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अनिवार्य सेवानिवृत्ति रद्द होने पर ‘नो वर्क-नो पे’ लागू नहीं, कर्मचारी को 4 साल की पूरी तनख्वाह और भत्ते देने का हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

No Work No Pay Not Applicable After Compulsory Retirement Is Quashed: Rajasthan High Court

हाईकोर्ट ने कहा अनिवार्य सेवानिवृत्ति को ही अवैध ठहराकर निरस्त कर दिया गया, ऐसे में विभाग ही सेवा से दूर रखने का जिम्मेदार

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने सेवा कानून से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी कर्मचारी की अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) का आदेश रद्द कर दिया जाता है, तो उस अवधि के लिए कर्मचारी को पूरी तनख्वाह और सभी भत्तों का अधिकार होगा, भले ही उसने उस दौरान कार्य न किया हो।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में “नो वर्क-नो पे” (No Work, No Pay) का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता।

जस्टिस प्रवीर भटनागर की अदालत ने यह महत्वपूर्ण फैसला के.सी. जैन की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

अनिवार्य सेवानिवृत्ति निरस्त

याचिकाकर्ता के.सी. जैन ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उनकी अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश विभागीय अपीलीय प्राधिकरण द्वारा पहले ही रद्द किया जा चुका है, फिर भी 14 जून 2006 से 31 जुलाई 2010 तक की अवधि का वेतन-भत्ता देने से उन्हें वंचित रखा गया, जो कानून के विपरीत है।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुनील समदड़िया और अरिहंत समदड़िया ने दलील देते हुए कहा कि जब अपीलीय प्राधिकरण ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति को निरस्त कर दिया और यह माना कि सेवा रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं था जिससे उन्हें अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त किया जा सके, तो उस अवधि के वेतन-भत्तों से वंचित रखना न्यायसंगत नहीं है।

अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले शोभा राम रतूरी बनाम हरियाणा विद्युत प्रसारण निगम लिमिटेड का हवाला देते हुए तर्क दिया कि यदि कर्मचारी को सेवा से दूर रखना नियोक्ता का निर्णय रहा हो, तो बाद में “नो वर्क-नो पे” का आधार लेकर वेतन देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

राज्य सरकार की दलील

मामले में राज्य सरकार की ओर से यह दलील दी गई कि संबंधित अवधि में कर्मचारी ने कोई कार्य नहीं किया, इसलिए अपीलीय प्राधिकरण द्वारा वेतन रोकने का निर्णय उचित था।

हालांकि अदालत ने उपलब्ध अभिलेखों का परीक्षण करने के बाद पाया कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश ठोस आधारों के बिना पारित किया गया था और कर्मचारी के पिछले पांच वर्षों के सेवा रिकॉर्ड में कोई प्रतिकूल प्रविष्टि नहीं थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि कई प्रतिकूल टिप्पणियां तो 15 वर्ष से भी अधिक पुरानी थीं और उन्हें विधिवत निस्तारित भी नहीं किया गया था।

सेवा से दूर रखने के लिए विभाग जिम्मेदार

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब अनिवार्य सेवानिवृत्ति को ही अवैध ठहराकर निरस्त कर दिया गया है, तो कर्मचारी को उस अवधि के वेतन और अन्य लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी को सेवा से दूर रखने के लिए स्वयं विभाग जिम्मेदार था, इसलिए “नो वर्क-नो पे” का सिद्धांत लागू नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कर्मचारी को काम करने से रोका गया हो और बाद में आदेश निरस्त हो जाए, तो उसे सभी परिणामी लाभ (Consequential Benefits) मिलना ही चाहिए।

हाईकोर्ट ने इसी आधार पर याचिकाकर्ता को 14 जून 2006 से 31 जुलाई 2010 तक की अवधि का पूरा वेतन और अन्य देय भत्ते तीन माह के भीतर भुगतान के आदेश दिए हैं।

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