BNSS के तहत मजिस्ट्रेट को संज्ञान से पहले आरोपियों से सीमित सुनवाई का अधिकार; हाईकोर्ट ने कठोर कार्रवाई पर लगाई रोक, ट्रायल कोर्ट को कानून अनुसार निर्णय के निर्देश
जोधपुर, 12 फरवरी।चित्तौड़गढ़ जिले के गंगरार स्थित राजकीय विद्यालय सालेरा के चर्चित वीडियो प्रकरण में राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश देते हुए आरोपी शिक्षक और शिक्षिका को बड़ी राहत प्रदान की है।
हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की कठोर कार्रवाई पर रोक लगाते हुए उन्हें निर्धारित तिथि पर ट्रायल कोर्ट में उपस्थित होने के आदेश दिए हैं। साथ ही ट्रायल कोर्ट को आदेश दिया है कि वह दोनों पक्षों को सुनने के बाद संज्ञान लेने के प्रश्न पर विधि अनुसार निर्णय करे।
इसके साथ ही राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में मजिस्ट्रेट के ‘प्री-कॉग्निज़ेंस सुनवाई’ के अधिकार पर बड़ा फैसला दिया हैं.
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नए आपराधिक प्रक्रिया भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत मजिस्ट्रेट को शिकायत मामलों में संज्ञान लेने से पहले आरोपित व्यक्तियों को सीमित रूप से सुनवाई का अवसर देने का अधिकार है और इस उद्देश्य से जारी समन को स्वतः अवैध नहीं माना जा सकता।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह फैसला याचिकाकर्ता आरोपी हैडमास्टर अरविंद नाथ और महिला शिक्षिका की ओर से दायर याचिका पर दिया हैं.
क्या है पूरा मामला
जनवरी 2025 में चित्तौड़गढ़ जिले के गंगरार उपखंड क्षेत्र स्थित राजकीय विद्यालय सालेरा के प्रिंसिपल कक्ष का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था।
वीडियो में कार्यवाहक प्राचार्य अरविंद नाथ और एक महिला शिक्षक कथित रूप से आपत्तिजनक स्थिति में दिखाई दिए थे। वीडियो वायरल होने के बाद शिक्षा विभाग ने दोनों को सेवा से बर्खास्त कर दिया और जिला शिक्षा अधिकारी की ओर से गंगरार थाने में उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा भी दर्ज कराया गया।
इस मामले की जांच अभी चल ही रही थी कि दोनों शिक्षकों ने भी गंगरार थाने में एफआईआर नंबर 175/2025 दर्ज कराते हुए कालूराम सुथार और अन्य व्यक्तियों पर अपराध करने के आरोप लगाए।
इसके बाद कालूराम सुथार ने भी दोनों शिक्षकों के खिलाफ पोक्सो कोर्ट में आपराधिक शिकायत दायर की, जिस पर चित्तौड़गढ़ के पोक्सो कोर्ट संख्या-1 ने समन जारी कर उन्हें अदालत में उपस्थित होने के आदेश दिए।
समन और शिकायत को चुनौती देते हुए दोनों शिक्षकों ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पूरी शिकायत को निरस्त करने की मांग की।
याचिकाकर्ता पक्ष की दलीलें
याचिकाकर्ता आरोपी शिक्षक और शिक्षिका की ओर से अधिवक्ता कोमल आर वर्मा ने पैरवी करते हुए अदालत में दलील दी कि पोक्सो कोर्ट में की गई शिकायत में लगाए गए आरोप वही हैं जो पहले से दर्ज एफआईआर में विचाराधीन हैं, इसलिए अलग से आपराधिक शिकायत चलाना अनुचित है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता कोमल आर वर्मा ने अदालत में तर्क दिया गया कि शिकायत में लगाए गए आरोप वही हैं जो पहले से दर्ज एफआईआर में विचाराधीन हैं, इसलिए समान आरोपों पर अलग से आपराधिक शिकायत चलाना न्यायिक प्रक्रिया के विपरीत है। अधिवक्ता ने कहा कि शिकायत प्रतिशोध की भावना से प्रेरित है और इसका उद्देश्य आरोपियों को अनावश्यक रूप से परेशान करना है।
यह भी कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने समन जारी करते समय मामले की परिस्थितियों का पर्याप्त परीक्षण नहीं किया और बिना पर्याप्त आधार के आरोपियों को अदालत में उपस्थित होने के लिए बाध्य किया गया। इसलिए हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करते हुए शिकायत और समन को निरस्त करना चाहिए।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार प्रभावित
याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से यह भी निवेदन किया कि उनके विरुद्ध दर्ज आपराधिक शिकायत और उस पर जारी समन उनके मौलिक अधिकारों, विशेषकर जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार, को प्रभावित करते हैं। इसलिए अदालत को अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए इस शिकायत को निरस्त करना चाहिए, ताकि उन्हें अनावश्यक आपराधिक मुकदमेबाजी से राहत मिल सके।
याचिकाकर्ता की दलील थी कि चूंकि समान घटना के संबंध में पहले से ही पुलिस जांच चल रही है और समान आरोपों पर आधारित अलग शिकायत न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है, इसलिए हाईकोर्ट को हस्तक्षेप करते हुए आपराधिक शिकायत तथा उसके आधार पर जारी समन को रद्द करना चाहिए।
सरकार और शिकायतकर्ता का पक्ष
राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि शिकायत विधि अनुसार दायर की गई है और मजिस्ट्रेट ने कानून के अनुसार समन जारी किया है। केवल इस आधार पर कि पहले से एफआईआर दर्ज है, यह नहीं कहा जा सकता कि शिकायत स्वतः अवैध हो जाती है। दोनों कार्यवाहियां अपने-अपने आधार पर स्वतंत्र रूप से विचारणीय हैं।
सरकार ने यह भी कहा कि BNSS के नए प्रावधानों के अनुसार मजिस्ट्रेट को संज्ञान लेने से पहले प्रस्तावित आरोपियों को सीमित सुनवाई का अवसर देने की व्यवस्था की गई है, इसलिए समन जारी करना प्रक्रिया का हिस्सा है और इस स्तर पर हाईकोर्ट का हस्तक्षेप उचित नहीं होगा।
समन जारी करना प्रक्रिया का प्रारंभिक चरण
राज्य सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि वर्तमान मामला अभी प्रारंभिक चरण में है, जहां ट्रायल कोर्ट ने केवल आरोपियों को सुनवाई का अवसर देने के उद्देश्य से समन जारी किया है। इस स्तर पर हाईकोर्ट द्वारा हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा, क्योंकि ट्रायल कोर्ट को विधि अनुसार शिकायत की जांच करने और संज्ञान लेने अथवा न लेने के संबंध में निर्णय करने का अधिकार है।
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के नए प्रावधानों के अनुसार कुछ मामलों में मजिस्ट्रेट को संज्ञान लेने से पहले प्रस्तावित आरोपियों को सीमित सुनवाई का अवसर देने की व्यवस्था की गई है। इसलिए समन जारी करना कोई अंतिम निर्णय नहीं है, बल्कि केवल प्रक्रिया का एक प्रारंभिक चरण है, जिससे आरोपियों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिल सके।
सरकार ने कहा कि यदि प्रत्येक मामले में आरोपी प्रारंभिक स्तर पर ही हाईकोर्ट में जाकर शिकायत को रद्द कराने का प्रयास करेंगे, तो ट्रायल कोर्ट की वैधानिक प्रक्रिया बाधित होगी और न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक दबाव पड़ेगा। इसलिए न्यायालय को केवल उन्हीं मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए, जहां स्पष्ट रूप से न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग सिद्ध होता हो, जबकि वर्तमान मामले में ऐसा कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया गया है।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि पुराने दंड प्रक्रिया कानून के तहत संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर नहीं मिलता था, जबकि BNSS में इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया गया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि
अब मजिस्ट्रेट कुछ मामलों में संज्ञान लेने से पहले आरोपियों को सीमित सुनवाई का अवसर दे सकता है, जिससे निराधार या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों को प्रारंभिक स्तर पर ही परखा जा सके।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह सुनवाई मुकदमे के अंतिम निर्णय का निर्धारण नहीं करती, बल्कि केवल यह तय करने में सहायता करती है कि शिकायत पर संज्ञान लिया जाना चाहिए या नहीं।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने दोनों शिक्षकों को आंशिक राहत देते हुए उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई पर रोक लगा दी और उन्हें निर्धारित तिथि पर ट्रायल कोर्ट में उपस्थित होने का निर्देश दिया।
साथ ही ट्रायल कोर्ट को आदेश दिया गया कि वह दोनों पक्षों को सुनने के बाद संज्ञान लेने के प्रश्न पर कानून के अनुसार निर्णय करे।