ओर से जवाब दिया गया कि भूमि को लेकर दोनों पक्षों के बीच गंभीर विवाद चल रहा था और स्थिति कभी भी तनावपूर्ण हो सकती थी।
सरकार ने कहा कि प्रशासन को पुलिस रिपोर्ट से यह आशंका हुई कि विवाद बढ़ने पर शांति भंग होने की संभावना है, इसलिए एहतियाती कदम के रूप में भूमि को अटैच कर रिसीवर नियुक्त किया गया।
प्रतिवादियों की तरफ से कहा गया कि मजिस्ट्रेट को कानून के तहत यह अधिकार है कि वह संभावित शांति भंग को रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई करे। इसलिए एसडीएम द्वारा पारित आदेश को वैधानिक अधिकारों के दायरे में लिया गया निर्णय बताया गया और अदालत से याचिका खारिज करने का अनुरोध किया गया।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि एसडीएम के समक्ष ऐसा कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं था जिससे यह सिद्ध हो कि मौके पर शांति भंग होने का वास्तविक खतरा था या कोई हिंसक स्थिति उत्पन्न हुई थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल संभावित विवाद या अनुमान के आधार पर संपत्ति को कुर्क करना कानून सम्मत नहीं है। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि धारा 145 और 146 का उद्देश्य केवल शांति बनाए रखना है, न कि संपत्ति के अधिकारों या स्वामित्व का निर्णय करना, जो कि सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है।
हाईकोर्ट ने मामले में कहा कि पुलिस द्वारा 28 मई 2025 को दी गई शिकायत पर तत्काल कोई कार्रवाई नहीं हुई और लगभग तीन सप्ताह बाद अचानक “आपात स्थिति” मानकर रिसीवर नियुक्त कर दिया गया, जबकि रिकॉर्ड में किसी नई घटना या परिस्थिति का उल्लेख नहीं था।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक वास्तविक हिंसा या शांति भंग का तात्कालिक खतरा सिद्ध न हो, तब तक मजिस्ट्रेट द्वारा संपत्ति को तीसरे पक्ष के नियंत्रण में देना न्यायसंगत नहीं है।
अंतिम आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने एसडीएम द्वारा 18 जून 2025 को पारित कुर्की आदेश तथा अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के आदेश दोनों को निरस्त करने का आदेश दिया।
इसके साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में धारा 145 की पूरी कार्यवाही को कानून के दुरुपयोग मानते हुए समाप्त करने का आदेश दिया।