कोटा कॉमर्शियल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिका को किया खारिज
जयपुर, 10 फरवरी 2026। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने व्यावसायिक विवादों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी वाद में तत्काल अंतरिम राहत (Urgent Interim Relief) की मांग की गई हो तो वाद दाखिल करने से पहले अनिवार्य प्री-इंस्टीट्यूशन मेडिएशन की शर्त लागू नहीं होगी।
जस्टिस अनुरूप सिंह की एकलपीठ ने शब्बो बनाम सजनी मेहंदी प्रोडक्ट मामले में यह निर्णय सुनाते हुए याचिकाकर्ता की दोनों रिट याचिकाएं खारिज कर दीं और कॉमर्शियल कोर्ट, कोटा के आदेशों को बरकरार रखा।
मेहंदी उत्पाद से जुड़ा हैं मामला
मामला कोटा स्थित मेहंदी उत्पादों के व्यापार से संबंधित है, जिसमें प्रतिवादी कंपनी ने ट्रेडमार्क उल्लंघन और पासिंग-ऑफ का आरोप लगाते हुए याचिकाकर्ता के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा, हर्जाना तथा खातों के लेखा-जोखा की मांग करते हुए कॉमर्शियल कोर्ट में दीवानी वाद दायर किया था।
वाद के साथ ही अंतरिम निषेधाज्ञा (टेम्पररी इंजंक्शन) का आवेदन भी प्रस्तुत किया गया था।
याचिकाकर्ता ने वाद की सुनवाई के दौरान सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के तहत आवेदन दाखिल कर कहा कि वाद कॉमर्शियल कोर्ट अधिनियम, 2015 की धारा 12-A का पालन किए बिना दायर किया गया है, इसलिए इसे कानूनन खारिज किया जाना चाहिए।
कॉमर्शियल कोर्ट ने इस आवेदन को खारिज कर दिया, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि कानून के अनुसार कॉमर्शियल मामलों में मुकदमा दायर करने से पहले प्री-इंस्टीट्यूशन मेडिएशन अनिवार्य है।
चूंकि वादी ने इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया, इसलिए वाद प्रारंभ से ही अवैध है।
याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि कॉमर्शियल मामलों को इस मुद्दे पर साक्ष्य लेकर प्रारंभिक मुद्दे के रूप में निर्णय करना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हुई।
प्रतिवादी का पक्ष
प्रतिवादी की ओर से कहा गया कि वाद के साथ अंतरिम निषेधाज्ञा का आवेदन भी दाखिल किया गया था, इसलिए धारा 12-A की अनिवार्यता लागू नहीं होती।
कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि जहां तत्काल अंतरिम राहत की मांग की जाती है, वहां प्री-इंस्टीट्यूशन मेडिएशन की शर्त से छूट मिलती है।
प्रतिवादी ने यह भी तर्क दिया कि ट्रेडमार्क उल्लंघन निरंतर जारी रहने वाला अपराध है और प्रत्येक दिन नए नुकसान की संभावना रहती है, इसलिए मामला तत्काल राहत का है।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आदेश 7 नियम 11 के तहत दायर आवेदन पर विचार करते समय केवल वादपत्र (Plaint) में किए गए कथनों को ही देखा जाता है, किसी अतिरिक्त साक्ष्य या विवादित तथ्यों पर विचार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्अ ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि इस स्तर पर साक्ष्य लेने की आवश्यकता नहीं होती और केवल वादपत्र के आधार पर यह देखा जाता है कि वाद कानून द्वारा प्रतिबंधित है या नहीं।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब वाद में अंतरिम निषेधाज्ञा की मांग की गई हो और उल्लंघन लगातार जारी हो, तब इसे “तत्काल अंतरिम राहत” की श्रेणी में माना जाएगा।
ऐसे मामलों में धारा 12-A के तहत प्री-इंस्टीट्यूशन मेडिएशन अनिवार्य नहीं है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि केवल मुकदमा दायर करने में हुई देरी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मामला तत्काल राहत का नहीं है, खासकर जब उल्लंघन लगातार जारी हो रहा हो।
अंतिम आदेश
इन सभी तथ्यों और कानूनी सिद्धांतों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि कॉमर्शियल कोर्ट पारित आदेश कानून के अनुरूप हैं और उनमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
हाईकोर्ट ने दोनों रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि जब किसी व्यावसायिक वाद में अंतरिम राहत की मांग की जाती है और उल्लंघन निरंतर जारी रहता है, तब प्री-इंस्टीट्यूशन मेडिएशन की शर्त लागू नहीं होती।