जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ में बेहद चकित करने वाला मामला सामने आया है। जहां पर एक 78 वर्षिय पति ने 75 वर्षिय पत्नी से 58 साल पुराने विवाह को समाप्त कर तलाक की मांग को लेकर दायर याचिका दायर की है.
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस बेहद महत्वपूर्ण पारिवारिक विवाद में 58 साल पुराने विवाह को तोड़ने से इनकार करते हुए पति द्वारा मांगी गई तलाक की अपील को खारिज करते हुए बेहद महत्वपूर्ण व्यवस्था दी हैं.
राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ कहा कि वैवाहिक जीवन में सामान्य झगड़े, तकरार या संपत्ति संबंधी विवाद क्रूरता नहीं.
राजस्थान हाईकोर्ट ने पत्नि द्वारा पति के खिलाफ दर्ज कराए गए संपंति के मुकदमें को लेकर भी कहा हैं कि केवल एक एफआईआर दर्ज कराना ही क्रूरता का आधार नहीं बन सकता।
विवाह कानूनी अनुबंध नहीं सामाजिक संस्था
हाईकोर्ट ने कहा कि लंबे वैवाहिक जीवन के बाद उत्पन्न सामान्य पारिवारिक मतभेद, संपत्ति को लेकर विवाद या आपसी आरोप-प्रत्यारोप तलाक देने का पर्याप्त आधार नहीं माने जा सकते।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पति-पत्नी ने लगभग छह दशक का वैवाहिक जीवन बिना किसी गंभीर विवाद के साथ बिताया हो और दोनों वृद्धावस्था में हों, तब विवाह विच्छेद करना न्यायसंगत नहीं होगा।
जस्टिस सुदेश बंसल और अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए फैसला देते हुए स्पष्ट किया कि विवाह केवल कानूनी अनुबंध नहीं बल्कि सामाजिक संस्था है और इसे समाप्त करने से पहले पूरे वैवाहिक जीवन की परिस्थितियों, परिवार पर पड़ने वाले प्रभाव और न्यायसंगत कारणों का गंभीरता से परीक्षण आवश्यक है।
हर परिवार में होते हैं ऐसे झगड़े
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि एक पति या पत्नी द्वारा दूसरे के प्रति की गई क्रूरता का मूल्यांकन करते समय अदालत को संपूर्ण वैवाहिक जीवन का समग्र रूप से अवलोकन करना चाहिए, ताकि यह देखा जा सके कि क्या किसी पक्ष का व्यवहार वास्तव में ऐसी स्थिति तक पहुंच गया है, जिससे पीड़ित पक्ष के लिए दूसरे के साथ आगे रहना अत्यंत कठिन हो गया हो।
हाईकोर्ट ने कहा कि सामान्यतः वैवाहिक जीवन में होने वाली छोटी-मोटी खीझ, झगड़े-विवाद और दैनिक जीवन के सामान्य उतार-चढ़ाव, जो लगभग हर परिवार में होते हैं, उन्हें क्रूरता का आधार मानकर तलाक का आदेश पारित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने राय देते हुए कहा कि हमारी राय में, जब तलाक याचिका दायर करने से पहले पति-पत्नी ने लगभग 46 वर्षों से अधिक समय तक बिना किसी शिकायत के वैवाहिक जीवन साथ-साथ बिताया हो, तो यह माना जा सकता है कि वर्षों के साथ-साथ उनकी सहनशीलता और पारस्परिक समझ का स्तर भी बढ़ा होगा।
कोर्ट ने कहा वैवाहिक जीवन के प्रारंभिक चरण में जो बातें पति या पत्नी को विचलित कर सकती थीं, वे जीवन के बाद के चरण में सहनशीलता और आपसी समझ के कारण सामान्य या सहज प्रतीत होने लगती हैं।
दो पुत्र और एक पुत्री
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पक्षकारों के तीन बच्चे हैं — दो पुत्र और एक पुत्री — जो सभी वयस्क हो चुके हैं और उनका विवाह भी हो चुका है।
कोर्ट ने कहा कि यदि यह मान भी लिया जाए कि परिवार के भीतर संपत्ति विवाद या आपसी समझ के अंतर से कुछ पारिवारिक समस्याएं उत्पन्न हुई हों, तो भी इन्हें उस वृद्ध दंपति के विवाह को समाप्त करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता, जिन्होंने वर्ष 1967 से 2013 तक बिना किसी शिकायत के साथ-साथ जीवन व्यतीत किया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस अवस्था में विवाह विच्छेद करना न केवल पत्नी बल्कि पूरे परिवार के सदस्यों को प्रभावित कर सकता है। समाज में परिवार के प्रत्येक सदस्य की गरिमा, सम्मान और प्रतिष्ठा भी प्रभावित हो सकती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि हमारा मत है कि पारिवारिक न्यायालय द्वारा पति के पक्ष में कथित क्रूरता के आधार पर तलाक का आदेश न देना किसी भी प्रकार से त्रुटिपूर्ण नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि तलाक याचिका दायर होने के बाद लगभग 12 वर्ष या उससे अधिक समय बीत चुका है और दोनों पक्षकार स्वीकार रूप से 75 वर्ष से अधिक आयु पार कर चुके हैं, अतः इस अवस्था में कथित आधारों पर विवाह को समाप्त करना न्यायोचित और उचित नहीं होगा।
6 दशक का साथ और अब…
अपीलकर्ता पति और प्रतिवादी पत्नी का विवाह 29 जून 1967 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था।
विवाह के बाद दोनों ने 6 दशकों तक साथ रहकर अपना पारिवारिक जीवन व्यतीत किया और उनके तीन बच्चे—दो पुत्र और एक पुत्री—हैं, जो अब वयस्क होकर अपने-अपने परिवारों में स्थापित हो चुके हैं।
वर्ष 2013 तक दोनों के बीच किसी प्रकार का गंभीर वैवाहिक विवाद सामने नहीं आया था।
मतभेद बाद में उस समय शुरू हुए जब परिवार की संपत्ति के बंटवारे और उसके हस्तांतरण को लेकर पति-पत्नी के विचार अलग-अलग हो गए।
पति ने वर्ष 2013 में अपनी पत्नी उमा देवी के खिलाफ हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दायर की थी।
पति का आरोप था कि सेवानिवृत्ति के बाद पत्नी ने उनके खिलाफ झूठा आपराधिक मामला दर्ज कराया, जिससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।
साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि पत्नी बड़े बेटे के प्रभाव में आकर संपत्ति केवल उसी के नाम करना चाहती है और उनकी देखभाल भी ठीक से नहीं करती।
पति के आरोप
पति ने वर्ष 2014 में पारिवारिक न्यायालय में तलाक की याचिका दायर करते हुए आरोप लगाया कि पत्नी बड़े बेटे के प्रभाव में आकर संपत्ति केवल उसी के नाम करना चाहती है, जबकि वह संपत्ति दोनों पुत्रों के बीच बराबर बांटना चाहते थे।
उन्होंने यह भी कहा कि पत्नी ने उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराया, जिससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची और उन्हें मानसिक कष्ट सहना पड़ा।
पति का यह भी कहना था कि सेवानिवृत्ति के बाद पत्नी का व्यवहार उनके प्रति उपेक्षापूर्ण हो गया और वह उनके साथ सहयोग नहीं करती थीं, जिसके कारण उनके लिए वैवाहिक जीवन जारी रखना कठिन हो गया।
पत्नी का पक्ष
पत्नी ने अपने जवाब में पति के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि संपत्ति उनके नाम पर खरीदी गई थी और परिवार की आर्थिक सुरक्षा को देखते हुए उन्होंने उसके प्रबंधन को लेकर निर्णय लिए थे।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पति परिवार की संपत्ति को अनियंत्रित रूप से खर्च कर रहे थे, जिसके कारण उन्हें विरोध करना पड़ा।
पत्नी ने यह भी कहा कि पति के व्यवहार और कुछ घटनाओं के कारण ही उन्हें पुलिस में शिकायत दर्ज करानी पड़ी थी। उन्होंने अदालत से पति की तलाक याचिका खारिज करने का आग्रह किया।
पारिवारिक न्यायालय का फैसला
दोनों पक्षों के साक्ष्यों और दलीलों को सुनने के बाद भरतपुर पारिवारिक न्यायालय ने पाया कि विवाह के लंबे समय तक किसी प्रकार की क्रूरता या गंभीर विवाद का आरोप नहीं लगाया गया था।
अदालत ने यह भी माना कि विवाद मुख्य रूप से संपत्ति के बंटवारे को लेकर उत्पन्न हुआ था और इसे वैवाहिक क्रूरता का आधार नहीं माना जा सकता।
इन्हीं कारणों से पारिवारिक न्यायालय ने 18 अक्टूबर 2019 को पति की तलाक याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट में अपील
पारिवारिक न्यायालय के फैसले के खिलाफ पति ने राजस्थान हाईकोर्ट में अपील दायर की और तर्क दिया कि पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई शिकायतें और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप मानसिक क्रूरता के दायरे में आते हैं, इसलिए तलाक दिया जाना चाहिए।
पत्नी की ओर से दलील दी गई कि पारिवारिक न्यायालय ने सभी तथ्यों और साक्ष्यों का विस्तृत विश्लेषण कर सही निर्णय दिया है और उसमें किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में संपूर्ण रिकॉर्ड, साक्ष्य और दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि वैवाहिक क्रूरता का आकलन करते समय पूरे वैवाहिक जीवन को समग्र रूप से देखा जाना चाहिए। सामान्य पारिवारिक मतभेद, संपत्ति संबंधी विवाद या छोटी-मोटी तकरार को तलाक का आधार नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्ष 2013 तक पति-पत्नी ने लगभग 46 वर्षों तक बिना किसी शिकायत के साथ जीवन बिताया और वृद्धावस्था में विवाह समाप्त करना उचित नहीं होगा, विशेषकर तब जब विवाद मुख्य रूप से संपत्ति को लेकर हो।
अंतिम आदेश- तलाक की मांग खारिज
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पति यह साबित नहीं कर पाए कि पत्नी का व्यवहार ऐसा था जिससे उनके लिए साथ रहना असंभव हो गया हो। इसलिए पारिवारिक न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
हाईकोर्ट ने पति की ओर से दायर अपील को खारिज करते हुए कहा कि इतने लंबे वैवाहिक संबंध को केवल पारिवारिक मतभेदों के आधार पर समाप्त करना न्यायोचित नहीं माना जा सकता।